तक़वा क़ुरआन मजीद के Key Words में से है बल्कि ये क़ुरआन मजीद की उन अहम इस्तिलाहात (Terminologies) में से है जिनकी तरफ़ अल्लाह ने आम तौर से अपने तमाम बन्दों को लेकिन ख़ास तौर से तमाम मुसलमानों को बार-बार तवज्जोह दिलाई है।
तक़वा का मतलब होता है “अल्लाह की नाफ़रमानी से बचते रह कर ज़िन्दगी गुज़ारना।” इस ऐतिबार से अगर देखा जाए तो तक़वा दरअसल एक पॉलिसी का नाम है जिसे पूरी ज़िन्दगी में इख़्तियार करने की ज़रूरत है। यानी ज़िन्दगी के हर क़दम पर ये देखते रहना कि ये अल्लाह की नाफ़रमानी में तो नहीं उठ रहा है। क़ुरआन मजीद में इस पॉलिसी को इस शिद्दत से इख़्तियार करने की ताकीद की गई (3:102) है कि कोई भी अक़्ल व शुऊर रखनेवाला शख़्स काँप उठेगा कि क्या हम इस तक़वा का इस तरह हक़ अदा कर भी पाएँगे जैसे इसकी ताकीद की जा रही है? लिहाज़ा इस ख़ौफ़ को ये कह कर राहत का कुछ सामान फ़राहम किया गया कि जहाँ तक मुमकिन हो सके वहाँ तक इस पॉलिसी को इख़्तियार किये रहो। (64:16)
अब सवाल ये है कि ये कैसे मालूम होगा कि हमने अपनी ज़िन्दगी में तक़वा इख़्तियार किया है या नहीं? अक्सर देखने में ये आता है कि हम दावा तो करते हैं तक़वा इख़्तियार करने का मगर दिल तक़वा से ख़ाली होता है। दिल में तक़वा है या नहीं इस बात की सबसे ख़ास पहचान ये है कि हमारा दिल हर तरह की तंगी से पाक हो जाए। क़ुरआन मजीद ने इस पॉलिसी को इख़्तियार कर लेने वालों के अन्दर सबसे अहम सिफ़त जो बताई है वो दिल का तंगी से पाक हो जाना है। फ़रमाया कि जो “शुह्हे-नफ़्स” (दिल की तंगी) से महफ़ूज़ हो गया दरअसल वही कामयाब है। (64:16) मालूम हुआ कि तक़वा और “शुह्हे-नफ़्स” (दिल की तंगी) कभी भी एक जगह जमा नहीं हो सकते।
ग़ौर तलब बात ये भी है कि ये दिल की तंगी सिर्फ़ दौलत और सरमाये से मुताल्लिक़ ही नहीं होती, बल्कि ओहदों और मंसबों से मुताल्लिक़ भी होती है। और सबसे ज़्यादा ख़तरनाक ये उस वक़्त हो जाती है जब ये दिल की तंगी दीन का काम करनेवालों के अन्दर पाई जाती है, क्योंकि
दिल में तक़वा का तक़ाज़ा तो ये है कि हर छोटे से छोटे और मामूली से मामूली इंसान को भी अहमियत दी जाए, मगर शुह्हे-नफ़्स तक़ाज़ा करता है कि मरकज़े-तवज्जोह सिर्फ़ मेरी ज़ात होनी चाहिये।
दिल में तक़वा का तक़ाज़ा तो ये है किसी भी इंसान की इज़्ज़त और तकरीम सिर्फ़ इस बुनियाद पर की जाए कि वो “बनी-आदम” है और बनी-आदम को अल्लाह ने मुकर्रम बनाया है (17:70), मगर शुह्हे-नफ़्स तक़ाज़ा करता है कि नहीं एहतिराम के क़ाबिल सिर्फ़ मेरी ज़ात, मेरी क़ौम, मेरी ब्रादरी, मेरा मसलक, मेरी जमाअत और उसके लोग हैं।
दिल में तक़वा का तक़ाज़ा तो ये है कि दिलों में वुसअत पैदा की जाए। अपने से बड़ों को भी जगह दी जाए और छोटों को भी, अपने से ज़्यादा इल्म वालों के इल्म से फ़ैज़ उठाया जाए, मगर “शुह्हे-नफ़्स” तक़ाज़ा करता है कि फ़ुलां चूँकि इल्म में मुझसे बेहतर और बरतर है लिहाज़ा उसे मौक़ा नहीं दिया जाना चाहिये, अगर उसे आगे बढ़ने का मौक़ा दे दिया गया तो मेरा क़द छोटा हो जाएगा। कहीं ऐसा न हो कि मेरी अहमियत कम हो जाए।
दिल में तक़वा का तक़ाज़ा तो ये है कि कम-इल्म लोगों को भी स्पेस दिया जाए और उन्हें ऊपर उठाया जाए, ताकि वो इल्म की बुलन्दियों को भी छू सकें, मगर शुह्हे-नफ़्स तक़ाज़ा करता है कि नहीं, ये तो इल्म में मुझसे कमतर है इसको मेरे बराबर में जगह कैसे दी जा सकती है? इसको चाहिये कि मेरे सामने झुककर रहे, मेरी ख़ुशामदें करे। हर हाल में मेरी बात को हक़ माने और मेरे सामने ज़बान भी न खोले।
यक़ीन जानिये मैंने ख़ुद अपनी आँखों से बड़े-बड़े अल्लामा और तहरीकी बुज़ुर्गों को इस बात पर आग-बगूला होते देखा है कि मेरी तक़रीर फ़ुलां से पहले या फ़ुलां के बाद क्यों रख दी गई। या फ़ुलां को अगर बोलने का मौक़ा मिल गया तो मेरी हैसियत वहाँ कम होकर रह जाएगी। मेरी तहरीरें फ़ुलां-फ़ुलां नामवर शख़्सियात से अफ़ज़ल और बेहतर हैं।
मैंने अपनी ज़िन्दगी में बारहा इस बात का तज्रिबा किया है कि दिलों की तंगी की वजह से बहुत-से (सो-कॉल्ड) अहले-इल्म ये कहते हैं कि उस फ़ुलां शख़्स की तो मेरे सामने कोई औक़ात ही नहीं है, फ़ुलां-फ़ुलां गुमराही (जो मेरे मसलक के ख़िलाफ़ है) को ख़त्म करने के लिये तो मैं अकेला ही काफ़ी हूँ, उस फ़ुलां फ़िक्र के लोगों को मुँह-तोड़ जवाब देने और उनको लाजवाब कर देने के लिये मुझे किसी की मदद की ज़रूरत नहीं है बल्कि मैं तो अकेला ही काफ़ी हूँ। यानी वो अपनी मुँह-ज़ोरी को दलायल का नाम देते हैं और ज़ोर की आवाज़ को फ़तह का।
दीने-हक़ के साथियो! दीने-इस्लाम उस वक़्त तक ज़िन्दा नहीं हो सकता जब तक वो हमारे दरम्यान ज़िन्दा और जारी व सारी न हो। लिहाज़ा दीने-इस्लाम को ज़िन्दा करने के लिये ज़रूरी है कि सबसे पहले हम अपने दिलों में तक़वा की रूह पैदा करें, तक़वा को फलने, फूलने और फैलने की जगह दें, लोगों को स्पेस देना शुरू करें, इख़्तिलाफ़ करने का शुऊर पैदा करें, इख़्तिलाफ़ और मुख़ालिफ़त के दरम्यान फ़र्क़ को मलहूज़ रखें ताकि हमारा दिल हर तरह की तंगी से पाक हो सके।
यक़ीन जानिये ये अल्लाह का वादा है कि अगर दिल तंगी से पाक हो गया तो यक़ीनन हम कामयाब हैं।
وَ مَنۡ یُّوۡقَ شُحَّ نَفۡسِہٖ فَاُولٰٓئِکَ ہُمُ الۡمُفۡلِحُوۡنَ
जो अपने दिल की तंगी से महफ़ूज़ रह गए बस वही फ़लाह पानेवाले हैं। (64:16)
याद रखें कि हिदायत बख़्शने का काम अल्लाह का है, वो हर उस बन्दे को हिदायत से नवाज़ देता है जो सच्चे और कुशादा दिल के साथ हिदायत का तालिब होता है और दिल की तंगी इस बात की अलामत है कि उसका सीना इस्लाम की रहनुमाई से महरूम हो चुका है
فَمَنۡ یُّرِدِ اللّٰہُ اَنۡ یَّہۡدِیَہٗ یَشۡرَحۡ صَدۡرَہٗ لِلۡاِسۡلَامِ ۚ وَ مَنۡ یُّرِدۡ اَنۡ یُّضِلَّہٗ یَجۡعَلۡ صَدۡرَہٗ ضَیِّقًا حَرَجًا کَاَنَّمَا یَصَّعَّدُ فِی السَّمَآءِ ؕ کَذٰلِکَ یَجۡعَلُ اللّٰہُ الرِّجۡسَ عَلَی الَّذِیۡنَ لَا یُؤۡمِنُوۡنَ
तो [ ये हक़ीक़त है कि] जिसे अल्लाह हिदायत बख़्शने का इरादा करता है उसका सीना इस्लाम के लिये खोल देता है और जिसे गुमराही में डालने का इरादा करता है उसके सीने को तंग कर देता है और ऐसा भींचता है कि [इस्लाम का तसव्वुर करते ही] उसे यूँ मालूम होने लगता है कि मानो उसकी रूह आसमान की तरफ़ परवाज़ कर रही है। इस तरह अल्लाह [ हक़ से फ़रार और नफ़रत की] नापाकी उन लोगों पर मुसल्लत कर देता है जो ईमान नहीं लाते। (6:125)
अल्लाह हमें तौफ़ीक़ दे कि हम दिलों को तक़वा की रौशनी से मुनव्वर कर सकें और ‘शुह्हे-नफ़्स’ की तारीकियों से महफ़ूज़ रहें।