हदीस : हाफ़िज़े-क़ुरआन या आमिले-क़ुरआन
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रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया : जिस शख़्स ने क़ुरआन पढ़ा और उसके मुताबिक़ अमल किया तो क़ियामत के दिन उसके माँ-बाप को एक ताज पहनाया जाएगा जिसकी रौशनी तुम्हारे दुनिया के घरों में चमकने वाले सूरज की रौशनी से ज़्यादा अच्छी होगी। (Mishkat : 2139)
हज़रत अली (रज़ि०) बयान करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया : जिसने क़ुरआन पढ़ा उसे याद किया और उसके हलाल को हलाल और उसके हराम को हराम जाना तो अल्लाह उसे जन्नत में दाख़िल फ़रमाएगा और उसके अहले-ख़ाना के उन दस लोगों के बारे में उसकी सिफ़ारिश क़बूल फ़रमाएगा जिन पर जहन्नम वाजिब हो चुकी थी। अहमद तिरमिज़ी इब्ने-माजा दारमी। (Mishkat : 2141)
ये वो हदीसें जो हमारे मुआशरे में हाफ़िज़े-क़ुरआन की फ़ज़ीलत में बयान की जाती हैं। इन हदीसों में दो बातें ख़ास तौर से नोट करने की हैं : एक ये कि ये दोनों हदीसें ज़ईफ़ हैं, दूसरी ये कि इन हदीसों में जो असल बात है वो नहीं बयान की जाती बल्कि हाफ़िज़े-क़ुरआन अपनी तरफ़ से बढ़ाकर पूरी बात बयान की जाती है, हालाँकि हदीस में है कि
जिस शख़्स ने क़ुरआन पढ़ा और उसके मुताबिक़ अमल किया तो……
जिसने क़ुरआन पढ़ा उसे याद किया और उसके हलाल को हलाल और उसके हराम को हराम जाना तो…..
यानी क़ुरआन का महज़ हिफ़्ज़ कर लेना काफ़ी नहीं, बल्कि उस पर अमल करना, उसके अहकाम को समझना, और उसके मुताबिक़ ज़िंदगी गुज़ारना ही असल फ़ज़ीलत और नजात का ज़रिया है।