इक़बाल : सफ़ें कज, दिल परीशाँ सजदा बे-ज़ौक़
— — —
सफ़ें कज, दिल परीशाँ सजदा बे-ज़ौक़।
के जज़्बे-अन्दरूँ बाक़ी नहीं है।।
दूसरे मिसरे के बारे में तो कुछ कहा नहीं जा सकता अलबत्ता ऐसा लगता है कि अल्लामा इक़बाल (रह०) ने पहला मिसरा सर्दी के मौसम में जुमे के दिन किसी ऐसी मस्जिद के बाहर खड़े होकर लिखा होगा जिसके बाहर लॉन में मज़ेदार धूप आती है और जुमा-जुमा के मुसलमान नमाज़ी जहाँ धूप देखते हैं वहीँ सफ़ बना लेते हैं। गोया जिस तरह मुस्लिम समाज में जगह-जगह लीडर नज़र आते हैं उसी तरह जुमे की नमाज़ में जगह-जगह सफ़ें नज़र आती हैं। इमाम साहब की इत्तिहादे-मिल्लत की तक़रीर सुनकर भी उनके दिल पर असर नहीं होता। वो इसलिये कि सब जानते हैं इमाम साहब इत्तिहाद तो चाहते हैं मगर तक़रीर की हद तक। यानी इमाम साहब का अक़ीदा है कि उम्मत में इत्तिहाद तो हो मगर उनके अपने मसलक और अपनी जमाअत के उसूलों की बुनियाद पर। इसीलिये जगह-जगह उन्हें अलग-अलग मसलकों और जमाअतों की मस्जिदें और मदरसे नज़र आते हैं इस्लाम की मस्जिदें और इस्लाम के मदरसे नज़र नहीं आते। उन्हें मालूम है कि हमारी मस्जिदें इस्लाम के मराकिज़ नहीं बल्कि मसलकों के मराकिज़ हैं और हमारे मदारिस दीन के क़िले नहीं बल्कि मसलकों और जमाअतों के मज़बूत क़िले हैं।
वैसे अल्लामा साहब को माहौल से इतनी जल्दी भी मुतास्सिर नहीं होना चाहिये था। अगर अल्लामा इक़बाल आज के हमारे इस ज़माने में होते तो गर्मी के मौसम में हम उन्हें एक ऐसी मस्जिद में ले जाते जिसमें एयर-कंडीशन लगा हो। वहाँ हम उनको दिखाते कि इमाम साहब चाहे कितनी ही बेसुर-ताल की तक़रीर फ़रमा रहे हों मगर उम्मत इत्तिहाद का ऐसा ज़बरदस्त मुज़ाहिरा करती है कि जिस सफ़ में 50 लोगों के खड़े होने की गुंजाइश होती है उसमें 70 लोगों को एडजस्ट कर लिया जाता है।
मतलब उम्मत इतनी भी गई-गुज़री नहीं है, जो इतना भी न समझती हो कि कहाँ इत्तिहाद करना है और कहाँ अपनी सफ़ें ख़ुद बना लेनी हैं।