ब-जलाले-तू कि दर दिले-दिगर आरज़ू नदारम।
ब-जुज़ ईं दुआ कि बख़्शी ब-कबूतराँ उक़ाबे।।
तर्जमा : (ऐ मेरे रब) तेरे जलाल की क़सम मेरे दिल में इसके सिवा कोई और आरज़ू नहीं है, सिवाय इस दुआ के कि ऐ अल्लाह तू मेरी क़ौम के इन कबूतरों (नौजवानों) को उक़ाबी शान अता कर दे।
क्योंकि
उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में।
नज़र आती है उनको अपनी मंज़िल आसमानों में।।
चुनाँचे ऐ मेरी उम्मत के नौजवान अपने मक़ाम को समझ कि
फ़िज़ा तेरी मह व परवीं से है ज़रा आगे।
क़दम उठा, ये मक़ाम आसमाँ से दूर नहीं।।
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फ़िज़ा = ज़मीन और आसमान के दरम्यान का ख़ला (यहाँ मुराद माहौल है और मक़ाम)
मह व परवीं = चाँद और सितारे
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