किसी भी मुल्क या समाज को बुरे अंजाम से अगर कोई चीज़ बचा सकती है तो वो ये है कि कोई गरोह ऐसा निज़ामे-फ़िक्र-व-अमल लेकर उठे जिसमें
आला दर्जे की रूहानी और अख़लाक़ी क़द्रें हों,
सच्चाई पर आधारित इज्तिमाई इन्साफ़ हो,
महज़ सियासी क़िस्म की नहीं बल्कि असली जम्हूरियत (Real Democracy) हो,
वर्गीय और नस्ली भेदभाव से पाक न्याय पर आधारित व्यवस्था हो,
व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर सबको तरक़्क़ी के बराबर अवसर हों।
जो एक या कुछ तबक़ों के मफ़ाद (हितों) को नहीं बल्कि सब इन्सानों के हितों को हमदर्दी और इन्साफ़ की नज़र से देखे,
किसी का हिमायती और किसी का दुश्मन न हो, तबक़ों और गरोहों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ उकसाने और लड़ाने के बजाय इन्साफ़ पर आधारित एक निज़ामे-ज़िन्दगी पर उन्हें एकजुट करे,
महरूम और वंचित तबक़ों को वही कुछ दिलाए जो उनका फ़ितरी हक़ है
और ऊँचे तबक़ों से सिर्फ़ वही कुछ ले जो उनके पास उनके फ़ितरी हक़ों से ज़्यादा है।
ऐसे किसी निज़ाम को अगर लोगों के सामने पेश किया जाए और उसको पेश करनेवाले वो लोग हों
जिनकी सीरत और किरदार पर एतिमाद और भरोसा किया जा सके,
जो ख़ुद किसी क़िस्म की क़ौमी या तबक़ाती या ज़ाती ख़ुद-ग़रज़ी में मुब्तला न हों,
जिनकी अपनी ज़िन्दगियाँ इस बात पर गवाह हों कि हक़ीक़त में उन्हीं से इन्साफ़ की उम्मीद बाँधी जा सकती है,
और जिनमें दियानतदारी भी हो और इन्तिज़ामे-दुनिया की सलाहियत भी,
……. तो कोई वजह नहीं है कि किसी मुल्क के अमन पसंद बाशिन्दे इस निज़ाम के मुक़ाबले में किसी और निज़ाम को Preference दें।