भारतीय धर्म ग्रन्थों में गुरु की बड़ी महिमा बयान की गई है। हमें बताया जाता है कि गुरु ही भगवान है, बल्कि गुरु का मर्तबा और उसकी श्रेणी भगवान से भी बढ़कर है।
अगर हम संस्कृति की बात करें तो हमें कोई अधिकार नहीं पहुँचता कि हम किसी की संस्कृति पर कोई टीका-टिप्पणी करें। यदि गुरु को भगवान मानना किसी की संस्कृति का भाग है तो उसका सम्मान अपनी जगह परन्तु इस बात पर विचार अवश्य ही किया जाना चाहिये कि तार्किक एवं साहित्यिक दृष्टि से क्या वास्तव में ऐसा है? आइये इस पर विचार करते हैं।
हमें बताया जाता है कि
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
अर्थात गुरु ही ब्रह्मा है, गुरु ही विष्णु है, गुरु ही महेश्वर हैं। गुरु ही परमब्रह्मा है। इस साक्षात परम ब्रह्म को नमन है (हम उसी को शीश नवाते हैं) अर्थ यह कि गुरु ही सर्वश्रेष्ठ हैं। जिन्होंने हमें इन सब के बारे में बताया। गुरु की महिमा अनंत है।
यदि हम गुरु शब्द के अर्थ को समझें तो हमें मालूम होगा कि गुरु उस हस्ती को कहते हैं जो अन्धकार को दूर कर देता है।
अब मनुष्य के जीवन से अन्धकार को कोई और दूर नहीं कर सकता सिवाय उसके कि जिसने अन्धकार और प्रकाश को जन्म दिया है, अर्थात ईश्वर।
अब यदि यहाँ पर गुरु से तात्पर्य ईश्वर है तो कहा जाएगा कि वह गुरु एक ही है चाहे तुम उसे ब्रह्मा कहो चाहे विष्णु और चाहे महेश। उस गुरु को अलग-अलग नामों से भले तुम पुकार लो परन्तु वह है एक ही। इस बात की पुष्टि इस बात से भी होती है कि
इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्य: सुपर्णोगुरूत्मान्।
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:। ऋग्वेद 1/164/46
चाहे तुम उसे बहुत-से नामों से पुकारो परन्तु वह एक ही है।
ईश्वर ही को ‘गुरु’ कहा गया है यह बात इससे भी सिद्ध होती है कि:
सात समुद्र की मसि करूं लेखन सब बन राय। पृथ्वी को कागज करूं गुरु गुण लिखा न जाए।
यहाँ जिस गुरु के गुणों को लिखे जाने की बात हो रही है वह कोई और नहीं हम सबका ईश विधाता अल्लाह ही है। क़ुरआन में है कि
“ऐ नबी! कहो कि अगर समन्दर मेरे रब की बातें लिखने के लिये रौशनाई बन जाए तो वह ख़त्म हो जाए, मगर मेरे रब की बातें ख़त्म न हों, बल्कि अगर उतनी ही रौशनाई हम और ले आएँ तो वे भी काफ़ी न हो।“ (18: 109)
कहा गया है कि
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
अर्थात उस महान गुरु को अभिवादन, जो पूरे ब्रम्हांड में व्याप्त है, सभी जीवित और मृत्य (मृत) में| यहाँ उस ईश्वर को नमन करने की बात कही गई है जिसके बारे में कहा गया कि
शरीरं चैव वाचं च बुद्धिन्द्रिय मनांसि च ।
नियम्य प्राञ्जलिः तिष्ठेत् वीक्षमाणो गुरोर्मुखम् ॥
उस गुरु अर्थात ईश्वर के सामने शरीर (body), वाणी (voice), बुद्धि (wisdom), इंद्रिय (sense) और मन (Mind) को संयम में रखकर, झुकना चाहिये हाथ जोड़कर नमन करना चाहिये।
एक और जगह कहा गया है कि वह ईश्वर वह है
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः॥
जिसने ज्ञानरूपी प्रकाश से, अज्ञानरुप अंधकार से अंधे हुए लोगों की आँखें खोली, अतः उस गुरु को नमस्कार।
गुरु का एक दूसरा अर्थ होता है कि जो मनुष्य को सत्य का रास्ता बताकर उसे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले आए। निश्चय ही यह काम ईश्दूतों और पैग़म्बरों का है। इस सम्बन्ध में शास्त्रों में जो कुछ कहा गया है उसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि
धर्मज्ञो धर्मकर्ता च सदा धर्मपरायणः।
तत्त्वेभ्यः सर्वशास्त्रार्थादेशको गुरुरुच्यते॥
अर्थात धर्म को जानने वाले, धर्म के अनुसार आचरण करने वाले, धर्मपरायण, और (ईश्वर द्वारा अवतरित) शास्त्रों के अनुसार आदेश करने वाले गुरु कहे जाते हैं।
एक और जगह कहा गया कि
प्रेरकः सूचकश्वैव वाचको दर्शकस्तथा।
शिक्षको बोधकश्चैव षडेते गुरवः स्मृताः॥
अर्थात प्रेरणा देने वाले, सूचना देने वाले, सत्य बताने वाले, मार्गदर्शन करने वाले, शिक्षा देनेवाले, और बोध कराने वाले –ये सब गुरु हैं।
एक और जगह कहा गया कि
निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।
गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते॥
अर्थात जो दूसरों को गलत रास्ते पर जाने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते पर चलते हैं, और हमेशा हित और कल्याण की कामना करते हैं, उन्हें गुरु कहते हैं।
अब चूँकि शिक्षक और अध्यापकगण भी नस्लों को ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने का काम करते हैं इसलिये उन्हें भी प्रतीक रूप से गुरु ही कह देते हैं। हालाँकि गुरु या तो स्वयं ईश्वर है या ईश्वर ने जिनको अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा है वो गुरु हैं। प्रोफ़ेट मुहम्मद (सल्ल०) ने भी कहा था कि मुझे आसानी पैदा करने वाला मुअल्लिम अर्थात गुरु बनाकर भेजा गया है। (मुस्लिम : 3249)
विडम्बना यह है कि हम हर साल शिक्षक दिवस पर गुरु की महिमा इस प्रकार बयान की जाती है कि शिक्षक और गुरु में अन्तर ही नहीं कर पाते। हमारे शिक्षकगण यह अन्तर करना ही नहीं सिखाते कि शिक्षक गुरु नहीं होता अर्थात न तो शिक्षक ख़ुदा होता है और न ही ख़ुदा का प्रतिनिधि। बल्कि शिक्षक तो वह होता है जो हमें पैसे के बदले शिक्षा देता है। जो हमें शब्दों का उच्चारण सिखा देता है, कुछ फ़ॉर्मूला सीखा देता है और अन्त में जाकर अनुसन्धान के कुछ तरीक़े सीखा देता है।
कबीर दास जी के एक दोहे की हमारे शिक्षक बहुत ही ग़लत व्याख्या करते हैं।
गुरु गोविन्द दोउ खड़े का के लागो पायँ।
बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय।
इस दोहे को पढ़कर गुरु अर्थात शिक्षक के मर्तबे को गोविन्द से भी ऊँचा उठा देते हैं। हालांकि कबीर दास के इस दोहे का मतलब वह नहीं है। कबीर दास जी कहना यह चाहते हैं कि जब शिष्य असमंजस में पड़ गया कि किसके सामने झुकूँ? गुरु के सामने अथवा गोविन्द के सामने। तो गुरु ने शिष्य को इशारा कर दिया कि असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। मेरा ये स्थान नहीं है कि मुझे नमन किया जाए, या मेरे सामने झुका जाए। बल्कि यह स्थान तो केवल गोविन्द का ही है। तब शिष्य को तसल्ली हुई और गुरु से कहा कि ‘बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दियो बताय अर्थात गुरु जी आपका बहुत धन्यवाद कि आपने मुझे बता दिया कि झुकना केवल गोविन्द के सामने ही है।‘
एक ग़लती हम यह भी कर रहे हैं कि कुछ सन्तों को गुरु की उपाधि दे देते हैं, जबकि सन्त आप उसे कह सकते हैं जो गुरु की शिक्षा के अनुसार दूसरे लोगों की तुलना में कुछ अधिक जीवन व्यतीत करता हो।
नोट : संस्कृत सभी श्लोक और उनके अर्थ इंटरनेट से लिये गए हैं।