ज़ाकिर भाई के ज़िक्र ने वाजिद भाई को पाने के बजाय खो दिया
कितना अच्छा होता कि वाजिद भाई को ये कह कर ज़लील न किया गया होता कि “तू काफ़िर और मुरतद हो गया है,” बल्कि उनको ये हौसला दिया गया होता कि “किसी शख़्स का किसी से कुछ लेना और वक़्त पर अदा करना, बेटा होने की शक्ल में बेहतरीन बेटा साबित होना, शौहर होने की सूरत में बेहतरीन शौहर होना, मुआशरे में उसका जो सही किरदार है उसको अच्छे से निभाना, अमानत में ख़यानत न करना, वादे की पाबन्दी करना, किसी पर ज़ुल्म न करना, दूसरों को उनके हक़ों से ज़्यादा देना और अपने कम हक़ पर भी राज़ी हो जाना, अपने हर तरह के पड़ौसियों का ख़याल रखना, लोगों से मुस्कुराकर मिलना और उनके काम आना” वग़ैरा यही तो असल में वो ख़ुसूसियात हैं जो एक प्रैक्टिसिंग मुस्लिम (अमली मुसलमान) के अंदर होनी चाहिएं। ये आपको किसने बहका दिया कि आप जब से ये काम कर रहे हैं तो आप प्रैक्टिसिंग मुस्लिम नहीं हैं? हाँ, ये बात ज़रूर है कि आपने अपने प्रैक्टिसिंग मुस्लिम होने को इस्लामी अक़ीदे के दायरे से निकाल दिया है, तो आइए इस बात को लोजिकली समझ लेते हैं कि नेकियों की पुश्त पर इस्लामी अक़ीदे के होने की ज़रूरत क्यों है?
सबसे पहली बात तो ये है कि इंसान जो भी नेक काम करता है, उसकी पुश्त पर कोई न कोई मुहर्रिक (Motive) ज़रूर होता है। यानी इंसान जब भी कोई नेक काम करता है, तो किसी न किसी वजह से करता है। वो मोहरिकात (Motives) इस तरह हो सकते हैं:
(1) किसी भी नेकी का पहला मोहरिक (Motive) इस बात का लालच हो सकता है कि इस नेक काम को करने से कुछ हासिल होगा, दौलत हासिल होगी या शोहरत, इज़्ज़त हासिल होगी या पद और ओहदा।
ज़रा सोचिए कि अगर किसी नेक काम को करने की पुश्त पर मोहरिक (Motive) कुछ हासिल करना हो तो ये मोहरिक कितना नापाएदार होगा! जिस दिन उसे ये एहसास होगा कि उसे इनमें से कोई चीज़ हासिल होने वाली नहीं है, तो उसके लिए इन कामों में दिलचस्पी ख़त्म हो जाएगी और जिस दिन ये एहसास यक़ीन में बदल गया, उसी दिन उसकी ये नेकी की दीवार ढह कर रेत के ढेर में तब्दील हो जाएगी।
(2) किसी इंसान के नेकी का कोई काम करने की पुश्त पर दूसरा मोहरिक ये हो सकता है कि लोग उसे देखें और उसकी तारीफ़ें करें, अगर वो नेकी का काम नहीं करेगा तो लोग उसे बुरा कहेंगे, फिर वो समाज में क्या मुँह दिखाएगा।
इस मोहरिक पर ग़ौर करेंगे तो मालूम होगा कि ये मोहरिक भी रेत के ढेर पर तामीर किये गए महल की तरह ही नापायेदार है। जिस दिन उसे एहसास होगा कि लोग उसे देख नहीं रहे हैं या उसकी तारीफ़ें नहीं कर रहे हैं, उसी दिन नेकियों के कामों में उसकी दिलचस्पी कम हो जाएगी और जिस दिन ये एहसास यक़ीन में बदल गया, उसी दिन नेकी का ये क़स्र भी ज़मीं-बोस हो जाएगा।
(3) नेकी के काम के पीछे एक मोहरिक ये हो सकता है कि इन्सान को न कोई इज़्ज़त और शोहरत चाहिए, न पद और ओहदा और न उसे लोगों की तारीफ़ें मतलूब हैं, बल्कि वो तो नेकी के हर काम को इसलिये करता है कि उसे अच्छा लगता है, दिली सुकून हासिल होता है।
बज़ाहिर ये मोहरिक बड़ा अपीलिंग लगता है, मगर मामूली सी चोट से ये मोहरिक भी धड़ाम से ज़मीन पर आ रहता है, क्योंकि जिस दिन उसे नेक काम करते हुए दिली इत्मिनान और सुकून हासिल नहीं होगा, वो उसी दिन नेकी के काम करना छोड़ देगा।
अब आइए उस मोहरिक पर ग़ौर करते हैं जो इस्लाम देता है। इस्लाम की तालीम ये है कि इन्सान कोई भी नेकी का काम महज़ इसलिये न करे कि कोई उसे देखेगा और उसकी तारीफ़ें करेगा, बल्कि नेकी के काम वो ये सोचकर करता है कि कोई देखे या न देखे मगर ख़ुदा देखता है। दिल को अच्छा लगे तब भी और दिल को पसन्द न आए तब भी वो नेकी का हर काम करेगा क्योंकि उसके रब अल्लाह ने उसे करने का हुक्म दिया है। वो अल्लाह इन्सान के किये गए हर नेक काम को क़द्र की निगाह से देखता है, बशर्ते कि लोगों को दिखाने के लिये नहीं, लोगों की दाद व तहसीन हासिल करने के लिये नहीं, बल्कि सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुदा की रज़ा हासिल करने के लिये किया गया हो। उसका पुख़्ता यक़ीन है कि ख़ुदा की निगाह में हर वो काम क़ाबिले-क़द्र ठहरेगा जिसका अज्र लोगों से दौलत या शोहरत की शक्ल में न तलब किया गया हो, बल्कि नेकी का अज्र उसे आख़िरत में मतलूब हो।
ज़रा लोजिकली सोचिए कि जिस नेकी की पुश्त पर ये मोहरिक होगा कि उसे नेकियों के बदले में जो कुछ चाहिये, वो इन्सानों से दौलत, शोहरत या तारीफ़ों की शक्ल में नहीं बल्कि आख़िरत में नजात की शक्ल में अल्लाह से चाहिये, वो हर नेकी के अज्र को आख़िरत के लिये महफूज़ कर देना चाहे, तो यक़ीनी तौर पर उस शख़्स को नेक कामों को करने में रग़बत इसलिए होगी कि उसके ख़ालिक व महबूब अल्लाह का हुक्म है।
ज़रा लोजिकली सोचिए कि ऊपर लिखे तीन मोहरिकात (Motives) किसी नेक काम के लिये ज़्यादा मज़बूत और पायेदार हैं या वो मोहरिक जो इस्लाम ने इन्सानों को दिया है। अगर इन्सान नेकी के काम महज़ इसलिये करे कि उसे अल्लाह की रज़ा मतलूब है और उसे हर नेकी का अज्र आख़िरत में चाहिये, तो यक़ीनन ये मोहरिक मज़बूत और पायेदार है। इस मोहरिक को इख़्तियार करने से मुआशरे में नेकियों की वो बहार आएगी कि ये मुआशरा जन्नत बन जाएगा, चारों तरफ़ अम्न व सलामती होगी, हर शख़्स महफ़ूज़ व मामून होगा और यही इस्लामी मुआशरा है, यही सही में इस्लामी प्रैक्टिस है।
वाजिद भाई! आप प्रैक्टिस तो इस्लामी कर रहे हैं, आप हक़ीक़त में प्रैक्टिसिंग मुस्लिम हैं। बस आपको इसके पीछे के मोहरिक को मज़बूत व पायदार बनाने की ज़रूरत है। यानी आपको अपने अक़ीदे को इस्लामी रंग देने की ज़रूरत है।
ये पैग़ाम वाजिद भाई जैसे हज़ारों और लाखों नौजवानों के लिये है जो इस तरह के सवालात अपने ज़ेहनों में लिये घूमते हैं मगर इस डर से नहीं पूछते कि उन्हें ज़लील किया जाएगा, डराया जाएगा और और धमकियाँ दी जाएँगी।