इस बात में कोई शक नहीं है कि उलमाए-किराम ज़मीन के चराग़ ओर अंबिया के क़ायम मक़ाम हैं। [العلماء مصابیح الارض وخلفاء الانبیاء]
हम सब को इस हक़ीक़त का भी ऐतिराफ़ करना चाहिये कि आज दुनिया में दीनी इक़दार (Values) और इस्लामी तहज़ीब व सक़ाफ़त की जो क़िन्दीलें रौशन हैं वो उलमाए-हक़ की मुस्लिहाना कोशिशों का ही नतीजा हैं। उलमाए-किराम की दीनी हैसियत को एक दिल-नशीन मिसाल के ज़रिए समझा जा सकता है कि “ज़मीन में आलिमों की मिसाल ऐसी है जैसे आसमान में सितारों की, जिनसे ख़ुश्की और तरी की अँधियारियों में रास्ते की राहनुमाई हासिल की जाती है, फिर अगर सितारे डूब जाएँ तो क़रीब है कि राह चलने वाले रास्ते से भटक जाएँ।”
उलमाए-किराम रहमत की बारिश की तरह हर जगह नफ़ा बख़्श होते हैं। प्यारे नबी (सल्ल०) ने इरशाद फ़रमाया कि आलिम को आबिद पर ऐसी फ़ज़ीलत है जैसे कि चौदहवीं रात के चाँद को तमाम तारों पर बड़ाई और बरतरी हासिल होती है। क़ुरआन करीम की बहुत-सी आयतों में उलमाए-किराम की अज़मत और इज़्ज़त को बयान किया गया है। एक जगह फ़रमाया कि आप कह दीजिये कि क्या इल्म वाले और बे-इल्म बराबर हो सकते हैं? (हरगिज़ नहीं ) [क़ुरआन 39:9] अगर कोई उलमा की क़द्र और मंज़िलत का अन्दाज़ा करना चाहे तो वो इस बात से करे कि उलमा नबियों के वारिस होते हैं।
लेकिन ये बात भी ख़ास तौर से क़ाबिले-ग़ौर है कि उलमाए-किराम को जो ये मर्तबा मिला है तो ये कोई फ़ख़्र करने के लिये नहीं मिला है। अवाम पर रौब गाँठकर उनसे चन्दा ऐंठने और उन पर अपने इल्म का सिक्का जमाने के लिये नहीं मिला है, बल्कि ये एक ज़िम्मेदारी है जिसे अगर उन्होंने अदा नहीं किया तो इसका वबाल भी उतना ही बड़ा है। हदीस में है कि इस तरह के आलिम को पेशानी के बल घसीट कर जहन्नम में फेंक दिया जाएगा।
अगर उलमा नबियों के वारिस हैं तो ग़ौर किया जाना चाहिये कि अंबिया को दुनिया में भेजा किस लिये जाता था? ताकि वारिस होने का हक़ अदा किया जा सके।
दोस्तो!
अंबिया को भेजा जाता था इसलिये कि वो कुफ़्र और ज़लालत के घटा टोप अँधेरों में तौहीदे-ख़ालिस का डंका बजाएँ। [یا ایھالمدّثر قم فانذروربّک فکبر]
अंबिया को भेजा जाता था इसलिये कि वो लोगों को बुरे कामों के बुरे अंजाम से डराएँ और अच्छे कामों पर ख़ुशख़बरी दें। [إِنَّآ أَرْسَلْنَٰكَ شَٰهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذِذِيرًا]
अंबिया को भेजा जाता था इसलिये कि वो लोगों तक हक़ का पैग़ाम पहुँचा कर उनके लिये राहे-हक़ को हमवार कर सकें। [یاأَيُّهَا ٱلرَّسُولُ بَلِّغْ مَآ أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ]
अंबिया को भेजा जाता था इसलिये कि वो लोगों के नफ़्स का तज़किया करें और उन्हें किताब और हिकमत की तालीम दें। [کٗمَآ أَرْسَلْنَا فِيكُمْ رَسُولًا مِّنكُمْ يَتْلُوا۟ عَلَيْكُمْ ءَايَٰتِنَا وَيُزَكِّيكُمْ وَيُعَلِّمُكُمُ ٱلْكِتَٰبَ وَٱلْحِكْمَةَ وَيُعَلِّمُكُم مَّا لَمْ تَكُونُوا۟ تَعْلَمُونَ]
अंबिया को भेजा जाता था इसलिये कि वो दीने-हक़ को ग़ालिब करके मज़लूमियत का शिकार अवाम को ग़ुलामी से निकाल कर आज़ादी की फ़िज़ा में ला खड़ा करें। [هُوَ ٱلَّذِىٓ أَرْسَلَ رَسُولَهُۥ بِٱلْهُدَىٰ وَدِينِ ٱلْحَقِّ لِيُظْهِرَهُۥ عَلَى ٱلدِّينِ كُلِّهِۦ]
अंबिया को भेजा जाता था इसलिये कि वो दुनिया में अद्ल और इन्साफ़ क़ायम करके अम्नो-सलामती को बहाल कर सकें। [قُلْ أَمَرَ رَبِّى بِٱلْقِسْطِ]
लिहाज़ा अब उलमाए-किराम का फ़र्ज़े-मंसबी है कि वो अंबिया के वारिस होने के नाते लोगों को दीन की दावत दें, भटके हुए लोगों को सीधी राह दिखाएँ। अल्लाह से ग़ाफ़िल लोगों के दिलों में उसकी याद पैदा करने की कोशिश करें। इस्लाम की इशाअत और दीन की इक़ामत के लिये भरपूर जिद्दोजुह्द करें।
अगर कोई आलिम अपने इस फ़रीज़े को तो फ़रामोश कर बैठा हो या इस फ़र्ज़ से ग़फ़लत बरत रहा है तो उसको ये समझ लेना चाहिये कि वो दीन को ढा रहा है। क्योंकि उसकी देखा देखी दूसरे लोग भी एहकामे-इस्लाम पर अमल तर्क कर देंगे, नतीजा ये होगा कि इस्लाम की बुनियादें हिल जाएँगी और इस्लाम कमज़ोर हो कर जाएगा। ये बात भी याद रखने की है कि किसी मदरसे में 7-8 साल कुछ किताबें पढ़ कर डिग्री हासिल करके आलिम होने का रौब गाँठने से न तो कोई शख़्स आलिम की कैटेगरी में शुमार होगा और न उसका वो मक़ाम हो सकता है जो इस्लाम में बयान किया गया है।
अब ज़रा ग़ौर फ़रमाएँ कि जिन आलिमों ने इस उम्मते-तौहीद को हक़ की तरफ़ रहनुमाई करने और समाज से बुराई के ख़ात्मे का मुजाहिद बनाने के बजाय बे-जा क़ानूनी बहसों में उलझा रखा हो, उम्मत को क़ुरआन से रूशनास करने के बजाय क़ुरआन से दूरी का दर्स दे रहे हों, उम्मत को इत्तिहाद का दर्स देने के बजाय धड़ों, फ़िरक़ों, मसलकों और जमाअतों की तब्लीग़ शुरू कर दी हो, हक़ की गवाही देने के बजाय दुनिया के लालच और हुक्मरानों की चापलूसी को अपना मक़सदे-ज़िन्दगी बना रखा हो, इनफ़िरादी व इज्तिमाई ज़िन्दगी में दीन को लागू करने के फ़र्ज़े-मंसबी से पहलू बचा कर ख़ुद को मक़ामी और सतही क़िस्म की सियासत में मशग़ूल कर लिया हो और [अम्न क़ायम करने की ख़ातिर] जिद्दोजुहद की आफ़ाक़ियत से मुँह मोड़ लिया हो, तास्सुब और गरोहियत की बुनियाद पर फ़तवे बेचना जिनका महबूब मशग़ला बन चुका हो तो समझ लीजिये कि ये उलमाए-सू इस दौर की वो बदतरीन मख़लूक़ बन चुके हैं जिन्होंने हलाल और हराम के इख़्तियारात अपने हाथ में ले कर अपने आपको रुबूबियत के दर्जे पर पहुँचा दिया है [क़ुरआन 9:31, हदीस इब्ने-अदी] और जाहिलों को अपनी इबादत में लगा लिया है। [क्योंकि हम आज देख रहे हैं कि क़ुरआन और सुन्नत का हुक्म उनके फ़तवे पर तौला जाता है न कि उनके फ़तवे को क़ुरआन और सुन्नत की तराज़ू पर]
तो ऐ ब्राद्राने-इस्लाम! उलमाए-सू के इस फ़ितने से बचो और हक़ परस्त आलिमों से ताल्लुक़ को मज़बूत करो। क़ुरआन को अपनी आँखों से पढ़ो और हक़ की हिमायत के लिये कमर-बस्ता हो जाओ ताकि क़ुरआन पर अमल करके समाज में अमन और सलामती क़ायम की जा सके और इस तरह इस्लाम का दीने-रहमत होना अवाम पर ज़ाहिर हो जाए।
अल्लाह हमारा हिमायती और मददगार काफ़ी है।
मुहम्मद अली शाह शुऐब