वो एक पल
इन्सान अगर वक़्त की अहमियत को न समझे तो सौ साल की उम्र भी किसी काम की नहीं। ऐसे शख़्स के लिये सुबह-शाम का ये सिलसिला महज़ एक सिलसिला है जिसमें खाने-पीने, सोने-जागने और ख़ाहिशात पूरी करने के अलावा ज़िन्दगी का कोई मक़सद नहीं। ऐसे शख़्स को अगर हज़ार साला ज़िन्दगी भी दी जाए तो वो भी यूँ ही गुज़र जाएगी कि
सुबह होती है, शाम होती है।
ज़िन्दगी यूँ ही तमाम होती है।।
ऐसा शख़्स समझ रहा होता है कि एक-एक पल बहुत आसानी से कट रहा है, हालाँकि हक़ीक़त में ज़िन्दगी का एक-एक पल उसको काट रहा होता है।
इसके बरख़िलाफ़ अगर किसी इन्सान को वक़्त की अहमियत का अन्दाज़ा हो जाए तो उसका एक-एक पल एक अहद की तरह होता है। और इस तरह ज़िन्दगी की मुख़्तसर से मुख़्तसर तरीन मुद्दत में वो कारनामा अंजाम दे जाता है जिसे पहला शख़्स सदियों में भी अंजाम नहीं दे सकता है। ऐसे शख़्स के एक-एक पल में सदियों का सफ़र सिमट आता है।
वो एक पल जो तेरे इश्तियाक़ में गुज़रा।
उस एक पल में सिमट आए हैं हज़ार बरस।।
लेकिन ऐसा उसी वक़्त होता है जबकि उसकी ज़िन्दगी में कोई ऐसा पल आ जाए जिसमें वो-
अपने-आपको पहचान ले,
अपनी लग़ज़िशों से तौबा कर ले और
कुछ कर गुज़रने का पुख़्ता अहद कर ले।
ऐसे शख़्स के लिये एक पल वो होता है
जिसमें अपने आपको पहचानकर वो ख़ुद को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें अपनी ख़ताओं पर तौबा करके वो ख़ुद को ख़ुदा का मुक़र्रब बना सकता है।
जिसमें कुछ कर गुज़रने का अहद करके वो पूरी ज़िन्दगी को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें किसी की मदद करके वो हमेशा के लिये उसके दिल में अपनी जगह बना सकता है।
लिहाज़ा ज़िन्दगी के एक-एक पल की अहमियत को समझो, क्योंकि एक-एक पल से मिलकर ही ज़िन्दगी बनती है।
ख़ुदा की मअरिफ़त अगर हासिल हो जाए तो एक पल भी पूरी ज़िन्दगी का हासिल हो जाए, ख़ुदा की मअरिफ़त हासिल न हो तो हज़ार साला ज़िन्दगी की इबादत भी किसी काम की नहीं।
वो एक पल ही सही जिसमें तुम मुयस्सर हो।
उस एक पल से ज़्यादा तो ज़िन्दगी भी नहीं।।
अगर नमाज़ जैसी इबादत में ख़ुदा की हुज़ूरी मुयस्सर आ जाए तो ग़ुलाम और आक़ा के दरम्यान का ताल्लुक़ मज़बूत हो जाए
वो एक पल का साथ बवक़्ते-नमाज़ है।
महमूद आसमाँ पे ज़मीं पर अयाज़ है।।
इस एक पल की अहमियत का अन्दाज़ा शिद्दत के साथ यक़ीनन अहले-जन्नत को ही होगा कि काश जो पल भी हमने ग़फ़लत में गुज़ारे उनको भी क़ीमती बना लिया होता तो आज हमारे दरजात और बुलन्द होते।
लिहाज़ा आओ ज़िन्दगी के एक-एक पल को क़ीमती बनाएँ। अगर हम ये देखें कि क़ियामत की घड़ी आ गई है, बस इतना ही वक़्त बाक़ी है कि नेकी का कोई पौदा लगा सकते हैं तो उस आख़िरी पल का इस्तेमाल करते हुए नेकी का कोई न कोई पौदा लगा ही दें। मुमकिन है यही पौदा हश्र के मैदान में घना सायादार दरख़्त बन जाए और उसी दरख़्त के फूलों से जन्नत की क्यारियाँ महक उठें और उसी दरख़्त के बेहतरीन फल हमारी जन्नत की ज़िन्दगी की ग़िज़ा बन जाएँ।