दोस्तो, यूँ तो तमाम मज़ाहिब में अच्छी-अच्छी बातें ही हैं, लेकिन किसी भी मज़हब की असल पहचान उसका अक़ीदा और उसमें पाए जाने इबादत के तौर-तरीक़ों से ही होती है।
इस्लाम का अक़ीदा ये है कि इस कायनात को पैदा करने वाला, चलाने वाला और एक दिन इसे ख़त्म कर देने पर क़ुदरत रखनेवाला एक ही है जिसका नाम अल्लाह है, हालाँकि लोग इसे और भी दूसरे नामों से पुकारते हैं।(17:110)
अल्लाह को एक मानने का ये अक़ीदा सिर्फ़ इतना नहीं है कि उसे एक मान लिया जाए, बल्कि इस मानने पर ही उसकी पूरी ज़िन्दगी का रवैया मुनहसिर (Dependant) है। यानी इन्सान की ज़िन्दगी का रवैया ही ये बताएगा कि क्या वो हक़ीक़त में एक ख़ुदा को मानता है या नहीं?
मसलन अगर वो एक ख़ुदा को मानता है तो ज़िन्दगी में उसका रवैया ये होना चाहिये कि चूँकि तमाम इन्सानों को उसी ने पैदा किया है, तो इस लिहाज़ से इन्सानों और इन्सानों के दरम्यान कोई फ़र्क़ और भेदभाव नहीं है, न रंग और नस्ल की बुनियाद पर, न ज़ात और ब्रादरी की बुनियाद पर; न ज़बान और इलाक़े की बुनियाद पर और न ही मर्द या औरत होने की हैसियत से लिंग (Sex) की बुनियाद पर।
ख़ुदा को एक मान लेने के बाद ये रवैया भी ज़ाहिर होना चाहिये कि अब सिवाए उस एक ख़ुदा के ज़िन्दगी के किसी भी मामले में किसी और की बात न मानी जाए। न अपने मन की ख़ाहिशात की और न बाप-दादा की ख़ाहिशात की; न ख़ानदान में बरसों से चली आ रही रस्मो-रिवाज की और न सामाजिक परम्पराओं की ; न मज़हबी पेशवाओं की और न सियासी रहनुमाओं की। यानी ज़िन्दगी के हर शोबे में हुक्म चले तो सिर्फ़ उसका। (6:57; 12:40,67)
दुनिया के सभी मज़हबों में अपने-अपने अक़ीदे के मुताबिक़ अपने ख़ुदा (बहुत से ख़ुदाओं या एक ख़ुदा का जो भी तसव्वुर वो रखते हैं उन) को ख़ुश करने और उनकी क़ुरबत हासिल करने के लिये इबादत का कोई न कोई तरीक़ा भी पाया जाता है। अक़ीदे ही की तरह इबादात के इन तौर-तरीक़ों ही पर ज़िन्दगी का रवैया भी मुनहसिर (Dependant) है।इस्लाम में इबादात के तौर-तरीक़ों के बग़ौर मुताले से ये बात मालूम होती है कि चूँकि अल्लाह को बन्दों की इबादत की कोई ज़रूरत नहीं है (क़ुरआन 29:6) इसलिए इस्लाम में इबादत (पूजा-उपासना) का जो निज़ाम है वो एक मक़सद रखता है। यानी इस्लाम में इबादात का सारा निज़ाम इन्सान की बलन्दी, उसकी शख़्सियत में इर्तिक़ा (वयक्तित्व के विकास), इन्सानी भाईचारा और समाज में अम्न व अमान के क़ियाम का ज़रिआ है।
इस्लाम में इबादत का असली मक़सद ये है कि इनके ज़रिए जहाँ एक तरफ़ इन्सान का ताल्लुक़ उसके अल्लाह (ख़ालिक़, मालिक व परवरदिगार) से मज़बूत हो जाए, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान का इन्सान से रिश्ता मज़बूत हो जाए। लोग भलाई और ख़ैर के कामों में एक-दूसरे का तआवुन (सहयोग) करें, पूरे समाज में ख़ुदा की मर्ज़ी का डंका बजने लगे ताकि लोग अम्न व सलामती के साथ ज़िन्दगी बसर कर सकें।
1) नमाज़ इन्सान के अन्दर जहाँ एक तरफ़ ख़ुदा की याद पैदा करती है (20:14) और उसे ख़ुदा के क़रीब करती है (96:19) वहीं दूसरी तरफ़ वो इन्सान को बुराइयों और अश्लील कामों से भी रोकती है। (29:45)
जमाअत से नमाज़ का निज़ाम समाज में एक-दूसरे की ख़बरगीरी और नज़्म व डिसिप्लिन सिखाती है।
2) रोज़ा जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर (ख़ुदा का) तक़वा पैदा करता है (2:183) वहीं दूसरी तरफ़ अल्लाह के बन्दों से हमदर्दी व ग़मगुसारी का जज़्बा भी पैदा करता है। (हदीस)
3) ज़कात जहाँ एक तरफ़ इन्सान के दिल के अन्दर माल की महब्बत कम करके ख़ुदा की महब्बत का जज़्बा परवान चढ़ाती है, वहीं दूसरी तरफ़ इन्सान के दिल से बुख़्ल और कंजूसी को निकालकर ख़ुदा के बन्दों पर ख़र्च करने की तरग़ीब देती है। फिर सदक़ात व ख़ैरात के ज़रिए इन्सान इन्सानियत की मैराज (पराकाष्ठा) को पहुँच जाता है।
4) हज जहाँ एक तरफ़ इन्सान के अन्दर ख़ुदा से परवानावार महब्बत की अलामत है वहीं दूसरी तरफ़ इन्सानी मसावात (बराबरी) और भाईचारे की ऐसी आलमगीर तस्वीर पेश करता है, जिसकी मिसाल दुनिया में कहीं नहीं मिलती।
इन तमाम इबादात के पीछे जो असल मक़सद कारफ़रमा है वो असल में ये है कि एक तरफ़ तो इन्सान का ताल्लुक़ ख़ुदा से मज़बूत हो जाए और दूसरी तरफ़ पूरा समाज अल्लाह की मर्ज़ी के साँचे में ढल जाए, यानी समाज का कोई शोबा ख़ुदा की इताअत से ख़ाली न रहे; चाहे इन्सान की अपनी इन्फ़िरादी ज़िन्दगी हो चाहे इज्तिमाई और समाजी ज़िन्दगी; चाहे इन्सान की मआशी (आर्थिक) ज़िन्दगी हो चाहे सियासी (राजनीतिक) ज़िन्दगी।याद रखें दोस्तो अगर हमारा दीन हमें सिर्फ़ ख़ुदा से क़रीब करने की तरग़ीब देता हो और इन्सानों (चाहे वो दूसरे धर्म के माननेवाले ही क्यों हों) से नफ़रत सिखाता हो वो दीन हमारा अपना घड़ा हुआ दीन ही हो सकता है ख़ुदा का अता किया हुआ दीन तो हरगिज़ नहीं हो सकता।
यक़ीन जानियेगा दोस्तो कि हम इबादात तो कर रहे हों लेकिन उनके मक़ासिद पूरे न कर रहे हों तो अल्लाह की नज़र में हमारी इन इबादात की कोई हैसियत नहीं। इस तरह की सब इबादात मुँह पर मार दी जाएँगी, चाहे रात-रात भर की नमाज़ें हों या दिन भर की भूख-प्यास का रोज़ा। चाहे लाखों रुपये ख़र्च करके हज किया हो या ज़कात अदा की हो और चाहे अल्लाह की राह में जान देकर शहीद का लक़ब ही क्यों न पा लिया हो। क्योंकि इस तरह की सब इबादात बेरूह हैं और बेरूह चीज़ मुर्दा या महज़ एक ढाँचा होती है, जिसकी हक़ीक़त में कोई हैसियत नहीं होती।