अगर आप दर्द की शदीद तकलीफ़ में मुब्तला हैं तो ऐसे में तीन किरदारों में से आप किसे पसन्द करेंगे:
एक वो शख़्स है जो आपकी तकलीफ़ को देखकर आपसे कहता है कि आप बहुत तकलीफ़ में मुब्तला हैं लिहाज़ा मैं आपके लिये अल्लाह से दुआ कर सकता हूँ, क्योंकि शिफ़ा देनेवाला अल्लाह ही है। अल्लाह आपकी तकलीफ़ को दूर करे और आपको जल्द शिफ़ा अता करे, और बस हाथ बाँधकर किसी मोजज़े के ज़रिए आपके दर्द के ख़ात्मे के इन्तिज़ार में आपके सामने खड़ा हो जाता है।
दूसरा शख़्स वो है जो आपकी तकलीफ़ को देखकर कहता है कि आप बहुत तकलीफ़ में हैं। मैंने मेडिकल साइंस की पढ़ाई (MBBS, MD) की है। लिहाज़ा मैं आपको दवाई देता हूँ और आप 100% ठीक हो जाएँगे, लेकिन पहले 50 हज़ार रुपये जमा कराइये। गोया वो आपकी कमज़ोरी का फ़ायदा उठाते हुए आप से दवा-इलाज की लागत से बीसियों-पचासों गुना ज़्यादा रक़म ऐंठने की कोशिश करता है।
तीसरा शख़्स वो है जो आपकी तकलीफ़ को देखकर बेचैन हो उठता है और कहता है कि आप वाक़ई बहुत तकलीफ़ में हैं, मैंने मेडिकल साइंस की पढ़ाई (MBBS, MD) की है। मैं आपको दवाई देता हूँ। आप ये दवाई अल्लाह पर ये भरोसा रखते हुए लीजिये कि
وَ اِذَا مَرِضۡتُ فَہُوَ یَشۡفِیۡنِ
और जब मैं बीमार होता हूँ तो वो (अल्लाह) ही मुझे शिफ़ा देता है। (क़ुरआन 26:80)
लिहाज़ा वो दवाई देता है और अल्लाह से आपकी शिफ़ायाबी की दुआ भी करता है। फिर दवाई की लागत भर या अपनी ज़रूरत भर फ़ीस के पैसे लेता है और पूरी हमदर्दी के साथ इलाज करता है।
या एक और मिसाल लीजिये
आप गाड़ी में सफ़र कर रहे हैं। सफ़र के दौरान आपकी गाड़ी ख़राब हो जाती है। रात का वक़्त है, चारों तरफ़ अँधेरा पसरा हुआ है। ऐसे में फिर आपके सामने तीन किरदार आते हैं :
एक वो शख़्स है जो आपके पास आता है, आपसे इज़हारे-हमदर्दी करता है लेकिन वो कहता है कि मैं आपके लिये सिर्फ़ दुआ ही कर सकता हूँ। ये कहकर वो हाथ उठाता है और अल्लाह से गिड़गिड़ाकर दुआ करने लगता है कि इस मुश्किल से तुम्हें सिर्फ़ अल्लाह ही निकाल सकता है। अल्लाह इनको परेशानी से निकाल दे। और इस तरह वो ख़ुदा की तरफ़ किसी मोजज़े के ज़रिए गाड़ी के ठीक होने के इन्तिज़ार में आपके सामने हाथ बाँधकर खड़ा हो जाता है।
दूसरा शख़्स वो है जो कि एक एक्सपर्ट मैकेनिक है, वो आपके क़रीब आता है और आपको मुसीबत में फँसा देखकर गाड़ी ठीक करने से पहले एक मोटी रक़म डिमांड करता है। अब आप उसकी डिमांड पूरी करने के लिये मजबूर हैं। इस तरह वो आपसे पैसे ऐंठता है और गाड़ी ठीक कर देता है।
तीसरा शख़्स वो है जो आपकी परेशानी में मुब्तला देख कर आपके पास आता है, आपका हाल मालूम करता है और कहता है कि परेशान न हों, अल्लाह पर भरोसा रखें। मैं मैकेनिकल इंजीनियर हूँ। अल्लाह ने अगर चाहा तो मैं इस गाड़ी को ठीक कर दूँगा। वो गाड़ी ठीक कर देता है और कहता है कि
“सवार हो जाओ इसमें, अल्लाह ही के नाम से है इसका चलना भी और इसका ठहरना भी। (11: 41)
इन दोनों मिसालों में तीसरे नम्बर के किरदार को ही मैं पसन्द करूँगा और यक़ीनन आप भी इसी को पसन्द करेंगे भले ही आप किसी मसलक, मज़हब या पन्थ के मानने वाले हों। लेकिन
बदक़िस्मती से हम ऐसे तालीमी इदारे (मदरसे या कॉलेज) तो अपने आस-पास देखते हैं जो पहले और दूसरे किरदार तैयार कर रहे हैं लेकिन तीसरे किरदार बनाने का हमारे पास कोई मंसूबा नहीं है।
आज ज़रूरत है ऐसे तालीमी इदारे खड़े करने की जो तीसरे किरदार के इन्सान बनाकर इन्सानियत को सर्व करने की अहलियत और सलाहियत रखते हों।