क़ुरआन से दूरी का ही नतीजा है कि आज हिन्दुस्तानी मुसलमानों की बड़ी अक्सरियत ये समझती है कि मर्द के पास औरत को तलाक़ देने का सिर्फ़ एक ही तरीक़ा है और वह है एक ही महफ़िल में ‘तलाक़, तलाक़, तलाक़’ कह देना। वे समझते हैं कि जब तक तलाक़ लफ़्ज़ का इस्तेमाल तीन बार न हो तब तक तलाक़ होती ही नहीं है। हालाँकि अगर वे क़ुरआन को समझकर पढ़ते या उन्हें किसी और किताब के अलावा क़ुरआन को पढ़ने, सुनने और समझने का आदी बनाया गया होता तो उन्हें यह ज़रूर मालूम होता कि इस्लाम में निकाह व तलाक़ का सही तरीक़ा क्या है? और निकाह व तलाक़ का जो तरीक़ा क़ुरआन ने मुतैय्यन किया है दुनिया की किसी मुहज़्ज़बतरीन क़ौम में भी उसका तसव्वुर तक नहीं पाया जाता।
इस नासमझी का ही नतीजा है कि आज हुक़ूक़े-निस्वाँ के नाम पर नाम-निहाद मुसलमानों में से मज़हब-बेज़ार मर्द व ख़वातीन की एक ऐसी फ़ौज खड़ी हो गई है जिसे क़ुरआन में हुक़ूक़ तो नज़र आते हैं लेकिन फ़राइज़ का एक लफ़्ज़ भी उनको छू कर नहीं गुज़रता, और वो आज हुकूमत के हाथों कठपुतली बनकर ख़ुद अपने ही समाज को बर्बाद करने पर तुली हुई है।
बिला शुबह एक महफ़िल में तीन तलाक़ का तरीक़ा ग़ैर-क़ुरआनी तो है ही, ग़ैर-अख़लाक़ी भी है लेकिन उसके बावजूद तलाक़ हो जाती है। इसमें भी कोई शक नहीं है कि एक ही महफ़िल में तीन तलाक़ के इस अमल से ख़वातीन के ऊपर ज़ुल्म भी हुआ है और इससे इस्लाम की तस्वीर भी बढ़ी हद तक ख़राब हुई है। इस तरह की तलाक़ का एक कडुआ सच ये भी है कि इस तरीक़े में जो भी नुक़सान होता है उसे भी बड़ी हद तकऔरत को ही उठाना पड़ता है। नबी करीम (सल्ल०) या हज़रत उमर (रज़ि०) के ज़माने में इस तरह की तलाक़ जब दी गई तो उस पर न सिर्फ़ नापसन्दीदगी का इज़हार किया गया था बल्कि तलाक़ देनेवाले को सज़ा भी दी गई थी। हमारे समाज में उलमा ने एक ही महफ़िल में तीन बार तलाक़ कह देने से तलाक़ कराकर एक ख़ानदान को बरबाद होने पर मजबूर तो कर दिया, लेकिन मर्द को कोई सज़ा मुतैयन नहीं की। इसे भी एक तरह की ज़्यादती ही तस्लीम किया जाएगा, जिसकी इस्लाह व सुधार का कोई न कोई रास्ता निकाला जाना इन्तिहाई ज़रूरी है, लेकिन इसके बावजूद हुकूमत के ज़रिए मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी तब्दीली को गवारा नहीं किया जा सकता।
बेशक इस वक़्त इस बात की सख़्त ज़रूरत है कि पूरी मिल्लते-इस्लामिया मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए मुत्तहिद हो, लेकिन इससे भी कहीं ज़्यादा ज़रूरत इस बात की है कि तमाम मुसलमानों को (आम तौर से, और मुस्लिम नौजवानों और ख़वातीन को ख़ास तौर से) क़ुरआन से वाबस्ता किया जाए और उन्हें क़ुरआन को समझकर पढ़ने पर उभारा जाए ताकि उनका न सिर्फ़ ईमान मज़बूत हो बल्कि उन्हें अपने हुक़ूक़ के साथ अपने फ़राइज़ और ज़िम्मेदारियों का भी इदराक हो और वे अपने ऊपर आयद ज़िम्मेदारियों को अदा करके दुनिया को दिखा सकें कि इस्लाम हुक़ूक़े-इन्सानी की अदायगी और क़ियामे-इन्साफ़ के सिलसिले में सबसे ज़्यादा हस्सास है, बल्कि वो अल्लाह की तरफ़ से भेजा ही इसलिए गया है कि तमाम इन्सानों को ज़ुल्म से नजात दिला सके।