जिस तरह पेट में खाना हज़म न होने की सूरत में बहुत-सी बीमारियाँ पैदा होती हैं।
उसी तरह तारीफ़ के हज़म न होने की सूरत में ग़ुरूर व तकब्बुर जैसी बीमारियाँ पैदा हो जाती हैं।
लिहाज़ा ज़रूरी है कि किसी की बेजा-तारीफ़ न की जाए और अगर आपके किसी काम पर आपकी जायज़ तारीफ़ की जाए तो उस पर तारीफ़ों का असल मुस्तहिक़ अल्लाह को ठहराकर अपने काम के लिये अल्लाह का शुक्र अदा किया जाए कि उसी की तौफ़ीक़ से वो काम अंजाम को पहुँचा। इस तरह उम्मीद है कि हम तारीफ़ को हज़म कर पाएँगे और उसके शर से महफ़ूज़ रहेंगे।
———
जिस तरह मिटटी का बर्तन जब तक बाहर की चोट को बर्दाश्त नहीं करता है तो वो कभी खूबसूरत शेप इख़्तियार नहीं कर सकता, बल्कि कभी-कभी तो टूटकर बिखर भी जाता है।
उसी तरह अगर कोई शख़्स इस्लाह की ग़रज़ से की गई तनक़ीद को बर्दाश्त न कर पाए तो वो कभी अपनी शख़्सियत को बेहतरीन शेप नहीं दे सकता, बल्कि कभी-कभी तो दुश्मनी में पड़ कर अपनी शख़्सियत को पारा-पारा कर लेता है।
लिहाज़ा ज़रूरी है कि जब आप पर तनक़ीद की जाए तो उसे ख़न्दा-पेशानी और ख़ुश-मिज़ाजी के साथ क़बूल किया जाए। तनक़ीद करनेवाले का शुक्रिया अदा किया जाए और जिस बात पर तनक़ीद की गई है उसकी इस्लाह की जाए। जिस बात पर तनक़ीद की गई है अगर उसमें आप हक़ पर हैं महज़ किसी ग़लतफ़हमी की बुनियाद पर आप पर तनक़ीद की गई है तो इन्तिहाई मुशफ़िक़ाना और प्यार भरे अन्दाज़ में उसकी ग़लतफ़हमी को दूर कर दिया जाए। इस तरह उम्मीद है कि हम तनक़ीद के ज़रिए अपने अन्दर बहुत ही पॉज़िटिव तब्दीली ला पाएँगे।