हदीस में आता है कि रमज़ान सब्र का महीना है। (नसाई : 2410) और सब्र का बदला जन्नत है। सब्र वो ख़ूबी है जिसके बग़ैर दुनिया का कोई बड़ा काम अंजाम नहीं दिया जा सकता, जिसके बग़ैर किसी आला तहज़ीब और बेहतरीन समाज का तसव्वुर तक नहीं किया जा सकता। सब्र के बग़ैर न तो ईमान का तसव्वुर किया जा सकता है (अल-सिलसिला : 1022) और न ही किसी नेकी का। सब्र से बढ़कर कोई नेमत इतनी बड़ी नहीं है जो अल्लाह ने किसी को अता की हो।(अबू-दाऊद 1644, मुसनद अहमद : 3535)
सब्र एक ऐसी ख़ूबी है कि जिसके पास ये मौजूद है समझ लीजिए उसे दुनिया की बेहतरीन दौलत हासिल है, क्योंकि ये एक ख़ूबी बहुत-सी भलाइयों और अच्छाइयों को अपने अन्दर समेटे हुए है।
अल्लाह की मदद पाने का बेहतरीन ज़रिआ सब्र है, क्योंकि अल्लाह सब्र करनेवालों के साथ होता है।
सब्र एक ऐसी ख़ूबी है जिसका अज्र अल्लाह के नज़दीक बेहिसाब है (क़ुरआन 39 : 10), क्योंकि अल्लाह के लिये सब्र करना बड़ी हिम्मत और हौसले का काम है।
सब्र करनेवालों से अल्लाह मुहब्बत करता है, क्योंकि सब्र नबियों, सिद्दीक़ों और शहीदों की सुन्नत है।
सब्र करने वाले हमेशा ज़िन्दगी से मुत्मइन और पुर-सुकून रहते हैं, क्योंकि सब्र करनेवालों पर अल्लाह की नवाज़िशें और मेहरबानियाँ होती हैं।
मसायब व मुश्किलात के हुजूम में जब इन्सान की अक़्ल काम करना बन्द कर दे और उसकी आँखों के सामने अँधेरा छा जाए तो इस कैफ़ियत में सब्र रौशनी का काम करता है, इसी लिये कहा गया कि सब्र एक रौशनी है। (मुस्लिम 534, नसाई : 2439) लिहाज़ा जिस दिल में सब्र नहीं है उसमें रौशनी नहीं।
सवाल ये है कि आख़िर सब्र का रमज़ान से क्या ताल्लुक़ है?
उर्दू में सब्र से मुराद मजबूरी लिया जाता है, लेकिन अरबी में इसका मफ़हूम बहुत बड़ा और वसीअ (फैला हुआ) है। इस मफ़हूम के मुताबिक़ सब्र कहते हैं “ना-मुवाफ़िक़ हालात (unfavorable condition) में अपने मौक़िफ़ पर जमे रहकर अपने मक़सद को हासिल करने में लगे रहने को।” हदीस में आता है कि “दुश्मन से मुक़ाबले की तमन्ना न करो, लेकिन जब तुम्हारा उनसे मुक़ाबला हो तो सब्र करो।” (मुस्लिम 4541) यहाँ सब्र से मुराद ये है कि दुश्मन के मुक़ाबले में अपने मौक़िफ़ और नज़रिये पर क़ायम रहो। सब्र की एक क़िस्म ये भी है कि जहाँ तक हो सके बन्दा अपने रब और रसूलुल्लाह (सल्ल०) की फ़रमाँबरदारी पर क़ायम रहे और हर हाल में अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी से बचा रहे और इस दौरान जो भी और जितनी भी मुश्किल दरपेश हो उसे अल्लाह के लिये बर्दाश्त करे और उसी से अज्र व सवाब की उम्मीद भी रखे। क़ुरआन कहता है कि बुराई का बदला बेहतरीन भलाई से दो लेकिन ये अज़ीम काम वही कर सकता है जिसके अन्दर सब्र की सिफ़त पाई जाती हो।
सब्र की इस अहमियत के पेशे-नज़र अगर हमारे दिलों में ये ख़ाहिश पैदा होती है कि हमारे दिलों में सब्र कैसे पैदा हो तो रहीम आक़ा (अल्लाह) ने हमारे लिये इस ख़ाहिश की तकमील का इन्तिज़ाम रोज़े की शक्ल में कर दिया है। रोज़ा और सब्र आदमी को क़रीब-क़रीब एक ही मक़सद के लिए तैयार करते हैं, और वो है Self Control (आत्म नियन्त्रण) यानी कितनी ही मुश्किलें क्यों न आएँ, कितना ही लालच क्यों न दिया जाए आदमी हक़ पर जमा रहे।
अगर इस बेश क़ीमत दौलत को हासिल करना चाहते हैं तो जान रखिये अल्लाह की तरफ़ से पूरे साल में रमज़ान ही एक ऐसा महीना है जिसमें इस दौलत को दोनों हाथों से समेटा जा सकता है। प्यारे नबी ने फ़रमाया “रमज़ान सब्र का महीना है।” एक दूसरी हदीस में है कि “रोज़ा आधा सब्र है।” (इब्ने-माजा : 1745, मुसनद अहमद : 5444) यानी रोज़े के ज़रिए अल्लाह आदमी के अन्दर इस तरह सब्र की ख़ूबी पैदा करना चाहता कि वो ख़ुदा की फ़रमाँबरदारी का हक़ अदा करते हुए रूह को पाकीज़गी के उस ऊँचे मक़ाम पर पहुँचा दे कि उससे किसी बुराई का ज़ाहिर होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाए और दुनिया में रहते हुए अपने हुक़ूक़ को माफ़ करने और दूसरों के हुक़ूक़ को अदा करने पर दिल को इत्मीनान हासिल होने लगे।
अल्लाह हमें अपने अन्दर सब्र की ख़ूबी पैदा करने की तौफ़ीक़ अता करे।