
क़ुरआन मजीद एक ऐसी किताब है कि अगर मुसलमान इसका हक़ अदा करें तो ये उन्हें तरक़्क़ी के बुलन्द मक़ाम पर पहुँचा सकती है, हक़ अदा न करने की सूरत में पस्ती की हालत तो सारा ज़माना देख ही रहा है।
अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने मुसलमानों के अन्दर क़ुरआन का शौक़ जगाने के लिये बहुत-सी सूरतों को पढ़ने पर फ़ज़ायल बयान किये हैं ताकि वो उन सूरतों को बतौरे-ख़ास पढ़ें और उनके अन्दर जो इन्क़िलाब की रूह छिपी हुई है उस तक पहुँचें। हालाँकि बयान की गई इन फ़ज़ीलतों में अक्सर हदीसें ज़ईफ़ और घड़ी हुई हैं लेकिन कुछ हदीसें सही सनद के साथ भी बयान हुई हैं। उनमें से सूरा कहफ़ के हवाले से बयान की गई हदीसें सही हैं जिनमें कहा गया कि सूरा कहफ़ पढ़ने से इन्सान दज्जाल के फ़ितने से महफ़ूज़ हो जाएगा (अबू-दाऊद : 4323, अहमद 8664, 65; तिर्मिज़ी : 2886)। (मुस्लिम :1883 में पहली दस आयतों के हिफ़्ज़ करने का ज़िक्र है।) और जुमा के दिन इस सूरा को पढ़ने से दूसरे जुमे तक के लिये एक ख़ास नूर रौशन कर दिया जाता है। (हाकिम 3392) एक और हदीस में है कि जो शख़्स सूरा कहफ़ इस तरह पढ़े जिस तरह ये नाज़िल हुई है तो ये क़ियामत में उसके लिये उसके खड़ा होने की जगह से मक्का तक रौशनी बन जाएगी। (हाकिम : 2072)
ग़ौर करने की बात ये है कि इस सूरा में ऐसी क्या ख़ास बात है जिसकी वजह से इस सूरा में दज्जाल से महफ़ूज़ रहने और नूर पैदा होने की फ़ज़ीलत बयान की गई है। इस सिलसिले में सबसे पहले तो दज्जाल को और फ़ितने को समझना होगा और फिर इस बात को समझना होगा कि इस सूरा की वो असल रूह क्या है जिस तक पहुँचाने के लिये रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने इस सूरा की फ़ज़ीलत बयान की है।
दज्जाल किसे कहते हैं?
दज्जाल के सिलसिले में हम उस लम्बी बहस में नहीं जाना चाहते हैं जिसमें दज्जाल को लेकर अलग-अलग रायें पाई जाती हैं। कुछ का मानना है कि दज्जाल एक कैफ़ियत का नाम है जो हर ज़माने में पाई जाती है। इसीलिये तमाम ही नबियों ने अपने-अपने उम्मतियों के लिये दज्जाल से पनाह माँगी है। उनका कहना है कि “दज्जाल” लफ़्ज़ ‘द ज ल’ से बना है जिसका मतलब झूट बोलना, धोखा देना, हक़ीक़त पर पर्दा डालना होता है। दज्जाल का मतलब होता है “झूट बोलनेवाला”, “फ़रेब और धोखे में रखनेवाला” और “हक़ीक़त को छिपा देनेवाला”। इस ऐतिबार से देखा जाए तो दुनिया एक धोखा ही है क्योंकि इन्सान इसी को असल मान लेता है और आख़िरत की असल ज़िन्दगी से धोखे में पड़ जाता है। दुनिया के इस धोखे से सचेत करने के लिये ही अल्लाह ने अपने पैग़म्बरों को भेजा है। अब चूँकि ये कैफ़ियत हर ज़माने में पाई जाती रही है लिहाज़ा नबियों ने इसी “दज्जाल” से अपने ज़माने के लोगों को सचेत किया है।

कुछ लोगों का मानना है कि दज्जाल हक़ीक़ी दीन (इस्लाम) के ख़िलाफ़ एक पूरे सिस्टम का नाम है। क्योंकि हदीस में आता है कि दज्जाल के साथ रोटी और गोश्त के पहाड़ होंगे और पानी का दरिया होगा (मुस्लिम 7379)। चूँकि एक हदीस से ये भी मालूम होता है कि दज्जाल यहूदी होगा (मुस्लिम : 7349) इसलिये ये ख़याल भी ज़ाहिर किया जाता है कि मौजूदा यहूदी निज़ाम ही दरअसल दज्जाल है, जिसने क़रीब-क़रीब तमाम वसायल पर क़ब्ज़ा किया हुआ है।
कुछ लोगों का मानना है कि हदीस के अलफ़ाज़ से ये बात मालूम होती है कि वो कोई आदमी होगा जो बहुत ताक़तवर होगा, वो एक आँख वाला होगा और माथे पर ‘क फ़ र’ लिखा होगा। लिहाज़ा ये आदमी क़ियामत के क़रीब किसी वक़्त निकलेगा। और ये कोई एक नहीं होगा बल्कि हदीस में इनकी तादाद तीस बयान की गई है। (मुसनद अहमद : 12453)

कोई शख़्स इनमें से चाहे किसी एक बात को मानता हो या तीनों को किसी भी कंडीशन में उस फ़ित्नाए-दज्जाल से बचने के लिये सूरा कहफ़ के पैग़ाम को समझना ज़रूरी है।

फ़ितना किसे कहते हैं?
अरबी ज़बान में ‘फ़ त न’ के माना सोने को आग में पिघलाने के होते हैं ताकि उसका खोट निकल जाए और उसका खरा होना मालूम हो जाए। (51 : 13) इससे ये बात मालूम होती है कि फ़ितने से मुराद है किसी की असलियत को जानना और पहचानना। इस अमल को हमारी ज़बान में आज़माइश भी कहते हैं। क़ुरआन मजीद में आया है कि “हम तुम्हें शर और ख़ैर में मुब्तला करके आज़माते रहते हैं। (21:35) जहाँ माल और औलाद को फ़ितना कहा है (8 : 28) उससे मुराद यही आज़माइश है। यानी माल और औलाद इन्सान के लिये इस बात की आज़माइश हैं कि ख़ुदा से उसकी मुहब्बत खरी है या उसमें माल और औलाद की मुहब्बत का खोट आ चुका है। इसी से ये बात भी मालूम हुई कि फ़ितनाए-दज्जाल से मुराद ये है कि जब दज्जाल का कोई दज्ल इन्सान के सामने आए तो वो उससे मुतास्सिर होता है या ख़ुदा की मुहब्बत पर क़ायम रहता है।
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