दो या दो से ज़्यादा समझदार लोगों का एक साथ रहते हुए रायों में इख़्तिलाफ़ होना उतना ही फ़ितरी है जितना की अल्लाह की इस कायनात में इन्सानों का शक्ल व सूरत में, आदत व अतवार में, रंग और बोली वग़ैरा में मुख़्तलिफ़ होना। हर शख़्स का किसी चीज़ को देखने, परखने, सोचने और उससे नतीजा निकालने का अन्दाज़ दूसरे से मिलते-जुलते (Resemblance) होने के बावजूद भी मुख़्तलिफ़ होता है, क्योंकि हर इन्सान की उम्र, तालीम, तज्रिबा, महारत और समझ का लेवल अलग होता है, इस बुनियाद पर हर शख़्स जुदागाना राय रखता है। घर में क्या पकेगा? घर में किस कम्पनी का सामान आएगा, घर के दरवाज़े किस क़िस्म के और परदे किस रंग के लगेंगे? बेटी या बेटे के रिश्ते में किसको हाँ करना है और किसको ना बोलना है? शादी की तारीख़ क्या हो? बच्चे को किस स्कूल में दाख़िल कराया जाए और किस कोचिंग में तैयारी कराई जाए? वग़ैरा रोज़मर्रा के ऐसे इशूज़ हैं जिनमें सगे रिश्तों के दरम्यान इख़्तिलाफ़ पाया जाता है। यानी रायों का इख़्तिलाफ़ हमारी समाजी और घरेलु ज़िन्दगी का अहम हिस्सा ही नहीं, बल्कि हमारी तामीर और तरक़्क़ी के लिये बेहद ज़रूरी है। अगर ये इख़्तिलाफ़ न पाया जाए तो इन्सान की ज़िन्दगी में तरक़्क़ी रुक जाएगी।
लेकिन अक्सर देखा ये गया है कि इख़्तिलाफ़ नाम का ये टूल हमारे मुआशरे में अक्सर नुक़सान का बाइस बना हुआ है। इसी इख़्तिलाफ़ नाम के टूल को इस्तेमाल करके दुनिया तरक़्क़ी करती चली जा रही है और हम इस टूल को अपने ख़िलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं। हमारे दरम्यान ये ‘इख़्तिलाफ़’ कब मुख़ालिफ़त में बदलकर दुश्मनी की हद को पहुँच जाता है इसका पता हमें उस वक़्त चलता है जब हम बहुत कुछ गँवा चुके होते हैं, बल्कि अक्सर तो पता भी नहीं चल पाता है और हम इन्तिशार व इफ़्तिराक़ का शिकार होकर तबाह होते रहते हैं। इसीलिये हम देख रहे हैं कि हमारे यहाँ जिन बातों में इख़्तिलाफ़ पाया जाता था वो आज मुख़ालिफ़त की मोटी और मज़बूत दीवारों में तब्दील हो चुका है जिससे हमारे यहाँ सबसे पहले तो शिआ और सुन्नी नाम के मज़बूत आहनी दीवारों वाले ऐसे दो मज़ाहिब वुजूद में आए कि इनको भेद पाना क़ियामत तक शायद मुमकिन न हो, फिर फ़ुक़हा के दरम्यान बाबरकत इख़्तिलाफ़ात ने जब मुख़ालिफ़त की शक्ल इख़्तियार की तो चार ऐसे जुदागाना मसलक वुजूद में आए जिन्होंने मज़ीद मुसलमानों की सलाहियतों को मज़बूत सलाख़ों वाली क़ैद में मुक़ैयद करके रख दिया। इन इख़्तिलाफ़ात की नौइयतों को समझाने और इनकी हक़ीक़त को वाज़ेह करने के लिये फिर जितनी भी जमाअतें वुजूद में आती गईं, उन्होंने भी एक ख़ास वक़्त में पहुँचकर मुख़ालिफ़त का चोला पहन लिया और फिर वही मज़बूत दीवारों वाली क़ैद मुसलमानों की तक़दीर बन गई।
अगर हम मुसलमानों के दरम्यान नफ़रतों को मिटाकर इत्तिहाद की फ़िज़ा देखना चाहते हैं तो हमें इस वक़्त इत्तिहाद से ज़्यादा इख़्तिलाफ़ के आदाब सीखने की सख़्त ज़रूरत है। अगर हम मुसलमानों की सूरते-हाल को बेहतर करना चाहते हैं तो हमें इस बात को ज़रूर समझना होगा कि इख़्तिलाफ़ एक ऐसा टूल है जिसको इस्तेमाल करके हम तरक़्क़ी के रास्ते तय कर सकते हैं, मगर ये उसी वक़्त मुमकिन हो सकता है जबकि हम हर वक़्त इस बात से अलर्ट रहें कि हमारे दरम्यान का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में न बदलने पाए। इसके लिये ज़रूरी है कि हम इख़्तिलाफ़ के कुछ मुसल्लेमा उसूलों की पुख़्तगी के साथ पाबन्दी करें।
(1) किसी भी राय को इख़्तियार करने से पहले इत्मीनान कर लें कि जो राय हम इख़्तियार करने जा रहे हैं वो हमारी समझ के मुताबिक़ दुरुस्त हैं, लेकिन इसमें ग़लती का इमकान भी उतना ही मौजूद है जितना इस राय के सही होने का। अगर हमारी राय ग़लत साबित हो तो फ़ौरन उससे रुजू कर लें। यक़ीन जानिये ये काम है तो बहुत मुश्किल लेकिन इससे रूह को बहुत सुकून मिलेगा।
(2) ज़रूरी नहीं है कि जिस राय को हम दुरुस्त मानते हैं उसको हर हाल में ज़ाहिर करना ज़रूरी ही है। कभी-कभी ये भी होता है कि हमारे सामने वाले की राय भी उतनी ही दुरुस्त है जितनी की हमारी, भले ही चाहे वो आपस में टकराती नज़र आती हो। इस सूरत में हमारे अन्दर इख़्तिलाफ़ के बावजूद बाहम एक-दूसरे के साथ रहने और ख़ुश-उस्लूबी के साथ रहने का हुनर आएगा। और इस प्रैक्टिस को करने का नतीजा ये निकलेगा कि या तो वो अपनी राय से रुजू कर लेगा या हम, या अगर इख़लास कारफ़रमा हो तो फिर दोनों की रायों से एक तीसरी ख़ैर की ऐसी राह हमवार होगी जो दोनों के दरम्यान ताल्लुक़ात को मज़बूत कर देगी।
(3) हमारी राय जो भी हो उसको पेश करने का अन्दाज़ ये तय करेगा कि हमारी बात सुनी जाएगी या रद्द कर दी जाएगी। मुमकिन है हमारी राय बहुत मुफ़ीद हो लेकिन हमारा अन्दाज़े-पेशकश इतना जारिहाना और लहजा इतना तन्ज़िया हो कि हमारी क़ीमती राय को कोई ऐतिबार के क़ाबिल ही न समझे और यूँ लोग हमारी क़ीमती राय से महरूम होकर रह जाएँगे। इसके मुक़ाबले में अगर कोई दूसरा शख़्स एक तबाहकुन राय रखता है लेकिन उसका अन्दाज़े-पेशकश इतना दिलकश है कि वो दिलों पर असर कर जाता है तो लोग उस राय से मुतास्सिर हो जाते हैं। लिहाज़ा याद रखें कि हमारा अपनी राय को पेश करने का अन्दाज़ भी कभी-कभी इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।
(4) याद रखिये कि हमारी सही राय की क़द्र तभी की जाएगी जबकि हम दूसरे की ग़लत राय का भी एहतिराम करना जानते हैं। दूसरे की राय का एहतिराम बिलकुल उसी तरह किया जाना चाहिये जिस तरह एक इन्सान का एहतिराम किया जाता है। किसी की राय पर तंज़ करना और उसे हक़ीर समझकर रद्द करना इख़्तिलाफ़ का सलीक़ा नहीं बल्कि मुख़ालिफ़त को जन्म देता है।
(5) रायों का इख़्तिलाफ़ उस वक़्त भी मुख़ालिफ़त का रंग इख़्तियार कर लेता है जबकि हम दूसरे को बहस में हराकर और उसकी ज़बान बन्द करके उसे अपनी राय के मनवाने पर मजबूर करने की कोशिश करते हैं। ऐसा करके हम उस वक़्त तो उससे जीत सकते हैं मगर याद रखें कि वहीँ मुख़ालिफ़त का बीज बोया जा चुका होता है जिसकी फ़सल हमें मुस्तक़बिल क़रीब में ज़रूर काटनी पड़ेगी।
(6) ज़रूरी नहीं है कि दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान उसी वक़्त फ़ैसला करना ज़रूरी है, बल्कि इस सूरत में इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदलने से रोकने का बेहतरीन तरीक़ा ये है कि महफ़िल को ख़ुश-उस्लूबी के साथ बरख़ास्त कर दिया जाए और दोनों को अपनी रायों पर ग़ौर करने का मौक़ा दिया जाए। इस दौरान आपस में एक-दूसरे को समझने का मौक़ा दिया जाए, अगर इसके बावजूद भी कोई फ़ैसला न हो तो दोनों को अपनी राय पर क़ायम रहते हुए दोनों को एक-दूसरे की रायों का एहतिराम करना चाहिये कि ये भी एक तरह के हौसले की बात है। ये कोई मामूली बात नहीं है।
(7) दो मुख़्तलिफ़ रायों के दरम्यान अगर हमारी राय को क़बूले-आम हासिल हो गया हो तो इस पर फ़ख़्र करने और शेख़ी बघारने की ज़रूरत नहीं है कि हमने कोई मैदान जीत लिया है, बल्कि जिसकी राय कमज़ोर पड़ गई है उसकी इज़्ज़ते-नफ़्स का ख़्याल रखें और मुनासिब तरीक़े से उसकी तारीफ़ करें और इस बात के लिये उसको मोटिवेट करें कि वो उन लोगों से बहुत बुलन्द है जो अपनी कोई राय रखते ही नहीं हैं बल्कि दूसरों की रायों पर ही तकिया किये रहते हैं।
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हमारी राय मज़बूत है या कमज़ोर दोनों सूरतों में अपने से दूसरे की राय पर किसी क़िस्म की ग़ीबत या लगाई-बुझाई करके हम इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकते हैं।
(9) अगर इख़्तिलाफ़ दो लोगों के दरम्यान का है तो उसे उसी हद तक रखें वहीँ तक डिस्कशन करें, किसी तीसरे को या तमाम लोगों को उसमें इन्वॉल्व न करें। हमेशा याद रखें कि हमारी तरह और लोग भी अपना एक ज़ेहन व दिमाग़ रखते हैं। हमारी राय के ख़िलाफ़ वाली बात मानकर लोग गुमराह हो जाएँगे इस बात की ज़िम्मेदारी हम पर न तो अल्लाह ने डाली है, न रसूल ने। लिहाज़ा पुर-अम्न रहें और जब मुनासिब मौक़ा मअलूम हो तो अपनी राय का इज़हार कर दें। इससे उम्मीद है कि राय का इख़्तिलाफ़ मुख़ालिफ़त में तब्दील नहीं होगा।
(10) इख़्तिलाफ़ किसी से भी हो, किसी भी नौइयत का हो, इससे आपस के ताल्लुक़ात में खिंचाव कम-ज़र्फ़ी की अलामत है। इख़्तिलाफ़ के बावजूद अगर कोई दूसरा फ़रीक़ आपसे मिलना या बात करना चाहता है तो इस बुनियाद पर उसे हारा हुआ समझकर उसे हक़ीर जानना इख़्तिलाफ़ को मुख़ालिफ़त में बदल सकता है।
हमेशा याद रखें कि
فَــلَا تَتَّبِعُوا الْہَوٰٓی اَنْ تَعْدِلُوْا
तुम ख़ाहिशे-नफ़्स के पीछे न पड़ो, कहीं ऐसा न हो कि तुम हक़ ही से दूर हो जाओ। (निसा : 135)
लिहाज़ा
فَاعْتَبِرُوْا یٰٓا اُولِی الْاَبْصَارِ
ऐ बसीरत की निगाह रखनेवालो इबरत हासिल करो। (हश्र : 2)
अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।