तबाह करने वाली चीज़ों से बचाओ

तबाह करने वाली चीज़ों से बचाओ

हमारे मुआशरे में कुछ शख़्सियात और कुछ चीज़ें ऐसी हैं कि जिनका अदब व एहतिराम, पास व लिहाज़ बहुत ज़रूरी है, लेकिन ये भी देखा जाते रहना चाहिये कि कहीं ये आपकी ज़िन्दगी को तबाह और आख़िरत को बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं?

*1) वालिदैन :* वालिदैन का अदब व एहतिराम इन्तिहाई ज़रूरी है, क़ुरआन और हदीस में अल्लाह के बाद इन्हीं के अदब और ताज़ीम करने और हुक्म बजा लाने की ताकीद की गई है, लेकिन ध्यान रहे कि कहीं ऐसा न हो कि इनका हुक्म बजा लाने में हद से इतने आगे बढ़ जाएँ कि अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म पामाल हो जाए, इनके अदब व एहतिराम में इतने आगे न बढ़ जाएँ कि वो आप पर और आपके बीवी-बच्चों पर ज़ुल्म करें और आप ख़ामोश तमाशाई बने रहें। लेकिन याद रहे कि किसी भी ज़ुल्म ज़्यादती से अपने-आपको और अपने बीवी-बच्चों को बचाने के लिये कोई ऐसा तरीक़ा हरगिज़ इख़्तियार न करें जिससे उनके सामने उफ़्फ़ भी निकले, उनसे बात इस अन्दाज़ से करें कि आपके बाज़ू इन्तिहाई नर्मी के साथ उनके सामने बिछे रहें।

*2) आलिम / मुअल्लिम :* आलिम और मुअल्लिम (Teacher) का अदब और एहतिराम हमारे ऊपर वाजिब और ज़रूरी है क्योंकि उलमा अंबिया के वारिस होते हैं और इल्म के सोते मुअल्लेमीन के वुजूद से ही फूटते हैं। उलमा / मुअल्लेमीन इल्म की क़िन्दीलें जलाकर मुआशरे को रौशन रखते हैं, लेकिन अगर वो उन क़िन्दीलों पर दायरे बनाने लगें और आपको बस उसी दायरे में रहकर इल्म हासिल करने का पाबन्द बनाएँ तो समझ लीजिये कि ये बहुत बड़ा फ़ितना हैं। आलिम/मुअल्लिम वो है जो इल्म की क़िन्दील आने वाली नस्लों को इस ग़रज़ से पकड़ाता है कि वो उसे न सिर्फ़ ये कि रौशन रखेंगे बल्कि उसकी रौशनी को और तेज़ करेंगे और उसके ज़रिए से पूरे माहौल को रौशन रखेंगे, लेकिन अगर वो सिर्फ़ अपनी ही क़िन्दील के गिर्द लोगों को जमा रखना चाहते हों और क़िन्दील की हर बढ़ती रौशनी को देखकर उनका दम घुटता हो तो समझ लीजिये कि ये आपके सबसे बड़े दुश्मन हैं। ऐसे में आँखों पर पट्टी बाँधकर उलमा और मुअल्लेमीन का हुक्म मानना एक ऐसी गुमराही है जिससे कोई क़ौम कभी राहे-रास्त नहीं पा सकती। लिहाज़ा इन्तिहाई अदब और एहतिराम के साथ उनकी बातों से इख़्तिलाफ़ करना और उनकी ग़लत बातों को रद्द करना आपके ऊपर फ़र्ज़ है।

*3) अक़ीदे :* किसी भी दीन और नज़रिये के कुछ बुनियादी अक़ीदे होते हैं। अगर उन अक़ीदों को सही से न समझा जाए और उन पर पुख़्ता यक़ीन न रखा जाए तो वो दीन और नज़रिया न सिर्फ़ ये कि आगे नहीं बढ़ पाएगा बल्कि एक दिन या तो वो तहलील (Dilute) होकर रह जाएगा या फिर सफ़हे-हस्ती से ही मिट जाएगा। लिहाज़ा अक़ीदे को समझना और उस पर मज़बूती के साथ जमे रहना उस दीन को मानने वाले हर शख़्स पर अव्वलीन फ़र्ज़ बनता है। मगर दीन और नज़रियात के साथ ये हादसा पेश आता है कि उनके बुनियादी अक़ीदों के साथ कुछ ग़ैर-ज़रूरी बातें भी अक़ीदे का दर्जा हासिल कर लेती हैं और जो बुनियादी अक़ीदा है वो कहीं दब कर या सिकुड़ कर रह जाता है। लिहाज़ा ज़रूरी है कि जायज़ा लिया जाता रहे कि बुनियादी अक़ीदा मज़बूत बना रहे और कोई भी सेन्स-लेस बात अक़ीदे के क़रीब भी फटकने न पाए। अगर इस बात की एहतियात शुरू में न रखी गई तो बाद के ज़माने में उन बातों को अक़ीदे की फ़ेहरिस्त निकाल फेंकना इन्तिहाई मुश्किल काम हो जाता है।

जैसा कि हम आजकल देख रहे हैं कि दीने-इस्लाम में बहुत-सी ऐसी सेन्स-लेस बातें दाख़िल हो चुकी हैं जिन्होंने अक़ीदे की हैसियत इख़्तियार कर ली है और अब उनको निकाल फेंकना तो बहुत दूर की बात छाँट पाना भी इन्तिहाई मुश्किल काम हो गया है। यहाँ पर ये बात भी नोट कर लेने की है कि दीने-इस्लाम का एक ज़बरदस्त पहलू ये है कि इसके बुनियादी अक़ीदे इसके माननेवालों के दरम्यान इतने आम और और पुख़्ता हैं कि सेन्स-लेस बातों के दाख़िल हो जाने और उनके अक़ीदा बन जाने के बावजूद न तो ये तहलील हो पाएगा और न ख़त्म हो पाएगा, मगर इसके जो हक़ीक़ी फ़ायदे और बरकतें हैं उन्हें लोग तभी हासिल कर पाएँगे जब उन सेन्स-लेस बातों को ख़ालिस अक़ीदों से छाँटकर अलग कर दिया जाएगा।

*4) कल्चर और रिवायात :* किसी भी क़ौम का एक कल्चर हुआ करता है जिससे उस क़ौम की पहचान होती है, लिहाज़ा उस क़ौम के लोगों को चाहिये कि वो अपने उस कल्चर की पासदारी करें। इसी के साथ कुछ रिवायात भी होती हैं जो बहुत पीछे से चली आ रही होती हैं, लिहाज़ा ज़रूरी है कि उन रिवायात की भी पासदारी की जाए। लेकिन अक्सर व बेश्तर होता ये है कि कल्चर में वक़्त के चलते जिहालत की आमेज़िश हो जाती है और रिवायतें फ़रसूदा होकर रह जाती हैं। अगर यहाँ भी आँखों पर पट्टी बाँधकर उस कल्चर और उन रिवायात की पासदारी की जाने लगे तो क़ौम कभी तरक़्क़ी के रास्ते पर गामज़न नहीं हो सकती। लिहाज़ा क़ौम के होशमन्द लोगों की ये ज़िम्मेदारी है कि फ़रसूदा रिवायतों का ख़ात्मा करें और कल्चर में जिहालत की आमेज़िश को जिहालत से पाक और साफ़ करें ताकि ज़माने की बढ़ती रफ़्तार के साथ क़दम से क़दम मिलकर क़ौम आगे बढ़ सके।

Hindi

हमारे मुआशरे में कुछ शख़्सियात और कुछ चीज़ें ऐसी हैं कि जिनका अदब व एहतिराम, पास व लिहाज़ बहुत ज़रूरी है, लेकिन ये भी देखा जाते रहना चाहिये कि कहीं ये आपकी ज़िन्दगी को तबाह और आख़िरत को बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं?

*1) वालिदैन :* वालिदैन का अदब व एहतिराम इन्तिहाई ज़रूरी है, क़ुरआन और हदीस में अल्लाह के बाद इन्हीं के अदब और ताज़ीम करने और हुक्म बजा लाने की ताकीद की गई है, लेकिन ध्यान रहे कि कहीं ऐसा न हो कि इनका हुक्म बजा लाने में हद से इतने आगे बढ़ जाएँ कि अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म पामाल हो जाए, इनके अदब व एहतिराम में इतने आगे न बढ़ जाएँ कि वो आप पर और आपके बीवी-बच्चों पर ज़ुल्म करें और आप ख़ामोश तमाशाई बने रहें। लेकिन याद रहे कि किसी भी ज़ुल्म ज़्यादती से अपने-आपको और अपने बीवी-बच्चों को बचाने के लिये कोई ऐसा तरीक़ा हरगिज़ इख़्तियार न करें जिससे उनके सामने उफ़्फ़ भी निकले, उनसे बात इस अन्दाज़ से करें कि आपके बाज़ू इन्तिहाई नर्मी के साथ उनके सामने बिछे रहें।

*2) आलिम / मुअल्लिम :* आलिम और मुअल्लिम (Teacher) का अदब और एहतिराम हमारे ऊपर वाजिब और ज़रूरी है क्योंकि उलमा अंबिया के वारिस होते हैं और इल्म के सोते मुअल्लेमीन के वुजूद से ही फूटते हैं। उलमा / मुअल्लेमीन इल्म की क़िन्दीलें जलाकर मुआशरे को रौशन रखते हैं, लेकिन अगर वो उन क़िन्दीलों पर दायरे बनाने लगें और आपको बस उसी दायरे में रहकर इल्म हासिल करने का पाबन्द बनाएँ तो समझ लीजिये कि ये बहुत बड़ा फ़ितना हैं। आलिम/मुअल्लिम वो है जो इल्म की क़िन्दील आने वाली नस्लों को इस ग़रज़ से पकड़ाता है कि वो उसे न सिर्फ़ ये कि रौशन रखेंगे बल्कि उसकी रौशनी को और तेज़ करेंगे और उसके ज़रिए से पूरे माहौल को रौशन रखेंगे, लेकिन अगर वो सिर्फ़ अपनी ही क़िन्दील के गिर्द लोगों को जमा रखना चाहते हों और क़िन्दील की हर बढ़ती रौशनी को देखकर उनका दम घुटता हो तो समझ लीजिये कि ये आपके सबसे बड़े दुश्मन हैं। ऐसे में आँखों पर पट्टी बाँधकर उलमा और मुअल्लेमीन का हुक्म मानना एक ऐसी गुमराही है जिससे कोई क़ौम कभी राहे-रास्त नहीं पा सकती। लिहाज़ा इन्तिहाई अदब और एहतिराम के साथ उनकी बातों से इख़्तिलाफ़ करना और उनकी ग़लत बातों को रद्द करना आपके ऊपर फ़र्ज़ है।

*3) अक़ीदे :* किसी भी दीन और नज़रिये के कुछ बुनियादी अक़ीदे होते हैं। अगर उन अक़ीदों को सही से न समझा जाए और उन पर पुख़्ता यक़ीन न रखा जाए तो वो दीन और नज़रिया न सिर्फ़ ये कि आगे नहीं बढ़ पाएगा बल्कि एक दिन या तो वो तहलील (Dilute) होकर रह जाएगा या फिर सफ़हे-हस्ती से ही मिट जाएगा। लिहाज़ा अक़ीदे को समझना और उस पर मज़बूती के साथ जमे रहना उस दीन को मानने वाले हर शख़्स पर अव्वलीन फ़र्ज़ बनता है। मगर दीन और नज़रियात के साथ ये हादसा पेश आता है कि उनके बुनियादी अक़ीदों के साथ कुछ ग़ैर-ज़रूरी बातें भी अक़ीदे का दर्जा हासिल कर लेती हैं और जो बुनियादी अक़ीदा है वो कहीं दब कर या सिकुड़ कर रह जाता है। लिहाज़ा ज़रूरी है कि जायज़ा लिया जाता रहे कि बुनियादी अक़ीदा मज़बूत बना रहे और कोई भी सेन्स-लेस बात अक़ीदे के क़रीब भी फटकने न पाए। अगर इस बात की एहतियात शुरू में न रखी गई तो बाद के ज़माने में उन बातों को अक़ीदे की फ़ेहरिस्त निकाल फेंकना इन्तिहाई मुश्किल काम हो जाता है।

जैसा कि हम आजकल देख रहे हैं कि दीने-इस्लाम में बहुत-सी ऐसी सेन्स-लेस बातें दाख़िल हो चुकी हैं जिन्होंने अक़ीदे की हैसियत इख़्तियार कर ली है और अब उनको निकाल फेंकना तो बहुत दूर की बात छाँट पाना भी इन्तिहाई मुश्किल काम हो गया है। यहाँ पर ये बात भी नोट कर लेने की है कि दीने-इस्लाम का एक ज़बरदस्त पहलू ये है कि इसके बुनियादी अक़ीदे इसके माननेवालों के दरम्यान इतने आम और और पुख़्ता हैं कि सेन्स-लेस बातों के दाख़िल हो जाने और उनके अक़ीदा बन जाने के बावजूद न तो ये तहलील हो पाएगा और न ख़त्म हो पाएगा, मगर इसके जो हक़ीक़ी फ़ायदे और बरकतें हैं उन्हें लोग तभी हासिल कर पाएँगे जब उन सेन्स-लेस बातों को ख़ालिस अक़ीदों से छाँटकर अलग कर दिया जाएगा।

*4) कल्चर और रिवायात :* किसी भी क़ौम का एक कल्चर हुआ करता है जिससे उस क़ौम की पहचान होती है, लिहाज़ा उस क़ौम के लोगों को चाहिये कि वो अपने उस कल्चर की पासदारी करें। इसी के साथ कुछ रिवायात भी होती हैं जो बहुत पीछे से चली आ रही होती हैं, लिहाज़ा ज़रूरी है कि उन रिवायात की भी पासदारी की जाए। लेकिन अक्सर व बेश्तर होता ये है कि कल्चर में वक़्त के चलते जिहालत की आमेज़िश हो जाती है और रिवायतें फ़रसूदा होकर रह जाती हैं। अगर यहाँ भी आँखों पर पट्टी बाँधकर उस कल्चर और उन रिवायात की पासदारी की जाने लगे तो क़ौम कभी तरक़्क़ी के रास्ते पर गामज़न नहीं हो सकती। लिहाज़ा क़ौम के होशमन्द लोगों की ये ज़िम्मेदारी है कि फ़रसूदा रिवायतों का ख़ात्मा करें और कल्चर में जिहालत की आमेज़िश को जिहालत से पाक और साफ़ करें ताकि ज़माने की बढ़ती रफ़्तार के साथ क़दम से क़दम मिलकर क़ौम आगे बढ़ सके।

हमारे मुआशरे में कुछ शख़्सियात और कुछ चीज़ें ऐसी हैं कि जिनका अदब व एहतिराम, पास व लिहाज़ बहुत ज़रूरी है, लेकिन ये भी देखा जाते रहना चाहिये कि कहीं ये आपकी ज़िन्दगी को तबाह और आख़िरत को बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं?

*1) वालिदैन :* वालिदैन का अदब व एहतिराम इन्तिहाई ज़रूरी है, क़ुरआन और हदीस में अल्लाह के बाद इन्हीं के अदब और ताज़ीम करने और हुक्म बजा लाने की ताकीद की गई है, लेकिन ध्यान रहे कि कहीं ऐसा न हो कि इनका हुक्म बजा लाने में हद से इतने आगे बढ़ जाएँ कि अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म पामाल हो जाए, इनके अदब व एहतिराम में इतने आगे न बढ़ जाएँ कि वो आप पर और आपके बीवी-बच्चों पर ज़ुल्म करें और आप ख़ामोश तमाशाई बने रहें। लेकिन याद रहे कि किसी भी ज़ुल्म ज़्यादती से अपने-आपको और अपने बीवी-बच्चों को बचाने के लिये कोई ऐसा तरीक़ा हरगिज़ इख़्तियार न करें जिससे उनके सामने उफ़्फ़ भी निकले, उनसे बात इस अन्दाज़ से करें कि आपके बाज़ू इन्तिहाई नर्मी के साथ उनके सामने बिछे रहें।

*2) आलिम / मुअल्लिम :* आलिम और मुअल्लिम (Teacher) का अदब और एहतिराम हमारे ऊपर वाजिब और ज़रूरी है क्योंकि उलमा अंबिया के वारिस होते हैं और इल्म के सोते मुअल्लेमीन के वुजूद से ही फूटते हैं। उलमा / मुअल्लेमीन इल्म की क़िन्दीलें जलाकर मुआशरे को रौशन रखते हैं, लेकिन अगर वो उन क़िन्दीलों पर दायरे बनाने लगें और आपको बस उसी दायरे में रहकर इल्म हासिल करने का पाबन्द बनाएँ तो समझ लीजिये कि ये बहुत बड़ा फ़ितना हैं। आलिम/मुअल्लिम वो है जो इल्म की क़िन्दील आने वाली नस्लों को इस ग़रज़ से पकड़ाता है कि वो उसे न सिर्फ़ ये कि रौशन रखेंगे बल्कि उसकी रौशनी को और तेज़ करेंगे और उसके ज़रिए से पूरे माहौल को रौशन रखेंगे, लेकिन अगर वो सिर्फ़ अपनी ही क़िन्दील के गिर्द लोगों को जमा रखना चाहते हों और क़िन्दील की हर बढ़ती रौशनी को देखकर उनका दम घुटता हो तो समझ लीजिये कि ये आपके सबसे बड़े दुश्मन हैं। ऐसे में आँखों पर पट्टी बाँधकर उलमा और मुअल्लेमीन का हुक्म मानना एक ऐसी गुमराही है जिससे कोई क़ौम कभी राहे-रास्त नहीं पा सकती। लिहाज़ा इन्तिहाई अदब और एहतिराम के साथ उनकी बातों से इख़्तिलाफ़ करना और उनकी ग़लत बातों को रद्द करना आपके ऊपर फ़र्ज़ है।

*3) अक़ीदे :* किसी भी दीन और नज़रिये के कुछ बुनियादी अक़ीदे होते हैं। अगर उन अक़ीदों को सही से न समझा जाए और उन पर पुख़्ता यक़ीन न रखा जाए तो वो दीन और नज़रिया न सिर्फ़ ये कि आगे नहीं बढ़ पाएगा बल्कि एक दिन या तो वो तहलील (Dilute) होकर रह जाएगा या फिर सफ़हे-हस्ती से ही मिट जाएगा। लिहाज़ा अक़ीदे को समझना और उस पर मज़बूती के साथ जमे रहना उस दीन को मानने वाले हर शख़्स पर अव्वलीन फ़र्ज़ बनता है। मगर दीन और नज़रियात के साथ ये हादसा पेश आता है कि उनके बुनियादी अक़ीदों के साथ कुछ ग़ैर-ज़रूरी बातें भी अक़ीदे का दर्जा हासिल कर लेती हैं और जो बुनियादी अक़ीदा है वो कहीं दब कर या सिकुड़ कर रह जाता है। लिहाज़ा ज़रूरी है कि जायज़ा लिया जाता रहे कि बुनियादी अक़ीदा मज़बूत बना रहे और कोई भी सेन्स-लेस बात अक़ीदे के क़रीब भी फटकने न पाए। अगर इस बात की एहतियात शुरू में न रखी गई तो बाद के ज़माने में उन बातों को अक़ीदे की फ़ेहरिस्त निकाल फेंकना इन्तिहाई मुश्किल काम हो जाता है।

जैसा कि हम आजकल देख रहे हैं कि दीने-इस्लाम में बहुत-सी ऐसी सेन्स-लेस बातें दाख़िल हो चुकी हैं जिन्होंने अक़ीदे की हैसियत इख़्तियार कर ली है और अब उनको निकाल फेंकना तो बहुत दूर की बात छाँट पाना भी इन्तिहाई मुश्किल काम हो गया है। यहाँ पर ये बात भी नोट कर लेने की है कि दीने-इस्लाम का एक ज़बरदस्त पहलू ये है कि इसके बुनियादी अक़ीदे इसके माननेवालों के दरम्यान इतने आम और और पुख़्ता हैं कि सेन्स-लेस बातों के दाख़िल हो जाने और उनके अक़ीदा बन जाने के बावजूद न तो ये तहलील हो पाएगा और न ख़त्म हो पाएगा, मगर इसके जो हक़ीक़ी फ़ायदे और बरकतें हैं उन्हें लोग तभी हासिल कर पाएँगे जब उन सेन्स-लेस बातों को ख़ालिस अक़ीदों से छाँटकर अलग कर दिया जाएगा।

*4) कल्चर और रिवायात :* किसी भी क़ौम का एक कल्चर हुआ करता है जिससे उस क़ौम की पहचान होती है, लिहाज़ा उस क़ौम के लोगों को चाहिये कि वो अपने उस कल्चर की पासदारी करें। इसी के साथ कुछ रिवायात भी होती हैं जो बहुत पीछे से चली आ रही होती हैं, लिहाज़ा ज़रूरी है कि उन रिवायात की भी पासदारी की जाए। लेकिन अक्सर व बेश्तर होता ये है कि कल्चर में वक़्त के चलते जिहालत की आमेज़िश हो जाती है और रिवायतें फ़रसूदा होकर रह जाती हैं। अगर यहाँ भी आँखों पर पट्टी बाँधकर उस कल्चर और उन रिवायात की पासदारी की जाने लगे तो क़ौम कभी तरक़्क़ी के रास्ते पर गामज़न नहीं हो सकती। लिहाज़ा क़ौम के होशमन्द लोगों की ये ज़िम्मेदारी है कि फ़रसूदा रिवायतों का ख़ात्मा करें और कल्चर में जिहालत की आमेज़िश को जिहालत से पाक और साफ़ करें ताकि ज़माने की बढ़ती रफ़्तार के साथ क़दम से क़दम मिलकर क़ौम आगे बढ़ सके।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

2 mins to read

हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

2 mins to read