उलमा दो क़िस्म के होते हैं, उलमाए-हक़ और उलमाए-सू।
जिस शख़्स का ख़ुद का ताल्लुक़ क़ुरआन से मज़बूत हो और उसपर अमल करता हो और अवाम के ताल्लुक़ को भी क़ुरआन से मज़बूत करने की कोशिश करता हो, यानी क़ुरआन ही उसकी ज़िन्दगी का मिशन हो और अपनी ज़ात में वो क़ुरआनी तहरीक की हैसियत रखता हो और हमेशा हक़ बात कहता हो और हक़ के लिये हर वक़्त कमरबस्ता रहता हो उसकी गिनती उलमाए-हक़ में की जाएगी चाहे उसका हुलिया किसी भी तरह का हो और चाहे उसके पास किसी मदरसे और यूनिवर्सिटी की सनद न हो।
ऐसे ही उलमा के बारे में कहा गया कि ये अंबिया के वारिस होते हैं। क्योंकि अंबिया वरासत में कोई जायदाद छोड़कर नहीं जाते, बल्कि मिशन छोड़कर जाते हैं। अब जो शख़्स उस मिशन को पूरा करने के लिये उठ खड़ा हो वही असल वारिस है। यही वो शख़्सियात हैं जिनके क़रीब रहकर उनसे फ़ैज़ उठाने की सख़्त ज़रूरत है और इन्हीं की रहनुमाई में ज़िन्दगी गुज़ारने से दुनिया और आख़िरत की कामयाबी है।
इसके बरख़िलाफ़ एक ऐसा शख़्स जिसका ताल्लुक़ क़ुरआन से मज़बूत न हो, न क़ुरआन के मिशन को जानता हो और अवाम को क़ुरआन से दूर रखने की साज़िश में शरीक हो उसकी गिनती उलमाए-सू में होगी, बल्कि ऐसा शख़्स आलिम नहीं परले दर्जे का जाहिल इन्सान ठहरेगा, भले ही उसके चेहरे पर पूरे नाप की दाढ़ी हो और so called इस्लामी लिबास अपने जिस्म पर टाँगे फिरता हो और एक हाथ लम्बी सनदे-फ़राग़त भी हाथ में लिए फिरता हो।
इसी तरह के लोग हैं जो दीन के दुश्मन हैं। यही वो लोग हैं जो दीन के अन्दर दूसरे और तीसरे दर्जे की बातों को दीन की बुनियाद बनाकर पेश करते हैं और इस तरह अपना उल्लू सीधा करके मुसलमानों को आपस में दस्तो-गरेबाँ किये रखते हैं। ये लोग समाज के लिये घातक हैं, इनको पहचानकर इनसे हमेशा बचते रहने और बहुत दूर रहने की ज़रूरत है।