पूरी इन्सानी तारीख़ में मुहम्मद (सल्ल०) की शख़्सियत एक ऐसी शख़्सियत है जिन्होंने दुनिया का सबसे अज़ीम कारनामा अंजाम दिया, इस लिहाज़ से आप (सल्ल०) दुनिया की सबसे अज़ीम शख़्सियत (Great Personality) हैं। लेकिन आम चलन के मुताबिक़ आप (सल्ल०) के माननेवालों ने आपकी शख़्सियत को इस तरह ग्लोरिफ़ाई करना शुरू कर दिया कि आपकी शख़्सियत एक डिवाइन शख़्सियत बनकर रह गई और वो मिशन और पैग़ाम कहीं भुला दिया गया, जिसके लिये आपने और आपके साथियों (रज़ि०) ने पूरी ज़िन्दगी मशक़्क़त की और तकलीफ़ें बर्दाश्त कीं। आज लोगों को अक़ीदत के तौर पर इतना तो मालूम है कि मुहम्मद (सल्ल०) ने दुनिया का सबसे अज़ीम कारनामा अंजाम दिया था लेकिन इस कारनामे को अंजाम देने के लिये आपने और आपके साथियों ने किस तरह की क़ुर्बानियाँ दीं और अपने बाद के आनेवालों को क्या ज़िम्मेदारी सौंपी है वो कहीं गुम होकर रह गया है।
मैराज का वाक़िआ हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) की ज़िन्दगी का एक ऐसा वाक़िआ है जिसमें सिर्फ़ तारीफ़ें ही तारीफ़ें (Glorification) बची हैं। रजब के महीने में मैराज के हवाले से जो तक़रीरें की जाती हैं उनमें हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) का सिर्फ़ ग्लोरिफ़िकेशन होता है। मैराज के वाक़िए में जो पैग़ाम था उस पर कहीं कोई बात नहीं होती, इल्ला-माशाअल्लाह। मैराज के वाक़िए से मुताल्लिक़ जो झूट फैलाया जाता है उसको बयान करने से तो कुछ हासिल नहीं है, अलबत्ता इस वाक़िए में जो पैग़ाम हमारे लिये छिपा है उस पर नज़र दौड़ाइए तो मालूम होगा कि अगर हम मैराज के वाक़िए में रसूलुल्लाह (सल्ल०) की ग्लोरिफ़िकेशन के साथ-साथ पैग़ाम पर भी फ़ोकस करें तो हम अपनी इस्लाह और तरक़्क़ी के बहुत-से मौक़े पा सकते हैं।
जन्नत में ग़रीब और जहन्नम में औरतें
मैराज के इस वाक़िए में एक बात सही सनद (बुख़ारी : 6546) के साथ ये मिलती है की जन्नत में जानेवाले सबसे ज़्यादा ग़रीब होंगे और जहन्नम में जानेवालों में सबसे ज़्यादा तादाद औरतों की होगी। इस बात से ये मतलब निकालना दिमाग़ की टेढ़ है कि जन्नत में मालदार और जहन्नम में मर्द नहीं जाएँगे। या इस बात में मालदारों के मुक़ाबले ग़रीबों को और औरतों के मुक़ाबले मर्दों को ज़्यादा अहमियत दी जा रही है। बल्कि ये एक तरह की तंबीह है कि मालदार सचेत हो जाएँ। माल कमाने के सिलसिले में दुनिया के हरीस और लालची बनकर न रह जाएँ, बल्कि हराम-हलाल की हदों का ख़याल रखें। अपने माल पर फूलकर तकब्बुर में न पड़ जाएँ (जो कि अक्सर होता है) बल्कि अपने कमाए हुए माल का सही इस्तेमाल करें। फ़ुज़ूल ख़र्च न करें, अपने मालों में ग़रीबों और नादारों का हक़ समझते हुए उनकी मदद को आगे आएँ ताकि समाज में ग़रीबी और मालदारी के दरम्यान का फ़र्क़ कम से कम हो सके। अगर मालदारों ने ये काम नहीं किया तो उनका ठिकाना यक़ीनी तौर पर जहन्नम होगा। इसी तरह इसमें औरतों को तंबीह की गई है कि वो अपनी कमज़ोरियों पर क़ाबू पाएँ। औरत होने की हैसियत से उनके अन्दर सबसे बड़ी कमज़ोरी ये पाई जाती है कि वो अपने-आपको मर्दों से कमतर समझने लगती हैं। ये कमज़ोरी उन्हें अपनी ज़िम्मेदारियों को अच्छी तरह अदा करने में रुकावट बन जाती है। इसी से उनके अन्दर नाशुक्री का जज़्बा परवान चढ़ने लगता है, जिससे उनके लिये जन्नत के बजाय जहन्नम का रास्ता आसान जाता है। हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने जगह-जगह औरतों के अन्दर से इस एहसासे-कमतरी को दूर करने की कोशिश की है। इस हदीस में भी यही पैग़ाम दिया गया है कि औरतें अपनी कमज़ोरी को दूर करें। अल्लाह ने एक औरत की हैसियत से उन्हें समाज में जो ज़िम्मेदारी सौंपी है वो बहुत बड़ी भी है और अहम भी लिहाज़ा एहसासे-कमतरी से निकलकर अपनी उस ज़िम्मेदारी को अदा करने के लिये मुस्तैद रहें ताकि समाज का ताना-बाना मज़बूत हो और समाज ख़ुशहाल हो सके और उनके लिये जन्नत का रास्ता हमवार हो सके।
सिंबॉलिक वाक़िआत से सबक़
मैराज के हवाले से एक वाक़िआ इस तरह बयान किया जाता है कि नबी (सल्ल०) फ़रमाते हैं कि मेरा गुज़र कुछ ऐसे लोगों पर से हुआ जिनके नाख़ुन ताँबे के थे और वो अपने चेहरों और सीनों को छील रहे थे। पूछा : ये कौन लोग हैं? जवाब दिया गया कि ये वो लोग हैं जो दूसरों का गोश्त खाते थे (यानी ग़ीबत किया करते थे) और उनकी इज़्ज़तों से खेला करते थे। (अबू-दाऊद : 4878; मुसनद अहमद : 10580)
दूसरे वाक़िए में रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने बताया कि मेरा गुज़र कुछ ऐसे लोगों पर हुआ जिनके पेट मकानों की तरह बड़े-बड़े थे और उन पेटों में साँप भरे हुए थे, जो बाहर से नज़र आ रहे थे। पूछा गया ये कौन लोग हैं? जिब्रील ने बताया कि ये “सूदख़ोर” हैं। (इब्ने-माजा : 2273) हालाँकि ये रिवायत ज़ईफ़ है लेकिन एक दूसरी रिवायत जो सही सनद के साथ मुसनद अहमद में है वो इस तरह है कि रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़रमाया : मैराज की रात मैंने एक आदमी को नहर में तैरते हुए देखा, जिसके मुँह में पत्थर फेंके जा रहे थे। मेरे पूछने पर बताया गया कि ये “सूदख़ोर” है। (5962)
तीसरे वाक़िए में रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने बताया कि मैंने मैराज की रात कुछ आदमी देखे जिनकी बाछें आग की क़ैंचियों से काटी जा रही थीं। मैंने पूछा कि ये कौन लोग हैं? जिब्रील (अलैहि०) ने बताया कि ये आपकी उम्मत के वो ख़तीब लोग हैं जो लोगों को नेकी का हुक्म देते थे लेकिन ख़ुद को भूल जाते थे, हालाँकि ये अल्लाह की किताब पढ़ते थे। क्या ये अक़्ल नहीं रखते थे? (सिलसिलतुस सहीहा : 3158; मिश्कत : 4801, 5149)
इन वाक़िआत को हमारे यहाँ देवमालाई क़िस्सों की हैसियत से सुना-सुनाया जाता है मगर अफ़सोस कि इन सिंबॉलिक वाक़िआत में जो खुला पैग़ाम है वो हमने नज़र-अन्दाज़ कर दिया है जिसका नतीजा ये है कि शबे-मैराज को जलसे तो ख़ूब होते हैं मगर मुस्लिम समाज में ग़ीबत भी आम है और सूदख़ोरी भी, और हमारे ख़तीबों की जो सूरते-हाल है वो तो किसी से छिपी हुई नहीं है कि इस तबक़े ने “लिमा-तक़ूलू-न माला-तफ़अलून” (वो बातें कहते क्यों हो जो करते नहीं हो) को सच साबित करते हुए अल्लाह के ग़ज़ब को खुली दावत दे रखी है।
मैराज के हवाले से तीन चीज़ों के अल्लाह की तरफ़ से बतौरे-ख़ास अता किये जाने का ज़िक्र मिलता है
1) पाँच नमाज़ें, 2) सूरा बक़रा की आख़िरी आयतें और 3) पूरी उम्मत की माफ़ी, बशर्ते-कि वो अल्लाह के साथ शिर्क न कर रहे हों।
इस हवाले से भी अगर ग़ौर किया जाए तो मालूम होगा कि हम मुसलमान नमाज़ की अहमियत को भुला चुके हैं जो कि पूरे दीन की इमारत में बुनियादी सुतून की हैसियत रखती हैं। एक बड़ी तादाद तो नमाज़ के क़रीब नहीं आती, जो लोग नमाज़ के पाबन्द हैं वो इसके इन्क़िलाबी पहलू को यकसर नज़र-अन्दाज़ किये बैठे हैं।
सूरा बक़रा की आख़िरी आयात की तो ख़ैर बात करना ही बे-माना हो जाता है जबकि उम्मत का एक बड़ा तबक़ा क़ुरआन को समझकर पढ़ने से ही फ़ारिग़ है।यक़ीन जानिये अगर हमने सूरे बक़रा की आख़िरी आयात को समझकर पढ़ा होता तो न सिर्फ़ हमारे आपसी लेन-देन के मामलात दुरुस्त होते बल्कि हम दुनिया में अपनी हैसियत से भी आगाह होते, अल्लाह और रसूल पर ईमान की हक़ीक़त को भी समझ रहे होते और अपने आपको ख़ुदा के सामने सरंडर करके उसी से नुसरत और मदद के तलबगार होते।
रही तीसरी बात तो इस सिलसिले में सूरा यूसुफ़ की वो आयत हम पर पूरी तरह सच साबित होती है कि ईमान का दावा करनेवाले अक्सर लोग शिर्क करते हैं। क्योंकि सिर्फ़ बुतों के सामने सर झुकाने को ही शिर्क नहीं कहते, बल्कि कोई अमल लोगों को दिखाने के लिये करना भी शिर्क है, तकब्बुर करना और किसी को हक़ीर व कमतर समझना भी शिर्क है और एक अल्लाह की ग़ुलामी के सिवा किसी और की ग़ुलामी को तस्लीम कर लेना और उस हालत में फलने-फूलने के मंसूबे बनाते रहना भी शिर्क है।
आज हमारे लिये ज़रूरी है कि हम रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत के हक़ीक़ी पहलू को सामने रखकर हर वाक़िए में असल पैग़ाम को समझने और उस पर अमल करने की कोशिश करें।