Wo ek Pal

Wo ek Pal

That single moment

वो एक पल

इन्सान अगर वक़्त की अहमियत को न समझे तो सौ साल की उम्र भी किसी काम की नहीं। ऐसे शख़्स के लिये सुबह-शाम का ये सिलसिला महज़ एक सिलसिला है जिसमें खाने-पीने, सोने-जागने और ख़ाहिशात पूरी करने के अलावा ज़िन्दगी का कोई मक़सद नहीं। ऐसे शख़्स को अगर हज़ार साला ज़िन्दगी भी दी जाए तो वो भी यूँ ही गुज़र जाएगी कि

सुबह होती है, शाम होती है।
ज़िन्दगी यूँ ही तमाम होती है।।

ऐसा शख़्स समझ रहा होता है कि एक-एक पल बहुत आसानी से कट रहा है, हालाँकि हक़ीक़त में ज़िन्दगी का एक-एक पल उसको काट रहा होता है।

इसके बरख़िलाफ़ अगर किसी इन्सान को वक़्त की अहमियत का अन्दाज़ा हो जाए तो उसका एक-एक पल एक अहद की तरह होता है। और इस तरह ज़िन्दगी की मुख़्तसर से मुख़्तसर तरीन मुद्दत में वो कारनामा अंजाम दे जाता है जिसे पहला शख़्स सदियों में भी अंजाम नहीं दे सकता है। ऐसे शख़्स के एक-एक पल में सदियों का सफ़र सिमट आता है।

वो एक पल जो तेरे इश्तियाक़ में गुज़रा।
उस एक पल में सिमट आए हैं हज़ार बरस।।

लेकिन ऐसा उसी वक़्त होता है जबकि उसकी ज़िन्दगी में कोई ऐसा पल आ जाए जिसमें वो-
अपने-आपको पहचान ले,
अपनी लग़ज़िशों से तौबा कर ले और
कुछ कर गुज़रने का पुख़्ता अहद कर ले।

ऐसे शख़्स के लिये एक पल वो होता है
जिसमें अपने आपको पहचानकर वो ख़ुद को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें अपनी ख़ताओं पर तौबा करके वो ख़ुद को ख़ुदा का मुक़र्रब बना सकता है।
जिसमें कुछ कर गुज़रने का अहद करके वो पूरी ज़िन्दगी को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें किसी की मदद करके वो हमेशा के लिये उसके दिल में अपनी जगह बना सकता है।

लिहाज़ा ज़िन्दगी के एक-एक पल की अहमियत को समझो, क्योंकि एक-एक पल से मिलकर ही ज़िन्दगी बनती है।
ख़ुदा की मअरिफ़त अगर हासिल हो जाए तो एक पल भी पूरी ज़िन्दगी का हासिल हो जाए, ख़ुदा की मअरिफ़त हासिल न हो तो हज़ार साला ज़िन्दगी की इबादत भी किसी काम की नहीं।

वो एक पल ही सही जिसमें तुम मुयस्सर हो।
उस एक पल से ज़्यादा तो ज़िन्दगी भी नहीं।।

अगर नमाज़ जैसी इबादत में ख़ुदा की हुज़ूरी मुयस्सर आ जाए तो ग़ुलाम और आक़ा के दरम्यान का ताल्लुक़ मज़बूत हो जाए

वो एक पल का साथ बवक़्ते-नमाज़ है।
महमूद आसमाँ पे ज़मीं पर अयाज़ है।।

इस एक पल की अहमियत का अन्दाज़ा शिद्दत के साथ यक़ीनन अहले-जन्नत को ही होगा कि काश जो पल भी हमने ग़फ़लत में गुज़ारे उनको भी क़ीमती बना लिया होता तो आज हमारे दरजात और बुलन्द होते।

लिहाज़ा आओ ज़िन्दगी के एक-एक पल को क़ीमती बनाएँ। अगर हम ये देखें कि क़ियामत की घड़ी आ गई है, बस इतना ही वक़्त बाक़ी है कि नेकी का कोई पौदा लगा सकते हैं तो उस आख़िरी पल का इस्तेमाल करते हुए नेकी का कोई न कोई पौदा लगा ही दें। मुमकिन है यही पौदा हश्र के मैदान में घना सायादार दरख़्त बन जाए और उसी दरख़्त के फूलों से जन्नत की क्यारियाँ महक उठें और उसी दरख़्त के बेहतरीन फल हमारी जन्नत की ज़िन्दगी की ग़िज़ा बन जाएँ।

If a person fails to recognize the value of time, then even a lifespan of a hundred years is of no worth.
For such a person, the cycle of day and night is nothing more than a repetition — a routine filled with eating, sleeping, waking, and chasing desires, with no higher purpose to life.
Even if such a person were granted a thousand years, it would slip away in the same emptiness, like:

“Subah hoti hai, sham hoti hai.
Zindagi yun hi tamaam hoti hai.
(Morning comes, then evening falls,
And life just drifts — that’s all.)

Such a person may believe that time is passing easily —
But in truth, it is time that is consuming him, moment by moment.

On the other hand, when someone grasps the value of time, each moment becomes as sacred as a covenant.
And in the shortest span of life, that person may achieve what the heedless cannot in centuries.
In one precious moment, an entire era may be compressed.

Wo ek pal jo terey ishtiyaq mein guzra.
Us ek pal mein simat aaey hain hazar baras.
(That one moment spent in longing for You —
A thousand years were lived in just that few.)

But this only happens when a defining moment arrives in life —
a moment in which a person:

Recognizes themselves,
Repents from his missteps, and
Resolves firmly to live with purpose.
For such a person, a single moment becomes:
The moment of self-discovery, in which they realize their true worth.
The moment of repentance, through which they become beloved to God.
The moment of commitment, through which they give eternal value to their entire life.
The moment of compassion, through which they win a permanent place in someone’s heart.

Therefore, understand the value of every moment,
for life is nothing but a collection of such moments.
If one gains the ma‘rifah (deep awareness) of God,
then even a single moment can become the essence of an entire life.
But if one fails to attain that ma‘rifah,
then even a thousand years of worship may bear no fruit.

Wo ek pal hi sahi jismen tum muyassar ho.
Us ek pal sey zyada to zindagi bhi nahi.
(Let it be just one moment in which I find You —
For even life itself is not more than that one, too.)

If, in prayer, one attains the presence of God,
Then the bond between Master and servant becomes deeply rooted.

Wo ek pal ka saath b-waqte-namaz hai.
Mahmood aasman pe zamin par Ayaz hai.
(That one moment of presence in prayer,
Mahmood is on high, and Ayaz is near.)

The true value of such a moment will be deeply felt — perhaps most intensely — by the people of Paradise,
who will wish they had turned even their heedless moments into precious ones,
So their ranks could have been higher.

So come, let us make each moment count.
Even if we feel that the Hour of Judgment is upon us —
And only one last moment remains in which a good deed may be planted —
Then let us plant that seed without delay.
Perhaps that final act will become a shade-giving tree on the Day of Resurrection.
Perhaps its fragrant blossoms will fill the gardens of Paradise.
And perhaps its nourishing fruits will become the sustenance of our eternal life in Jannah.

وہ ایک پل

اگر انسان وقت کی قدر نہ کرے، تو سو سالہ عمر بھی بے کار ہے۔
ایسے شخص کے لیے صبح و شام کا سلسلہ محض ایک سلسلہ ہے، جس میں کھانے، پینے، سونے، جاگنے اور خواہشات پوری کرنے کے سوا زندگی کا کوئی مقصد نہیں ہوتا۔
اگر ایسے شخص کو ہزار سالہ زندگی بھی مل جائے تو وہ یوں ہی گزر جائے گی، جیسے:

“صبح ہوتی ہے، شام ہوتی ہے،
زندگی یوں ہی تمام ہوتی ہے۔”

وہ یہ گمان کرتا ہے کہ وقت بہ آسانی گزر رہا ہے، حالانکہ حقیقت یہ ہے کہ وقت گزر نہیں رہا — بلکہ وقت اسے چیر رہا ہوتا ہے۔

اس کے برخلاف، اگر کوئی انسان وقت کی قدر پہچان لے، تو اس کا ہر لمحہ ایک عہد بن جاتا ہے۔ اور وہ اپنی مختصر سی زندگی میں ایسا کارنامہ انجام دے جاتا ہے جو غفلت میں بسر کرنے والا شخص صدیوں میں بھی انجام نہیں دے پاتا۔
ایسے شخص کے ایک لمحے میں صدیوں کا سفر سمو جاتا ہے۔

“وہ ایک لمحہ جو تیرے اشتیاق میں گزرا،
اس ایک لمحے میں سمٹ آئے ہیں ہزار برس!”

لیکن ایسا تب ہی ممکن ہے، جب زندگی میں کوئی ایک لمحہ ایسا آ جائے، جس میں انسان:
اپنے آپ کو پہچان لے،
اپنی لغزشوں سے توبہ کر لے،
اور کچھ کر گزرنے کا پختہ ارادہ کر لے۔

ایسے شخص کے لیے ایک لمحہ:

اپنی شناخت کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ اپنی قدر پہچانتا ہے،
توبہ کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ اللہ کا محبوب بن جاتا ہے،
ارادے کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ پوری زندگی کو بامقصد بنا دیتا ہے،
مدد کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ کسی کے دل میں ہمیشہ کے لیے جگہ بنا لیتا ہے۔

لہٰذا، زندگی کے ایک ایک لمحے کی قدر کرو، کیونکہ زندگی انہی لمحوں سے بنتی ہے۔ اگر اللہ کی معرفت نصیب ہو جائے، تو ایک لمحہ ہی پوری زندگی کا حاصل بن سکتا ہے۔
اور اگر معرفتِ الٰہی نہ ہو، تو ہزار سال کی عبادت بھی بے سود ہو سکتی ہے۔

“وہ ایک لمحہ ہی سہی جس میں تُو میسر ہو،
اس ایک لمحے سے زیادہ تو زندگی بھی نہیں!”

اگر نماز جیسی عبادت میں اللہ کی حضوری نصیب ہو جائے،
تواس ایک لمحہ میں غلام اور آقا کے درمیان کا رشتہ مضبوط ہو جاتا ہے:

“وہ ایک لمحے کا ساتھ بوقتِ نماز ہے،
محمود آسماں پہ، زمین پر ایاز ہے!”

اس ایک لمحے کی اہمیت کا شدت کے ساتھ احساس، یقیناً اہلِ جنت ہی کو ہوگا — کہ کاش! جو لمحے ہم نے غفلت میں گزارے، انہیں بھی ہم قیمتی بنا لیتے — تو آج ہمارے درجات اور بلند ہوتے۔

پس آؤ!
زندگی کے ایک ایک لمحے کو قیمتی بنائیں۔
اگر ہمیں یہ احساس ہو کہ قیامت کی گھڑی آ گئی ہے
اور بس اتنا ہی وقت باقی ہے کہ ہم کوئی نیکی کا بیج بو سکتے ہیں —
تو اسی آخری لمحے کو استعمال کرتے ہوئے
کسی نیکی کا بیج ضرور بو دیں۔

ممکن ہے کہ یہی بیج حشر کے میدان میں سایہ دار درخت بن جائے،
اسی کے پھول جنت کی کیاریوں کو مہکا دیں،
اور اسی کے پھل جنت کی زندگی کا رزق بن جائیں۔

Hindi

वो एक पल

इन्सान अगर वक़्त की अहमियत को न समझे तो सौ साल की उम्र भी किसी काम की नहीं। ऐसे शख़्स के लिये सुबह-शाम का ये सिलसिला महज़ एक सिलसिला है जिसमें खाने-पीने, सोने-जागने और ख़ाहिशात पूरी करने के अलावा ज़िन्दगी का कोई मक़सद नहीं। ऐसे शख़्स को अगर हज़ार साला ज़िन्दगी भी दी जाए तो वो भी यूँ ही गुज़र जाएगी कि

सुबह होती है, शाम होती है।
ज़िन्दगी यूँ ही तमाम होती है।।

ऐसा शख़्स समझ रहा होता है कि एक-एक पल बहुत आसानी से कट रहा है, हालाँकि हक़ीक़त में ज़िन्दगी का एक-एक पल उसको काट रहा होता है।

इसके बरख़िलाफ़ अगर किसी इन्सान को वक़्त की अहमियत का अन्दाज़ा हो जाए तो उसका एक-एक पल एक अहद की तरह होता है। और इस तरह ज़िन्दगी की मुख़्तसर से मुख़्तसर तरीन मुद्दत में वो कारनामा अंजाम दे जाता है जिसे पहला शख़्स सदियों में भी अंजाम नहीं दे सकता है। ऐसे शख़्स के एक-एक पल में सदियों का सफ़र सिमट आता है।

वो एक पल जो तेरे इश्तियाक़ में गुज़रा।
उस एक पल में सिमट आए हैं हज़ार बरस।।

लेकिन ऐसा उसी वक़्त होता है जबकि उसकी ज़िन्दगी में कोई ऐसा पल आ जाए जिसमें वो-
अपने-आपको पहचान ले,
अपनी लग़ज़िशों से तौबा कर ले और
कुछ कर गुज़रने का पुख़्ता अहद कर ले।

ऐसे शख़्स के लिये एक पल वो होता है
जिसमें अपने आपको पहचानकर वो ख़ुद को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें अपनी ख़ताओं पर तौबा करके वो ख़ुद को ख़ुदा का मुक़र्रब बना सकता है।
जिसमें कुछ कर गुज़रने का अहद करके वो पूरी ज़िन्दगी को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें किसी की मदद करके वो हमेशा के लिये उसके दिल में अपनी जगह बना सकता है।

लिहाज़ा ज़िन्दगी के एक-एक पल की अहमियत को समझो, क्योंकि एक-एक पल से मिलकर ही ज़िन्दगी बनती है।
ख़ुदा की मअरिफ़त अगर हासिल हो जाए तो एक पल भी पूरी ज़िन्दगी का हासिल हो जाए, ख़ुदा की मअरिफ़त हासिल न हो तो हज़ार साला ज़िन्दगी की इबादत भी किसी काम की नहीं।

वो एक पल ही सही जिसमें तुम मुयस्सर हो।
उस एक पल से ज़्यादा तो ज़िन्दगी भी नहीं।।

अगर नमाज़ जैसी इबादत में ख़ुदा की हुज़ूरी मुयस्सर आ जाए तो ग़ुलाम और आक़ा के दरम्यान का ताल्लुक़ मज़बूत हो जाए

वो एक पल का साथ बवक़्ते-नमाज़ है।
महमूद आसमाँ पे ज़मीं पर अयाज़ है।।

इस एक पल की अहमियत का अन्दाज़ा शिद्दत के साथ यक़ीनन अहले-जन्नत को ही होगा कि काश जो पल भी हमने ग़फ़लत में गुज़ारे उनको भी क़ीमती बना लिया होता तो आज हमारे दरजात और बुलन्द होते।

लिहाज़ा आओ ज़िन्दगी के एक-एक पल को क़ीमती बनाएँ। अगर हम ये देखें कि क़ियामत की घड़ी आ गई है, बस इतना ही वक़्त बाक़ी है कि नेकी का कोई पौदा लगा सकते हैं तो उस आख़िरी पल का इस्तेमाल करते हुए नेकी का कोई न कोई पौदा लगा ही दें। मुमकिन है यही पौदा हश्र के मैदान में घना सायादार दरख़्त बन जाए और उसी दरख़्त के फूलों से जन्नत की क्यारियाँ महक उठें और उसी दरख़्त के बेहतरीन फल हमारी जन्नत की ज़िन्दगी की ग़िज़ा बन जाएँ।

If a person fails to recognize the value of time, then even a lifespan of a hundred years is of no worth.
For such a person, the cycle of day and night is nothing more than a repetition — a routine filled with eating, sleeping, waking, and chasing desires, with no higher purpose to life.
Even if such a person were granted a thousand years, it would slip away in the same emptiness, like:

“Subah hoti hai, sham hoti hai.
Zindagi yun hi tamaam hoti hai.
(Morning comes, then evening falls,
And life just drifts — that’s all.)

Such a person may believe that time is passing easily —
But in truth, it is time that is consuming him, moment by moment.

On the other hand, when someone grasps the value of time, each moment becomes as sacred as a covenant.
And in the shortest span of life, that person may achieve what the heedless cannot in centuries.
In one precious moment, an entire era may be compressed.

Wo ek pal jo terey ishtiyaq mein guzra.
Us ek pal mein simat aaey hain hazar baras.
(That one moment spent in longing for You —
A thousand years were lived in just that few.)

But this only happens when a defining moment arrives in life —
a moment in which a person:

Recognizes themselves,
Repents from his missteps, and
Resolves firmly to live with purpose.
For such a person, a single moment becomes:
The moment of self-discovery, in which they realize their true worth.
The moment of repentance, through which they become beloved to God.
The moment of commitment, through which they give eternal value to their entire life.
The moment of compassion, through which they win a permanent place in someone’s heart.

Therefore, understand the value of every moment,
for life is nothing but a collection of such moments.
If one gains the ma‘rifah (deep awareness) of God,
then even a single moment can become the essence of an entire life.
But if one fails to attain that ma‘rifah,
then even a thousand years of worship may bear no fruit.

Wo ek pal hi sahi jismen tum muyassar ho.
Us ek pal sey zyada to zindagi bhi nahi.
(Let it be just one moment in which I find You —
For even life itself is not more than that one, too.)

If, in prayer, one attains the presence of God,
Then the bond between Master and servant becomes deeply rooted.

Wo ek pal ka saath b-waqte-namaz hai.
Mahmood aasman pe zamin par Ayaz hai.
(That one moment of presence in prayer,
Mahmood is on high, and Ayaz is near.)

The true value of such a moment will be deeply felt — perhaps most intensely — by the people of Paradise,
who will wish they had turned even their heedless moments into precious ones,
So their ranks could have been higher.

So come, let us make each moment count.
Even if we feel that the Hour of Judgment is upon us —
And only one last moment remains in which a good deed may be planted —
Then let us plant that seed without delay.
Perhaps that final act will become a shade-giving tree on the Day of Resurrection.
Perhaps its fragrant blossoms will fill the gardens of Paradise.
And perhaps its nourishing fruits will become the sustenance of our eternal life in Jannah.

وہ ایک پل

اگر انسان وقت کی قدر نہ کرے، تو سو سالہ عمر بھی بے کار ہے۔
ایسے شخص کے لیے صبح و شام کا سلسلہ محض ایک سلسلہ ہے، جس میں کھانے، پینے، سونے، جاگنے اور خواہشات پوری کرنے کے سوا زندگی کا کوئی مقصد نہیں ہوتا۔
اگر ایسے شخص کو ہزار سالہ زندگی بھی مل جائے تو وہ یوں ہی گزر جائے گی، جیسے:

“صبح ہوتی ہے، شام ہوتی ہے،
زندگی یوں ہی تمام ہوتی ہے۔”

وہ یہ گمان کرتا ہے کہ وقت بہ آسانی گزر رہا ہے، حالانکہ حقیقت یہ ہے کہ وقت گزر نہیں رہا — بلکہ وقت اسے چیر رہا ہوتا ہے۔

اس کے برخلاف، اگر کوئی انسان وقت کی قدر پہچان لے، تو اس کا ہر لمحہ ایک عہد بن جاتا ہے۔ اور وہ اپنی مختصر سی زندگی میں ایسا کارنامہ انجام دے جاتا ہے جو غفلت میں بسر کرنے والا شخص صدیوں میں بھی انجام نہیں دے پاتا۔
ایسے شخص کے ایک لمحے میں صدیوں کا سفر سمو جاتا ہے۔

“وہ ایک لمحہ جو تیرے اشتیاق میں گزرا،
اس ایک لمحے میں سمٹ آئے ہیں ہزار برس!”

لیکن ایسا تب ہی ممکن ہے، جب زندگی میں کوئی ایک لمحہ ایسا آ جائے، جس میں انسان:
اپنے آپ کو پہچان لے،
اپنی لغزشوں سے توبہ کر لے،
اور کچھ کر گزرنے کا پختہ ارادہ کر لے۔

ایسے شخص کے لیے ایک لمحہ:

اپنی شناخت کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ اپنی قدر پہچانتا ہے،
توبہ کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ اللہ کا محبوب بن جاتا ہے،
ارادے کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ پوری زندگی کو بامقصد بنا دیتا ہے،
مدد کا لمحہ بن جاتا ہے — جس میں وہ کسی کے دل میں ہمیشہ کے لیے جگہ بنا لیتا ہے۔

لہٰذا، زندگی کے ایک ایک لمحے کی قدر کرو، کیونکہ زندگی انہی لمحوں سے بنتی ہے۔ اگر اللہ کی معرفت نصیب ہو جائے، تو ایک لمحہ ہی پوری زندگی کا حاصل بن سکتا ہے۔
اور اگر معرفتِ الٰہی نہ ہو، تو ہزار سال کی عبادت بھی بے سود ہو سکتی ہے۔

“وہ ایک لمحہ ہی سہی جس میں تُو میسر ہو،
اس ایک لمحے سے زیادہ تو زندگی بھی نہیں!”

اگر نماز جیسی عبادت میں اللہ کی حضوری نصیب ہو جائے،
تواس ایک لمحہ میں غلام اور آقا کے درمیان کا رشتہ مضبوط ہو جاتا ہے:

“وہ ایک لمحے کا ساتھ بوقتِ نماز ہے،
محمود آسماں پہ، زمین پر ایاز ہے!”

اس ایک لمحے کی اہمیت کا شدت کے ساتھ احساس، یقیناً اہلِ جنت ہی کو ہوگا — کہ کاش! جو لمحے ہم نے غفلت میں گزارے، انہیں بھی ہم قیمتی بنا لیتے — تو آج ہمارے درجات اور بلند ہوتے۔

پس آؤ!
زندگی کے ایک ایک لمحے کو قیمتی بنائیں۔
اگر ہمیں یہ احساس ہو کہ قیامت کی گھڑی آ گئی ہے
اور بس اتنا ہی وقت باقی ہے کہ ہم کوئی نیکی کا بیج بو سکتے ہیں —
تو اسی آخری لمحے کو استعمال کرتے ہوئے
کسی نیکی کا بیج ضرور بو دیں۔

ممکن ہے کہ یہی بیج حشر کے میدان میں سایہ دار درخت بن جائے،
اسی کے پھول جنت کی کیاریوں کو مہکا دیں،
اور اسی کے پھل جنت کی زندگی کا رزق بن جائیں۔

वो एक पल

इन्सान अगर वक़्त की अहमियत को न समझे तो सौ साल की उम्र भी किसी काम की नहीं। ऐसे शख़्स के लिये सुबह-शाम का ये सिलसिला महज़ एक सिलसिला है जिसमें खाने-पीने, सोने-जागने और ख़ाहिशात पूरी करने के अलावा ज़िन्दगी का कोई मक़सद नहीं। ऐसे शख़्स को अगर हज़ार साला ज़िन्दगी भी दी जाए तो वो भी यूँ ही गुज़र जाएगी कि

सुबह होती है, शाम होती है।
ज़िन्दगी यूँ ही तमाम होती है।।

ऐसा शख़्स समझ रहा होता है कि एक-एक पल बहुत आसानी से कट रहा है, हालाँकि हक़ीक़त में ज़िन्दगी का एक-एक पल उसको काट रहा होता है।

इसके बरख़िलाफ़ अगर किसी इन्सान को वक़्त की अहमियत का अन्दाज़ा हो जाए तो उसका एक-एक पल एक अहद की तरह होता है। और इस तरह ज़िन्दगी की मुख़्तसर से मुख़्तसर तरीन मुद्दत में वो कारनामा अंजाम दे जाता है जिसे पहला शख़्स सदियों में भी अंजाम नहीं दे सकता है। ऐसे शख़्स के एक-एक पल में सदियों का सफ़र सिमट आता है।

वो एक पल जो तेरे इश्तियाक़ में गुज़रा।
उस एक पल में सिमट आए हैं हज़ार बरस।।

लेकिन ऐसा उसी वक़्त होता है जबकि उसकी ज़िन्दगी में कोई ऐसा पल आ जाए जिसमें वो-
अपने-आपको पहचान ले,
अपनी लग़ज़िशों से तौबा कर ले और
कुछ कर गुज़रने का पुख़्ता अहद कर ले।

ऐसे शख़्स के लिये एक पल वो होता है
जिसमें अपने आपको पहचानकर वो ख़ुद को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें अपनी ख़ताओं पर तौबा करके वो ख़ुद को ख़ुदा का मुक़र्रब बना सकता है।
जिसमें कुछ कर गुज़रने का अहद करके वो पूरी ज़िन्दगी को बेश-क़ीमत बना सकता है।
जिसमें किसी की मदद करके वो हमेशा के लिये उसके दिल में अपनी जगह बना सकता है।

लिहाज़ा ज़िन्दगी के एक-एक पल की अहमियत को समझो, क्योंकि एक-एक पल से मिलकर ही ज़िन्दगी बनती है।
ख़ुदा की मअरिफ़त अगर हासिल हो जाए तो एक पल भी पूरी ज़िन्दगी का हासिल हो जाए, ख़ुदा की मअरिफ़त हासिल न हो तो हज़ार साला ज़िन्दगी की इबादत भी किसी काम की नहीं।

वो एक पल ही सही जिसमें तुम मुयस्सर हो।
उस एक पल से ज़्यादा तो ज़िन्दगी भी नहीं।।

अगर नमाज़ जैसी इबादत में ख़ुदा की हुज़ूरी मुयस्सर आ जाए तो ग़ुलाम और आक़ा के दरम्यान का ताल्लुक़ मज़बूत हो जाए

वो एक पल का साथ बवक़्ते-नमाज़ है।
महमूद आसमाँ पे ज़मीं पर अयाज़ है।।

इस एक पल की अहमियत का अन्दाज़ा शिद्दत के साथ यक़ीनन अहले-जन्नत को ही होगा कि काश जो पल भी हमने ग़फ़लत में गुज़ारे उनको भी क़ीमती बना लिया होता तो आज हमारे दरजात और बुलन्द होते।

लिहाज़ा आओ ज़िन्दगी के एक-एक पल को क़ीमती बनाएँ। अगर हम ये देखें कि क़ियामत की घड़ी आ गई है, बस इतना ही वक़्त बाक़ी है कि नेकी का कोई पौदा लगा सकते हैं तो उस आख़िरी पल का इस्तेमाल करते हुए नेकी का कोई न कोई पौदा लगा ही दें। मुमकिन है यही पौदा हश्र के मैदान में घना सायादार दरख़्त बन जाए और उसी दरख़्त के फूलों से जन्नत की क्यारियाँ महक उठें और उसी दरख़्त के बेहतरीन फल हमारी जन्नत की ज़िन्दगी की ग़िज़ा बन जाएँ।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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