Afrad key hathon mein hai aqwam ki taqdeer

Afrad key hathon mein hai aqwam ki taqdeer

In the hands of the few lies a nation's fate,

अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर।
हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।।

मेरे नौजवान साथियो! शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी क़ौम किस क़दर पस्ती का शिकार है।
इस क़ौम को अगर कोई पस्ती से निकाल सकता है तो वो तुम हो। तुम ही इस क़ौम के मुक़द्दर का सितारा हो।

मगर क्या वो नौजवान किसी क़ौम के मुक़द्दर का सितारा बन पाएँगे जो अपना क़ीमती वक़्त रातों को सोशल-मीडिया पर गुज़ारते हैं और सिर्फ़ पास होने के लिये पढ़ते हैं और किसी मालदार घराने में शादी के लिये नौकरी के जुगाड़ में रहते हैं?
नहीं! हरगिज़ नहीं!
नौजवान साथियो! क़ौमों की तक़दीर उसी वक़्त चमकती है जब उसका नौजवान किसी बड़े मक़सद के लिये जीने का अज़्म करता है। अगर ज़िन्दगी का मक़सद अपनी ज़ात से ऊपर उठकर अपना मुल्क और अपनी क़ौम हो और इन तमाम से ऊपर उठकर पूरी इन्सानियत हो तो उस क़ौम को तरक़्क़ी से कोई नहीं रोक सकता। और ज़िन्दगी का ये अज़ीम मक़सद क़ुरआन के अलावा कहीं नहीं मिलेगा।
इसलिये अपनी ज़िन्दगी की हक़ीक़त को पहचानो, अपने-आपको ग़फ़लत से निकालो और अपनी ज़िन्दगी के क़ीमती लम्हात को तामीरी (Constructive) कामों में लगाओ। याद रखो! ज़िन्दगी के ये क़ीमती लम्हात फिर कभी तुम्हें नसीब नहीं होंगे।
क़ुरआन को अपनी रातों का साथी बनाओ; दिन में ऐसे नेक लोगों की सोहबत इख़्तियार करो जो तुम्हें ज़िन्दगी की मुश्किल पगडंडियों पर ख़ूबसूरती के साथ चलने का हुनर सिखा सकें।

In the hands of the few lies a nation’s fate,
Each soul is a star that can elevate —
A guiding light through the darkest skies,
On whom the hope of a people lies.

O torchbearers of tomorrow! You may not yet realize the depths to which your community has fallen.
But mark these words: if anyone can lift it from the mire of decline, it is you.
You are the very stars upon which the destiny of this nation hangs.

But tell me—can those youth ever become the guiding light of a nation’s future?
who squander the golden hours of the night scrolling through fleeting pleasures,
Those who study not to learn but merely to pass,
and who chase careers not for contribution but for comfort —
seeking nothing higher than marriage into wealth?
No! Absolutely not.

Remember—Nations do not rise on empty ambition. They rise only when their youth resolve to live for a purpose greater than themselves.
When the goal of life transcends the self, embracing the nation, the community,
and above all, the cause of humanity—
Then no force on earth can hinder that nation’s ascent.

And such a noble purpose—this higher calling—
will not be found in the distractions of the world,
But only in the pages of the Qur’an.

So awaken to the truth of your existence.
Shake off the slumber of heedlessness.
Devote the fleeting, precious moments of your youth to works that build, uplift, and endure.

Know this well:
The golden hours of your life, once lost, shall never return.

Let the Qur’an be your companion in the stillness of night,
and by day, seek the company of the righteous—
those who can teach you how to walk life’s steep and narrow paths
With beauty, strength, and wisdom.

افراد کے ہاتھوں میں ہے اقوام کی تقدیر،
ہر فرد ہے ملت کے مقدر کا ستارہ۔

میرے نوجوان ساتھیو!
شاید تمہیں یہ شعور نہیں کہ تمہاری قوم کس قدر زوال اور پستی کا شکار ہے۔
اگر کوئی ہے جو اس قوم کو ذلت کی گہرائیوں سے نکال سکتا ہے، تو وہ تم ہو!
تم ہی اس قوم کی امید، تم ہی اس کے مقدر کا روشن ستارہ ہو۔

مگر کیا وہ نوجوان، جو راتوں کو قیمتی لمحات سوشل میڈیا کی نذر کر دیتے ہیں،
جو محض امتحان میں پاس ہونے کے لئے پڑھتے ہیں،
اور جن کی نگاہیں کسی دولت مند گھرانے میں شادی کے لئے نوکری کی جُگاڑ پر لگی رہتی ہیں —
کیا وہ ملت کے ستارے بن سکتے ہیں؟
نہیں! ہرگز نہیں!

نوجوانو!
قوموں کی تقدیر اس وقت بدلتی ہے جب ان کے نوجوان کسی بلند مقصد کے لئے جینے کا عزم کرتے ہیں۔
جب زندگی کا مقصد صرف ذاتی مفاد نہیں بلکہ اپنی قوم، اپنے وطن، بلکہ پوری انسانیت کی خدمت بن جائے —
تو ایسی قوم کی ترقی کو کوئی طاقت روک نہیں سکتی۔

اور یہ عظیم مقصد، یہ ارفع نصب العین —
تمہیں کہیں اور نہیں، صرف قرآن میں ملے گا۔

لہٰذا، اپنی زندگی کی حقیقت کو پہچانو،
غفلت کی نیند سے بیدار ہو جاؤ،
اور اپنی جوانی کے قیمتی لمحے تعمیری کاموں میں صرف کرو۔

یاد رکھو!
یہ لمحے دوبارہ نہ آئیں گے۔

قرآن کو اپنی تنہائیوں کا رفیق بناؤ،
اور دن کے اُجالوں میں ایسے نیک، باکردار لوگوں کی صحبت اختیار کرو
جو تمہیں زندگی کی کٹھن راہوں پر حسنِ سلوک اور فہم کے ساتھ چلنا سکھا سکیں۔

Hindi

अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर।
हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।।

मेरे नौजवान साथियो! शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी क़ौम किस क़दर पस्ती का शिकार है।
इस क़ौम को अगर कोई पस्ती से निकाल सकता है तो वो तुम हो। तुम ही इस क़ौम के मुक़द्दर का सितारा हो।

मगर क्या वो नौजवान किसी क़ौम के मुक़द्दर का सितारा बन पाएँगे जो अपना क़ीमती वक़्त रातों को सोशल-मीडिया पर गुज़ारते हैं और सिर्फ़ पास होने के लिये पढ़ते हैं और किसी मालदार घराने में शादी के लिये नौकरी के जुगाड़ में रहते हैं?
नहीं! हरगिज़ नहीं!
नौजवान साथियो! क़ौमों की तक़दीर उसी वक़्त चमकती है जब उसका नौजवान किसी बड़े मक़सद के लिये जीने का अज़्म करता है। अगर ज़िन्दगी का मक़सद अपनी ज़ात से ऊपर उठकर अपना मुल्क और अपनी क़ौम हो और इन तमाम से ऊपर उठकर पूरी इन्सानियत हो तो उस क़ौम को तरक़्क़ी से कोई नहीं रोक सकता। और ज़िन्दगी का ये अज़ीम मक़सद क़ुरआन के अलावा कहीं नहीं मिलेगा।
इसलिये अपनी ज़िन्दगी की हक़ीक़त को पहचानो, अपने-आपको ग़फ़लत से निकालो और अपनी ज़िन्दगी के क़ीमती लम्हात को तामीरी (Constructive) कामों में लगाओ। याद रखो! ज़िन्दगी के ये क़ीमती लम्हात फिर कभी तुम्हें नसीब नहीं होंगे।
क़ुरआन को अपनी रातों का साथी बनाओ; दिन में ऐसे नेक लोगों की सोहबत इख़्तियार करो जो तुम्हें ज़िन्दगी की मुश्किल पगडंडियों पर ख़ूबसूरती के साथ चलने का हुनर सिखा सकें।

In the hands of the few lies a nation’s fate,
Each soul is a star that can elevate —
A guiding light through the darkest skies,
On whom the hope of a people lies.

O torchbearers of tomorrow! You may not yet realize the depths to which your community has fallen.
But mark these words: if anyone can lift it from the mire of decline, it is you.
You are the very stars upon which the destiny of this nation hangs.

But tell me—can those youth ever become the guiding light of a nation’s future?
who squander the golden hours of the night scrolling through fleeting pleasures,
Those who study not to learn but merely to pass,
and who chase careers not for contribution but for comfort —
seeking nothing higher than marriage into wealth?
No! Absolutely not.

Remember—Nations do not rise on empty ambition. They rise only when their youth resolve to live for a purpose greater than themselves.
When the goal of life transcends the self, embracing the nation, the community,
and above all, the cause of humanity—
Then no force on earth can hinder that nation’s ascent.

And such a noble purpose—this higher calling—
will not be found in the distractions of the world,
But only in the pages of the Qur’an.

So awaken to the truth of your existence.
Shake off the slumber of heedlessness.
Devote the fleeting, precious moments of your youth to works that build, uplift, and endure.

Know this well:
The golden hours of your life, once lost, shall never return.

Let the Qur’an be your companion in the stillness of night,
and by day, seek the company of the righteous—
those who can teach you how to walk life’s steep and narrow paths
With beauty, strength, and wisdom.

افراد کے ہاتھوں میں ہے اقوام کی تقدیر،
ہر فرد ہے ملت کے مقدر کا ستارہ۔

میرے نوجوان ساتھیو!
شاید تمہیں یہ شعور نہیں کہ تمہاری قوم کس قدر زوال اور پستی کا شکار ہے۔
اگر کوئی ہے جو اس قوم کو ذلت کی گہرائیوں سے نکال سکتا ہے، تو وہ تم ہو!
تم ہی اس قوم کی امید، تم ہی اس کے مقدر کا روشن ستارہ ہو۔

مگر کیا وہ نوجوان، جو راتوں کو قیمتی لمحات سوشل میڈیا کی نذر کر دیتے ہیں،
جو محض امتحان میں پاس ہونے کے لئے پڑھتے ہیں،
اور جن کی نگاہیں کسی دولت مند گھرانے میں شادی کے لئے نوکری کی جُگاڑ پر لگی رہتی ہیں —
کیا وہ ملت کے ستارے بن سکتے ہیں؟
نہیں! ہرگز نہیں!

نوجوانو!
قوموں کی تقدیر اس وقت بدلتی ہے جب ان کے نوجوان کسی بلند مقصد کے لئے جینے کا عزم کرتے ہیں۔
جب زندگی کا مقصد صرف ذاتی مفاد نہیں بلکہ اپنی قوم، اپنے وطن، بلکہ پوری انسانیت کی خدمت بن جائے —
تو ایسی قوم کی ترقی کو کوئی طاقت روک نہیں سکتی۔

اور یہ عظیم مقصد، یہ ارفع نصب العین —
تمہیں کہیں اور نہیں، صرف قرآن میں ملے گا۔

لہٰذا، اپنی زندگی کی حقیقت کو پہچانو،
غفلت کی نیند سے بیدار ہو جاؤ،
اور اپنی جوانی کے قیمتی لمحے تعمیری کاموں میں صرف کرو۔

یاد رکھو!
یہ لمحے دوبارہ نہ آئیں گے۔

قرآن کو اپنی تنہائیوں کا رفیق بناؤ،
اور دن کے اُجالوں میں ایسے نیک، باکردار لوگوں کی صحبت اختیار کرو
جو تمہیں زندگی کی کٹھن راہوں پر حسنِ سلوک اور فہم کے ساتھ چلنا سکھا سکیں۔

अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर।
हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।।

मेरे नौजवान साथियो! शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी क़ौम किस क़दर पस्ती का शिकार है।
इस क़ौम को अगर कोई पस्ती से निकाल सकता है तो वो तुम हो। तुम ही इस क़ौम के मुक़द्दर का सितारा हो।

मगर क्या वो नौजवान किसी क़ौम के मुक़द्दर का सितारा बन पाएँगे जो अपना क़ीमती वक़्त रातों को सोशल-मीडिया पर गुज़ारते हैं और सिर्फ़ पास होने के लिये पढ़ते हैं और किसी मालदार घराने में शादी के लिये नौकरी के जुगाड़ में रहते हैं?
नहीं! हरगिज़ नहीं!
नौजवान साथियो! क़ौमों की तक़दीर उसी वक़्त चमकती है जब उसका नौजवान किसी बड़े मक़सद के लिये जीने का अज़्म करता है। अगर ज़िन्दगी का मक़सद अपनी ज़ात से ऊपर उठकर अपना मुल्क और अपनी क़ौम हो और इन तमाम से ऊपर उठकर पूरी इन्सानियत हो तो उस क़ौम को तरक़्क़ी से कोई नहीं रोक सकता। और ज़िन्दगी का ये अज़ीम मक़सद क़ुरआन के अलावा कहीं नहीं मिलेगा।
इसलिये अपनी ज़िन्दगी की हक़ीक़त को पहचानो, अपने-आपको ग़फ़लत से निकालो और अपनी ज़िन्दगी के क़ीमती लम्हात को तामीरी (Constructive) कामों में लगाओ। याद रखो! ज़िन्दगी के ये क़ीमती लम्हात फिर कभी तुम्हें नसीब नहीं होंगे।
क़ुरआन को अपनी रातों का साथी बनाओ; दिन में ऐसे नेक लोगों की सोहबत इख़्तियार करो जो तुम्हें ज़िन्दगी की मुश्किल पगडंडियों पर ख़ूबसूरती के साथ चलने का हुनर सिखा सकें।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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