बहुत-से नादानों की राय है कि क़ौम व मिल्लत की इस्लाह व तरक़्क़ी तालीम और टेक्नालोजी के रास्ते से ही की जा सकती है।
बहुत-से दूसरे लोग हैं जो कहते हैं कि अगर क़ौम की माली हालत दुरुस्त कर दी जाए तो उम्मत के तमाम मसायेल का ख़ात्मा हो जाएगा।
कुछ ऐसे भी जल्दबाज़ लोग हैं जो कहते हैं कि सियासी तौर पर मुस्तहकम होकर ही हम ऊपर उठ सकते हैं।
कुछ ‘अक़्लबन्द’ ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि क़ौमों की तरक़्क़ी के लिए स्पोर्ट्स, एंटरटेनमेंट जैसी मुख़्तलिफ़ चीज़ों को ज़रिआ बनाया जाना इन्तिहाई ज़रूरी है।
मगर हम कहते हैं इन सब बातों में सही और ग़लत को आपस में मिला दिया जाता है, यानी ये बातें कुछ ठीक तो कुछ ग़लत हैं।
जब कोई क़ौम पस्पाई का शिकार होती है तो उसकी सबसे बड़ी अलामत ये होती है कि उसके सोचने-समझने वाले लोगों को कोई एक राह नज़र नहीं आती, मानो आँखों पर पट्टी बाँधकर हाथी की तशरीह कर रहे होते हैं और सबके सब अपने-आपको ही सही ठहरा रहे होते हैं। हालाँकि जो पट्टी उन्होंने आँखों पर बाँधी हुई होती है अगर वो उसे खोल दें तो सब बयकज़बान बोल उठेंगे कि हम सब ग़लती पर थे, हाथी तो सही मानों में ये है जो हमारे सामने है।
हम कहते हैं कि उम्मत के मसायल के हल के लिए अगर हम संजीदा हैं तो आँखों से पट्टी खोलकर देखना होगा कि इस उम्मत की इस्लाह व तरक़्क़ी का सिर्फ़ एक ही रास्ता है, जो नबीए-आख़िर हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने बताया है और वो रास्ता है क़ुरआन, जिसने ऊपर बताई गई सभी ख़ूबियों को अपने अन्दर जमा कर लिया है।
इसलिए अगर हम चाहते हैं कि मौजूदा मसायेल से नजात मिले, समाज के अन्दर इंसाफ़ और शान्ति व सलामती क़ायम हो, इंसानों और इंसानों के दरमियान फ़र्क़ व ताफ़ावुत (भेदभाव) ख़त्म हो तो क़ुरआन से वाबस्ता हो जाइए। यक़ीनन सच्ची ख़बर देनेवाले हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) ने फ़रमाया:
“अल्लाह इसी किताब (क़ुरआन) के ज़रिए बहुत-से लोगों को ऊपर उठाएगा और इसी किताब की वजह से बहुत-से लोगों को पस्ती में दाल देगा।”
अल्लाह हमारे मुश्किल हालात को जल्द आसानी में तब्दील फ़रमाए ताकि तमाम इंसानों की भलाई का फ़रीज़ा हम बख़ूबी अंजाम दे सकें।