हमारे मुआशरे में कुछ शख़्सियात और कुछ चीज़ें ऐसी हैं कि जिनका अदब व एहतिराम, पास व लिहाज़ बहुत ज़रूरी है, लेकिन ये भी देखा जाते रहना चाहिये कि कहीं ये आपकी ज़िन्दगी को तबाह और आख़िरत को बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं?
*1) वालिदैन :* वालिदैन का अदब व एहतिराम इन्तिहाई ज़रूरी है, क़ुरआन और हदीस में अल्लाह के बाद इन्हीं के अदब और ताज़ीम करने और हुक्म बजा लाने की ताकीद की गई है, लेकिन ध्यान रहे कि कहीं ऐसा न हो कि इनका हुक्म बजा लाने में हद से इतने आगे बढ़ जाएँ कि अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म पामाल हो जाए, इनके अदब व एहतिराम में इतने आगे न बढ़ जाएँ कि वो आप पर और आपके बीवी-बच्चों पर ज़ुल्म करें और आप ख़ामोश तमाशाई बने रहें। लेकिन याद रहे कि किसी भी ज़ुल्म ज़्यादती से अपने-आपको और अपने बीवी-बच्चों को बचाने के लिये कोई ऐसा तरीक़ा हरगिज़ इख़्तियार न करें जिससे उनके सामने उफ़्फ़ भी निकले, उनसे बात इस अन्दाज़ से करें कि आपके बाज़ू इन्तिहाई नर्मी के साथ उनके सामने बिछे रहें।
*2) आलिम / मुअल्लिम :* आलिम और मुअल्लिम (Teacher) का अदब और एहतिराम हमारे ऊपर वाजिब और ज़रूरी है क्योंकि उलमा अंबिया के वारिस होते हैं और इल्म के सोते मुअल्लेमीन के वुजूद से ही फूटते हैं। उलमा / मुअल्लेमीन इल्म की क़िन्दीलें जलाकर मुआशरे को रौशन रखते हैं, लेकिन अगर वो उन क़िन्दीलों पर दायरे बनाने लगें और आपको बस उसी दायरे में रहकर इल्म हासिल करने का पाबन्द बनाएँ तो समझ लीजिये कि ये बहुत बड़ा फ़ितना हैं। आलिम/मुअल्लिम वो है जो इल्म की क़िन्दील आने वाली नस्लों को इस ग़रज़ से पकड़ाता है कि वो उसे न सिर्फ़ ये कि रौशन रखेंगे बल्कि उसकी रौशनी को और तेज़ करेंगे और उसके ज़रिए से पूरे माहौल को रौशन रखेंगे, लेकिन अगर वो सिर्फ़ अपनी ही क़िन्दील के गिर्द लोगों को जमा रखना चाहते हों और क़िन्दील की हर बढ़ती रौशनी को देखकर उनका दम घुटता हो तो समझ लीजिये कि ये आपके सबसे बड़े दुश्मन हैं। ऐसे में आँखों पर पट्टी बाँधकर उलमा और मुअल्लेमीन का हुक्म मानना एक ऐसी गुमराही है जिससे कोई क़ौम कभी राहे-रास्त नहीं पा सकती। लिहाज़ा इन्तिहाई अदब और एहतिराम के साथ उनकी बातों से इख़्तिलाफ़ करना और उनकी ग़लत बातों को रद्द करना आपके ऊपर फ़र्ज़ है।
*3) अक़ीदे :* किसी भी दीन और नज़रिये के कुछ बुनियादी अक़ीदे होते हैं। अगर उन अक़ीदों को सही से न समझा जाए और उन पर पुख़्ता यक़ीन न रखा जाए तो वो दीन और नज़रिया न सिर्फ़ ये कि आगे नहीं बढ़ पाएगा बल्कि एक दिन या तो वो तहलील (Dilute) होकर रह जाएगा या फिर सफ़हे-हस्ती से ही मिट जाएगा। लिहाज़ा अक़ीदे को समझना और उस पर मज़बूती के साथ जमे रहना उस दीन को मानने वाले हर शख़्स पर अव्वलीन फ़र्ज़ बनता है। मगर दीन और नज़रियात के साथ ये हादसा पेश आता है कि उनके बुनियादी अक़ीदों के साथ कुछ ग़ैर-ज़रूरी बातें भी अक़ीदे का दर्जा हासिल कर लेती हैं और जो बुनियादी अक़ीदा है वो कहीं दब कर या सिकुड़ कर रह जाता है। लिहाज़ा ज़रूरी है कि जायज़ा लिया जाता रहे कि बुनियादी अक़ीदा मज़बूत बना रहे और कोई भी सेन्स-लेस बात अक़ीदे के क़रीब भी फटकने न पाए। अगर इस बात की एहतियात शुरू में न रखी गई तो बाद के ज़माने में उन बातों को अक़ीदे की फ़ेहरिस्त निकाल फेंकना इन्तिहाई मुश्किल काम हो जाता है।
जैसा कि हम आजकल देख रहे हैं कि दीने-इस्लाम में बहुत-सी ऐसी सेन्स-लेस बातें दाख़िल हो चुकी हैं जिन्होंने अक़ीदे की हैसियत इख़्तियार कर ली है और अब उनको निकाल फेंकना तो बहुत दूर की बात छाँट पाना भी इन्तिहाई मुश्किल काम हो गया है। यहाँ पर ये बात भी नोट कर लेने की है कि दीने-इस्लाम का एक ज़बरदस्त पहलू ये है कि इसके बुनियादी अक़ीदे इसके माननेवालों के दरम्यान इतने आम और और पुख़्ता हैं कि सेन्स-लेस बातों के दाख़िल हो जाने और उनके अक़ीदा बन जाने के बावजूद न तो ये तहलील हो पाएगा और न ख़त्म हो पाएगा, मगर इसके जो हक़ीक़ी फ़ायदे और बरकतें हैं उन्हें लोग तभी हासिल कर पाएँगे जब उन सेन्स-लेस बातों को ख़ालिस अक़ीदों से छाँटकर अलग कर दिया जाएगा।
*4) कल्चर और रिवायात :* किसी भी क़ौम का एक कल्चर हुआ करता है जिससे उस क़ौम की पहचान होती है, लिहाज़ा उस क़ौम के लोगों को चाहिये कि वो अपने उस कल्चर की पासदारी करें। इसी के साथ कुछ रिवायात भी होती हैं जो बहुत पीछे से चली आ रही होती हैं, लिहाज़ा ज़रूरी है कि उन रिवायात की भी पासदारी की जाए। लेकिन अक्सर व बेश्तर होता ये है कि कल्चर में वक़्त के चलते जिहालत की आमेज़िश हो जाती है और रिवायतें फ़रसूदा होकर रह जाती हैं। अगर यहाँ भी आँखों पर पट्टी बाँधकर उस कल्चर और उन रिवायात की पासदारी की जाने लगे तो क़ौम कभी तरक़्क़ी के रास्ते पर गामज़न नहीं हो सकती। लिहाज़ा क़ौम के होशमन्द लोगों की ये ज़िम्मेदारी है कि फ़रसूदा रिवायतों का ख़ात्मा करें और कल्चर में जिहालत की आमेज़िश को जिहालत से पाक और साफ़ करें ताकि ज़माने की बढ़ती रफ़्तार के साथ क़दम से क़दम मिलकर क़ौम आगे बढ़ सके।