कबीरा खड़ा बज़ार में माँगे सबकी ख़ैर।
न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।।
कबीर दास जी के इस दोहे का दूसरा पद बहुत ही मशहूर है, जिसका मतलब आम तौर से इस तरह समझा जाता है कि हम तो न्यूट्रल (तटस्थ) हैं। मामला चाहे हक़ व बातिल में फ़र्क़ करने का ही क्यों न हो, हमारी न किसी से दोस्ती है न दुश्मनी। जबकि सही बात ये है कि तटस्थता (neutrality) बड़ी ही नकारात्मक (नेगेटिव) सोच और अमल का नाम है। ये किसी अच्छे इन्सान की पहचान नहीं हो सकती। एक अच्छा और सच्चा इन्सान वही हो सकता है जो हक़ और बातिल के दरम्यान होनेवाली कशमकश में हक़ को समझे और जब वो हक़ पहचान ले तो उसकी हिमायत के लिये खड़ा हो जाए, खड़ा न हो सकता हो तो कम से कम हक़ को हक़ और बातिल को बातिल कहे। कहने की ताक़त भी अगर न हो तो कम से कम दिल से उसे बुरा समझे।
दोहे में कबीर दास जी जो कुछ कहना चाहते हैं उसे हमें दूसरे अन्दाज़ से समझने की ज़रूरत है।
इस दोहे में कवि कहना चाहते हैं कि कबीर इन्सानों के समाज में खड़ा है और तमाम इन्सानों की ख़ैर और भलाई चाहता है। और इस भलाई व ख़ैरख़ाही में वह कोई भेदभाव नहीं रखता है। यानी उनकी ख़ैरख़ाही तमाम इन्सानों के लिये है। चाहे कोई दोस्त हो या दुश्मन, ख़ैरख़ाही के ताल्लुक़ से उसकी नज़र में सब बराबर हैं। यानी ऐसा नहीं हो सकता कि तमाम भलाइयाँ तो उसकी अपने दोस्तों के लिये हों और जब दुश्मन से मुक़ाबला हो तो हम इन्सानियत भूलकर हैवानियत पर उतर आएँ। दुश्मन पर अगर हम क़ाबू पा जाएँ तो उसे तबाह व बर्बाद करके ही दम लें। उसकी औरतों और बच्चों, बूढ़ों और बच्चों पर ज़ुल्म करें। ज़ख़्मियों और बीमारों के इलाज-मुआलजे की सुहूलियात तक से महरूम कर दें।
अगर देखा जाए तो ये ख़ैरख़ाही का जज़्बा अंबियाई जज़्बा है। ये जज़्बा ख़ुदा की तरफ़ बुलाने वाले हर दाई का जज़्बा है। ख़ुदा की तरफ़ बुलाने वाले शख़्स की लोगों से दोस्ती भी होती है और दुश्मनी भी लेकिन ख़ैरख़ाह वो सबके होते हैं।
हमारा ख़याल है कि यही वो तशरीह है जो दोहे के सही अर्थ को वाज़ेह करती है और किसी भी अच्छे इन्सान के लिये सूट करती है।