सलाहियत और सालेहियत ये दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जो इन्सानी शख़्सियत को परवान चढ़ाने में बड़ा ही अहम रोल अदा करती हैं। दुनिया में जितनी भी रौनक़ें पाई जाती हैं वो सब सलाहियत की बुनियाद पर ही पाई जाती हैं और दुनिया में जितनी भी इन्सानी और अख़लाक़ी इक़दार (Human & Moral Values) की पासदारी पाई जाती है वो सब सालेहियत की बुनियाद पर ही पाई जाती है।
सलाहियत (Competence) इन्सान के अन्दर दिखाई पड़ने वाली उन ख़ूबियों (Abilities) और स्किल्स (Skills) को कहा जाता है जिनके ज़रिए किसी बात को न सिर्फ़ बेहतर तौर पर समझा जा सकता है बल्कि कामों के अन्दर की तासीर और उसकी कारकर्दगी को बेहतर से बेहतर बनाया जा सकता है।
सालेहियत (Righteousness) इन्सान के अन्दर पाए जाने वाले उस जौहर को कहते हैं जिसके ज़रिए इन्सान अपने-आपको अख़लाक़ी ऐतिबार से इस तरह पाबन्द बनाता है कि उसके तमाम काम नफ़सानी ख़ाहिशात से ऊपर उठकर ख़ुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ हो जाते हैं।
सलाहियत वो बीज है जिसे अगर सालेहियत का खाद और पानी मिता रहे तो इन्सानी शख़्सियत एक ऐसा फलदार दरख़्त बन सकती है जिसका साया भी घना हो, जिसके फूल
भी ख़ूबसूरत और ख़ुशबूदार हों और जिसके फल
भी इन्तिहाई लज़ीज़ हों।
सलाहियत इन्सान के अन्दर की वो ख़ूबियाँ हैं जिन्हें परवान चढ़ाकर इन्सान न सिर्फ़ ख़ुद अपने-आपको चमका सकता है बल्कि अपने मुआशरे को भी सही रुख़ दे सकता है, जबकि
सालेहियत इन्सान के अन्दर की वो ख़ूबी है जिसे परवान चढ़ा कर इन्सान न सिर्फ़ अपने अन्दरून को चमका सकता है बल्कि अपनी सलाहियतों को भी सही रुख़ दे सकता है।
सलाहियत इन्सान को किसी एक ख़ास मैदान में या कुछ मख़सूस मैदानों में आगे बढ़ाने का नाम है,
जबकि सालेहियत इन्सान को हर मैदान में सलाहियतों को सही तौर से बरूए-कार लाने और उन्हें सही रुख़ देने का नाम है।
सलाहियत के ज़रिए इन्सान दुनिया को बा-रौनक़ बनाने का काम ले सकता है, जबकि
सालेहियत के ज़रिए इन्सान दुनिया में किये गए हर काम के लिये सही मौक़िफ़ और पाएदार मक़सद मुहैया कर सकता है।
सलाहियत उस चीज़ का नाम है जिससे लोगों को और समाज को फ़ायदा पहुँचता है और
सालेहियत वो क़ीमती जौहर है जो लोगों और समाज को पहुँचनेवाले फ़ायदों में से ख़ुदग़र्ज़ी के एलिमेंट को कम से कम तर करके बे-ग़र्ज़ी और ख़ुदा-तरसी के एलिमेंट को बढ़ाता और परवान चढ़ाता है।
सलाहियत इन्सान को अन्दर से अपने-आपको पुर-एतिमाद बनाती है तो
सालेहियत इन्सान को लोगों की नज़रों में क़ाबिले-भरोसा बनाती है।
सलाहियत के अन्दर वो कशिश पाई जाती है कि उसे देखकर लोग उसकी तरफ़ मुतवज्जेह हुए बग़ैर नहीं रहते लेकिन उस तवज्जोह को बरक़रार रखने के लिये सालेहियत ही की ज़रूरत पेश आती है। अगर किसी सलाहियतमन्द शख़्स के अन्दर सालेहियत नहीं है तो लोग उससे बहुत जल्द मुतनफ़्फ़र हो जाते हैं।
इन्सान के अन्दर सलाहियत (Competency) हो लेकिन सालेहियत (Righteousness) न हो तो ये ऐसे ही है जैसे दिये में बत्ती जलकर रौशनी तो दे रही हो लेकिन उसमें तेल न हो।
इसी तरह अगर सालेहियत हो लेकिन सलाहियत न हो तो वो बिलकुल ऐसे ही है जैसे दिये में तेल तो बहुत हो लेकिन बत्ती न हो।
अगर देखा जाए तो रोबोट एक इन्सान से कहीं ज़्यादा बा-सलाहियत (Competent) हो सकता है। और उसकी सलाहियत को टेक्नोलोजी के ज़रिए बेहतर से बेहतर बनाया जा सकता है। लेकिन चूँकि रोबोट के अन्दर न तो इन्सान की तरह एहसास और जज़्बात होते हैं और न वो अपने ज़ाती शुऊर की बिना पर सही और ग़लत के दरम्यान फ़ैसला कर सकता है।
लिहाज़ा वो इन्सान जिसमें सालेहियत न हो यानी उसके अन्दर सही और ग़लत में तमीज़ करके सही को इख़्तियार करने और ग़लत को मिटाने की कोशिश करने का जज़्बा न पाया जाता हो तो वो एक जीता-जागता रोबोट ही है, जिसकी सलाहियत तो बढ़ रही है लेकिन सालेहियत (यानी इन्सान होने का जौहर) का कोई शायबा नहीं।
मालूम हुआ कि सलाहियत और सालेहियत ये दोनों ही ख़ूबियाँ इन्सानी शख़्सियत को बेहतर बनाने और इन्सानी मुआशरे को सही रुख़ पर आगे बढ़ाने के लिये लाज़िम और ज़रूरी हैं।