बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल
कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का
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मुश्किल अलफ़ाज़
ख़ंदा-हा-ए-गुल = तमाम फूलों की हँसी
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मतलब
बुलबुल गुल का आशिक़ होता है। इस आशिक़ी में वो दीवाना होता है। लेकिन गुल इस इश्क़ के अंजाम को समझते हैं इसलिये वो बुलबुल के इश्क़ पर हँसते हैं और बुलबुल की अक़्ल पर मातम करते हुए कहते हैं कि गुल एक आरिज़ी और वक़्ती चीज़ है बहुत जल्द गुल का हुस्न फ़ना के घाट उतर जाने वाला है। अगर बुलबुल को ये बात मालूम हो जाए तो हरगिज़ इश्क़ में दीवाना और पागल न हो।
इस शेर के ज़रिए तमाम आशिक़ों को ये पैग़ाम है कि इश्क़ अगर वक़्ती चीज़ों से होगा तो ये इश्क़ नहीं बल्कि दिमाग़ का ख़लल और पागलपन है। इसलिये इश्क़ उस चीज़ से होना चाहिये जो पाएदार हो, हमेशा रहनेवाली हो, जिससे कि इश्क़ भी पाएदार हो जाए।
“हालाँकि ईमान रखनेवाले लोगों को सबसे बढ़कर अल्लाह से मुहब्बत होती है।” (क़ुरआन 2 : 165)