अंबियाई दावत को अंबियाई तरीक़े से पहुँचाने की ज़रूरत है।
हम मुसलमान चूँकि अंबियाई मिशन रखनेवाली एक उम्मत हैं। इस ऐतिबार से हमारी दावत भी अंबियाई होनी चाहिये और हमारा उस्लूब व लहजा भी और इसी के साथ मौक़ा व महल भी दुरुस्त होना चाहिये। (16:125)
क़ुरआन के मुताले से मालूम होता है कि तमाम अंबिया की दावत ये थी कि “ऐ मेरी क़ौम के भाइयो! एक अल्लाह की बन्दगी करो। उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं है।” (7:59, 65, 73, 85; 11:50, 61, 84; 29:16) इस पुकार में बात को देखिये कितनी सटीक और उस्लूब में कितनी नर्मी और लचक है।
अंबिया कहते थे कि “तुम लोग अल्लाह को छोड़कर जिन्हें पुकारते हो वो तो सिर्फ़ बन्दे हैं, जैसे तुम बन्दे हो। इनसे दुआएँ माँग देखो, ये तुम्हारी दुआओं का जवाब दें अगर इनके बारे में तुम्हारे ख़याल सही हैं।” (07:194) इस बात में देखेंगे तो मालूम होगा कि अपनी बात को दलील के उस्लूब में रखा गया है।
अंबिया कहते थे कि अल्लाह का फ़रमान है कि उसकी इबादत ही इन्सानों के लिये सीधा रास्ता है “मेरी ही बन्दगी करो, यही सीधा रास्ता है?” (36:61)
“अल्लाह मेरा रब भी है और तुम्हारा रब भी तो तुम उसकी बन्दगी करो। यही सीधी राह है।” (19:36) इस बात में महसूस किया जा सकता है कि ख़ैरख़ाही का जज़्बा उबल पड़ रहा है।
अंबिया की ये दावत इसलिये भी थी कि चूँकि तमाम इन्सान उसी एक ख़ुदा के बन्दे हैं लिहाज़ा उन्हें उसी की बन्दगी करनी चाहिये। यही वो तरीक़ा है जिसके ज़रिए इस दुनिया की ज़िन्दगी में अम्नो-सलामती क़ायम हो सकती है और आख़िरत में भी कामयाबी हासिल हो सकती है।
“ऐ मेरी क़ौम के लोगो, अल्लाह की बन्दगी करो और आख़िरत के दिन के उम्मीदवार रहो, और ज़मीन में बिगाड़ फैलानेवाले बनकर ज़्यादतियाँ न करते फिरो।” (29:36)
यक़ीनन अंबिया की इस दावत पर उन लोगों को तकलीफ़ होती थी जो लोगों से अपनी बन्दगी कराते थे। वो इस दावत पर जल-भुन जाते थे और अंबिया को हर तरह से इस दावत से रोकने की कोशिश करते थे। वो कहते थे कि ये मुल्क हमारा है लिहाज़ा बन्दगी हमारी करो। क़ुरआन कहता है कि
“एक दिन फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के बीच पुकारकर कहा, “लोगो, क्या मिस्र की बादशाही मेरी नहीं है और ये नहरें मेरे नीचे नहीं बह रही हैं? क्या तुम लोगों को नज़र नहीं आता?” (43:51)
जब ये समाज में अपनी बड़ाई का डंका बजाने वाले लोग अपनी बड़ाई पर क़ायम रहते तब अंबिया अपनी क़ौम के लोगों को समझाते हुए कहते कि
“अल्लाह से मदद माँगो और सब्र करो, ज़मीन अल्लाह की है, अपने बन्दों में से जिसको चाहता है उसका वारिस बना देता है, और आख़िरी कामयाबी उन्हीं के लिये है जो उससे डरते हुए काम करें।” (07:128)
कहो, “ऐ अल्लाह! मुल्क के मालिक! तू जिसे चाहे हुकूमत दे और जिससे चाहे छीन ले। जिसे चाहे इज़्ज़त दे और जिसको चाहे रुसवा कर दे, भलाई तेरे इख़्तियार में है। बेशक तुझे हर चीज़ पर क़ुदरत हासिल है।” (03:26)
ख़ुदा के मुक़ाबले में बड़े बनने वाले लोगों से अंबिया कहते कि अल्लाह फ़रमाता है :
“हमने तुम्हें ज़मीन में इख़्तियार के साथ बसाया और तुम्हारे लिये यहाँ ज़िन्दगी का सामान जुटाया।” (07:10) इसका मतलब ये नहीं है कि तुम लोगों को अपना ग़ुलाम बना लो और उनसे अपनी बन्दगी कराने लगो, बल्कि सही बात ये है कि हमने ज़मीन पर तुम्हें अपने नायब की हैसियत दी है वो भी इसलिये कि हम देखना चाहते हैं कि अच्छे अमल करते हो या बिगाड़ पैदा करते हो :
“फिर हमने तुमको ज़मीन में उनकी जगह दी है, ताकि देखें कि तुम कैसे काम करते हो।” (10:14)
फिर अंबिया लोगों को ये बताते हैं कि अगर तुमने लोगों के दरम्यान अद्ल क़ायम किया, समाज में अम्नो-सलामती को बहाल रखा तो हम तुम्हें इनाम के तौर पर ऐसी जन्नतें देंगे जिनमें हर तरह का सामाने-ऐश-व-आराम होगा। लेकिन अगर तुमने हमारी ज़मीन पर बिगाड़ पैदा किया तो इस दुनिया में भी तबाही मची रहेगी और मरने के बाद की ज़िन्दगी में आग तुम्हारा मुक़द्दर बन जाएगी जिससे तुम कभी निकाले नहीं जाओगे।
लिहाज़ा इस ज़मीन पर न तो अपनी बड़ाई क़ायम करने की कोशिश करना और न ही इस ज़मीन पर बदअमनी फैलाने की कोशिश करना क्योंकि ये ज़मीन न तुम्हारी है न हमारी बल्कि ये ज़मीन उस ख़ुदा की है जिसने इस कायनात को बनाया है।
इससे बढ़कर और क्या फ़िक्रो-अमल का इन्क़िलाब।
पादशाहों की नहीं, अल्लाह की है ये ज़मीं।।
यक़ीन जानिये अंबियाई दावत का उस्लूब ये हरगिज़ नहीं है कि जिसको दावत दी जा रही है उसे तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया जाए, हज़ारों का मजमा इकठ्ठा करके स्टेज पर खड़े होकर और सीना तानकर ज़बानों को चुप कर दिया जाए और ताली पिटवा दी जाए। ये उस्लूब इस मुल्के-अज़ीज़ हिन्दुस्तान में और भी ज़्यादा नुक़सानदेह उस वक़्त हो जाता है जबकि यहाँ एक गरोह पिछले लगभग सौ बरसों से मुल्क की बड़ी अक्सरियत के सामने ये साबित करने में बड़ी हद तक कामयाब है कि भारत की ये धरती हिन्दुओं की है। चूँकि ये देव-भूमि है इसलिये ये धरती उनके लिये पवित्र और पूजनीय है और इस धरती पर बसने वालों पर शासन करने का अधिकार केवल उनका है। मुसलमान चूँकि बाहर से आए और उन्होंने इस देव-भूमि पर आक्रमण करके इसको अपमानित और अपवित्र किया है इसलिये हमको जब भी अवसर मिलेगा हम इस देव भूमि के शील की रक्षा करेंगे और उस अपमान का बदला लेंगे और उसी पुरानी व्यवस्था को बहाल करेंगे जो यहाँ की सनातन व्यवस्था रही है। अब वो गरोह पूरी मज़बूती के साथ इक़्तिदार में मौजूद है।
ज़रा सोचिये कि जो गरोह इस अज़्म और इरादे के साथ इक़्तिदार में आया है अगर उसके सामने ये कहा जाए कि “ये मुल्क सबसे पहले मुसलमानों का है।” तो इस बात को ठण्डे पेटों कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? जिस मुल्क की अक्सरियत की बड़ी अक्सरियत के दिमाग़ों में बात बिठा दी गई हो कि इस मुल्क में मुसलमान आक्रमणकारी हैं, इन्होंने हमारी मात्रभूमि का चीर-हरण किया है।” उनके सामने दावा करते हुए अगर ये कहा जाए कि “ये मुल्क जितना हिन्दुओं का है उतना ही मुसलमानों का भी है।” तो इस बात को कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है? ये बात तो उनके नज़दीक बिलकुल वैसी ही है जैसे किसी के घर में घुसकर पूरी अकड़ के साथ ये कहा जाए कि ये घर जितना तुम्हारा है उतना ही हमारा भी है। ज़ाहिर है जिस तरह वो घर वाला इस बात को एक मिनट के लिये भी बर्दाश्त नहीं करेगा उसी तरह उन बातों का रिएक्शन होना भी फ़ितरी है, जिससे हक़ बात के उनके दिलों तक पहुँचने के तमाम रास्ते बन्द ही हो जाएँगे।
याद रखना चाहिये अंबियाई दावत तो दिलों को जीतकर बहुत ही नर्म अन्दाज़ में एक-एक शख़्स तक पहुँचकर दी जा सकती है। यक़ीन जानिये ये कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। अगर हिन्दुस्तान में मुसलमान सिर्फ़ अपने मिज़ाज को नर्म, किरदार को आला और मक़सद को अज़ीम कर लें तो मुल्क की बड़ी तादाद को अपना गरवीदा बना सकते हैं, जिससे अंबियाई मिशन के अगले मरहले के लिये रास्ता हमवार हो सकता है, जो कि समाज में अम्नो-सलामती के क़ियाम और अद्लो-इन्साफ़ की बहाली तक जा पहुँचता है। इस्लामी नज़रिये से बुनियादी तौर पर न तो इस्लाम का ये दावा है कि ये मुल्क इन (सो-कॉल्ड) मुसलमानों का है और इसमें इनका भी उतना ही हिस्सा है जितना तुम्हारा है। बल्कि इस्लाम की दावत दर-अस्ल ये है कि ये मुल्क और ये पूरी ज़मीन उसी एक अल्लाह की है, जिसने इसे पैदा किया। इस मुल्क का इन्तिज़ाम चलाने का सबसे ज़्यादा हक़ उस गरोह को है जो उस ख़ुदा को हाकिम मानकर सबसे पहले ख़ुद उसका फ़रमाँबरदार हो और फिर समाज में अम्नो-सलामती की बहाली के लिये आगे आए। जो इन्सानों के दरम्यान किसी क़िस्म का भेदभाव न करे बल्कि अद्लो-इन्साफ़ क़ायम करे और किसी भी एक पक्ष का पक्षधर न हो