मुसलमानों का कारनामा
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मुसलमानों का एक ज़बरदस्त कारनामा ये है कि इन्होंने क़ुरआन के अलफ़ाज़ को इस तरह याद रखा है कि जिसकी मिसाल दुनिया की तारीख़ में नहीं मिलती। मगर इसी के साथ-साथ एक बड़ा और बहुत बड़ा ज़ुल्म ये भी किया है कि इन्होंने क़ुरआन के मतलब और मफ़हूम को इस मुजरिमाना तरीक़ से नज़र-अन्दाज़ किया है जिसकी मिसाल भी दुनिया की तारीख़ में नहीं मिलती। जिसका नतीजा ये निकला कि क़ुरआन की असर-पज़ीरी उसी तरह नदारद है जिस तरह किसी रौशन चराग़ (सूरज) को गहन लग जाता है। क़ुरआन के मतालिब और मफ़हूम के गुम हो जाने से नतीजा ये निकला कि ग़ैर-क़ुरआनी और ग़ैर-इस्लामी नज़रियात ने क़ुरआनी फ़िक्र और नज़र की जगह ले ली। शख़्सियत-परस्ती ने उसूल-परस्ती की जगह ले ली। दीन की जगह मज़हब आ गया यानी दीन जो कि एक निज़ामे-ज़िन्दगी और ज़ाब्ताए-हयात था उसकी जगह मज़हब और रुसूमात ने इस तरह अपनी जड़ें मज़बूत कर लीं मानो चन्द रुसूमात ही दीन बन गए। अक़्लो-ख़िरद और फ़िक्रो-तदब्बुर की जगह अन्धी तक़लीद विराजमान हो गई। सोचने-समझने की सलाहियत जब फ़ालिज की ज़द में आ गई तो अमल भी सूखता चला गया। कहीं तो दुनिया और दुनिया की ज़िन्दगी को क़ाबिले-नफ़रत बताकर ख़ुद का तराशा हुआ अक़ीदाए-आख़िरत पेश किया जिससे मुसलमान बदतरीन क़िस्म की रहबानियत की दलदल में फँस गए और दुनिया को कुछ देने के बजाय लेने के हरीस बन गए और नतीजतन ग़ुलाम बनकर ज़िन्दगी गुज़ारने को ही अपना मुक़द्दर तस्लीम कर लिया और कहीं दुनिया को ही असल मक़सूद बताकर आख़िरत फ़रामोशी को फ़ैशन बना लिया गया, नतीजतन दीन इस तरह क़ाबिले-नफ़रत ठहरा कि मुसलमान और ना-मुसलमान का फ़र्क़ ही मिटाकर रख दिया गया, यानी मुसलमान औरतें मुस्लिम ख़ातून बनकर रहने में ज़िल्लत महसूस करने लगीं और मेम या श्रीमति बनने में फ़ख़्र; और मुसलमान मर्द अपने आपको मुसलमे-ख़ालिस बताने में ज़िल्लत महसूस करने लगे और अपना तआरुफ़ एक आज़ाद ख़याल इंसान के तौर पर कराने में फ़ख़्र का एहसास करने लगे।
होना ये चाहिये कि जिस तरह मुसलमानों ने क़ुरआन के अलफ़ाज़ को दाँतों से पकड़ा हुआ है उसी तरह इसके मतालिब व मफ़हूम को समझने की तरफ़ न सिर्फ़ तवज्जोह की जाए बल्कि एक-एक मुसलमान को क़ुरआन का मुददुआ और मक़सद वाज़ेह कर देने पर सारा ज़ोर लगा दिया जाए। हर मुसलमान को ख़ास तौर से हर नौजवान को इस बात का यक़ीन दिलाया जाए कि तुम क़ुरआन को समझ सकते हो। क़ुरआन को समझने का एक ही तरीक़ा है, और वो ये कि इसको अपनी ज़िन्दगी में लागू करने का अहद किया जाए। क़ुरआन को न सिर्फ़ पढ़ा और समझा जाए बल्कि इसको इस तरह जिया जाए कि हर मुसलमान या कम से कम मुसलमानों की एक बड़ी तादाद क़ुरआन का चलता-फिरता नमूना नज़र आने लगे। हर मुसलमान इन्सानियत के लिये फ़ैज़ का ज़रिआ बन जाए और अम्न-व-इन्साफ़ का अलम्बरदार भी। इल्मो-हिकमत से सरशार होकर दुनिया की बुलन्दियों को भी छूने लगे और ख़ुदा के सामने झुककर अपने-आपको ज़मीन के उस मक़ाम पर ले जाए जहाँ उसे हर इन्सान का दर्द महसूस होने लगे। ज़ालिमों के ज़ुल्म को मिटाने की प्लानिंग इतने मज़बूत इरादे के साथ करे जैसे हमेशा उसे इसी दुनिया में रहना है, लेकिन अल्लाह के सामने झुकने और ख़ुदा की राह में इन्सानों पर ख़र्च करने का काम इस तरह अंजाम दे कि जैसे उसे अगले ही पल इस दुनिया से रुख़सत हो जाना है और बारगाहे-ख़ुदावन्दी में पेश हो जाना है।