مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ، وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ .
नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया जो शख़्स रमज़ान के रोज़े ईमान और एहतिसाब (हुसूले-अज्र व सवाब की नीयत) के साथ रखे, उसके पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर दिये जाते हैं। और जो लैलतुल-क़द्र में ईमान व एहतिसाब के साथ नमाज़ में खड़ा रहे उसके भी पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर दिये जाते हैं।
(हदीस बुख़ारी : 2014)
قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ
नबी (सल्ल०) ने फ़रमाया जिसने रमज़ान के रोज़े ईमान और ख़ालिस नीयत के साथ रखे उसके पिछले गुनाह बख़्श दिये गए।
(सही बुख़ारी : 38)
مَنْ قَامَهُ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا ، غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ
जो शख़्स भी इसमें रमज़ान में ईमान और नीयते-अज्र व सवाब के साथ (रात में) नमाज़ के लिये खड़ा हो उसके पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर दिये जाएँगे।
(हदीस बुख़ारी : 2008)
ये वो हदीसें हैं जो हर साल रमज़ान में क़रीब-क़रीब हर मेम्बर से ख़ूब बयान की जाती हैं, फ़ोकस बस इस बात पर होता है कि जिसने रोज़े रखे और तरावीह पढ़ी उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिये जाते हैं। ये एक ऐसी मीठी गोली है जो हर साल मुसलमान बड़ी तादाद में लेते हैं और बाक़ी के ग्यारह महीनों के लिये सो जाते हैं कि अब हमें कुछ करने की ज़रूरत नहीं है रमज़ान के रोज़े रख लिये मुसलमान बने रहने के लिये काफ़ी है और मग़फ़िरत के परवाने भी इस महीने में ख़ूब बाँटे जाते हैं। उम्मत की एक बड़ी अक्सरियत इसी ग़लतफ़हमी का शिकार है कि हम तो नजातयाफ़्ता हैं।
इन हदीसों में दो अलफ़ाज़ ऐसे इस्तेमाल हुए हैं जिनका या तो मतलब बताया ही नहीं जाता और अगर बताया जाता है तो तोड़-मरोड़ कर, ग़लत तशरीह के साथ। वो अलफ़ाज़ हैं ‘ईमान और एहतिसाब’
तर्जमे में इन दो अलफ़ाज़ को चबाकर पेश किया गया है वज़ाहत के साथ नहीं, जबकि ज़रूरत इन्हीं दो अलफ़ाज़ की वज़ाहत की थी क्योंकि रोज़े और क़ियामुल्लैल के नतीजाख़ेज़ होने यानी पिछले गुनाह माफ़ होने के लिये ये दो अलफ़ाज़ शर्त की हैसियत रखते हैं।
इन दो अलफ़ाज़ का मतलब आपने तर्जमे में देख लिया जिससे मीठी गोली के सिवा कुछ हासिल नहीं होता। होना ये चाहिये इन्हीं दो अलफ़ाज़ पर फ़ोकस किया जाए।
हदीस में लफ़्ज़ ‘ईमान’ का मतलब तो ये कि अल्लाह को मालिक जानते हुए, उसके हुक्म को तस्लीम करते हुए, उसी के लिये और उसकी रज़ा के लिये रोज़ा रखा जाए और क़ियामुल-लैल किया जाए। यानी दिल में किसी को दिखाना या किसी से अज्र व बदले की उम्मीद न हो और न किसी की दाद व तहसीन हासिल करना मक़सद हो।
दूसरे लफ़्ज़ ‘एहतिसाब’ का मतलब ये है कि रोज़ा रखते हुए और क़ियामुल-लैल करते हुए इस बात का जायज़ा लिया जाता रहे कि इन रोज़ों/क़ियामुल-लैल का जो मक़सद अल्लाह ने बताया है वो हासिल हुआ या नहीं, हुआ तो कितना हासिल हुआ? मसलन अल्लाह का तक़वा कितना पैदा हुआ; अल्लाह की नाफ़रमानी से बचने का जज़्बा कितना पैदा हुआ? अल्लाह की ज़मीन पर अल्लाह की बड़ाई को क़ायम करने का जज़्बा कितना पैदा हुआ? सब्र कितना पैदा हुआ, लोगों से ग़मख़ारी का जज़्बा कितना पैदा हुआ, ज़िन्दगी में नज़्म व ज़ब्त कितना आया? वग़ैरा
ये है ईमान और एहतिसाब। अगर इस ईमान और एहतिसाब के साथ रोज़े रखे जाएँ और क़ियामुल्लैल किया जाएगा तो यक़ीनन पिछले गुनाह माफ़ हो जाएँगे और अगर ये ‘ईमान’ और ये ‘एहतिसाब’ नहीं है तो फिर नबी (सल्ल०) ने ये भी फ़रमाया जिसका मफ़हूम कुछ इस तरह से है कि-
कितने ही रोज़ेदार हैं जिन्हें रोज़े में भूख और प्यास के सिवा कुछ हासिल नहीं होता और कितने ही रातों को खड़े होकर नमाज़े पढ़नेवाले ऐसे हैं जिनकों रतजगे के सिवा कुछ हासिल नहीं होता।
नोट : यहाँ पर ये बात भी बहुत अच्छी तरह समझ लेने की है कि इस तरह के कामों से सिर्फ़ सग़ीरा यानी छोटे-छोटे गुनाह ही माफ़ हो सकते हैं। रहे कबीरा गुनाह, वो तो उसी वक़्त माफ़ हो सकते हैं जबकि तौबा की जाए, हक़ीक़ी तौबा। हक़ मारा है तो हक़ अदा किया जाए और कफ़्फ़ारा अदा किया जाए।