Aao ladna seekhein

Aao ladna seekhein

Come, let us learn to fight.

आओ लड़ना सीखें

लड़ना इन्सान की फ़ितरत में शामिल है। अपनी बक़ा (Survival) के लिये उसे हर वक़्त लड़ना ही पड़ता है। हमारा ज़िन्दा जिस्म इस बात की अलामत है कि हम ज़िन्दगी की जंग में हर लम्हा मौत से जीत रहे होते हैं।

हर नफ़स उम्रे-गुज़िश्ता की है मय्यत फ़ानी।
ज़िन्दगी नाम है मर-मर के जिये जाने का।।

आम तौर से लड़ने को बुरा समझा जाता है। अगर लड़ना बुरा है और यक़ीनन बुरा है तो सवाल पैदा होगा कि जब लड़ना इन्सानी फ़ितरत है तो क्या किया जाए? इसका हल ये है कि इन्सान को ख़ुद से लड़ना सिखाया जाए, ख़ुद से लड़ने की प्रैक्टिस कराई जाए। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ना सीख जाए तो मुमकिन है इन्सान दूसरों से लड़ने से बचा रहे और यूँ इन्सान फ़साद-फ़िल-अर्ज़ से बचा रहे।

कुछ लोग कहते हैं कि उसूलों की ख़ातिर और समाज में अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ना भी ज़रूरी है। अगर ये बात दुरुस्त है और सौ फ़ीसद दुरुस्त है तो यहाँ भी सवाल ये पैदा होगा कि उसूलों की ख़ातिर दूसरों से कौन लड़ सकता है? इसका जवाब है कि वही शख़्स उसूलों की ख़ातिर दूसरों से भी लड़ सकता है जो उसूलों की ख़ातिर अपने-आप से लड़ना जानता है।

कुल मिलाकर इस दुनिया में इन्सान हर वक़्त हालते-जंग में है। अगर इन्सान ख़ुद से नहीं लड़ेगा तो लाज़िमन दूसरों से लड़ेगा। नतीजतन समाज में फ़साद बरपा होगा, जिसे क़ुरआन ‘फ़साद-फ़िल-अर्ज़’ कहता है। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ने का ख़ूगर (आदी) होगा तो दूसरों से इस लड़ाई की नौबत ही नहीं आएगी, और इस तरह समाज में अम्नो-अमान क़ायम रहे। अगर अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ने की नौबत आ जाए (और इस नौबत का आ जाना भी हक़-परस्ती का तक़ाज़ा है) तो ये लड़ाई वक़्ती और आरज़ी होगी और अद्लो-इन्साफ़ के क़ियाम के लिये होगी, नतीजा इसका भी समाज में अम्नो-अमान को क़ायम करना और बहाल रखना होगा।

मालूम हुआ बहर-सूरत हर इन्सान को ख़ुद से लड़ने ही की प्रैक्टिस कराई जाए। इस ‘ख़ुद से लड़ने को’ क़ुरआन में “तज़कियाए-नफ़्स” कहा गया है। बताया गया है कि जिसने अपने नफ़्स का तज़किया कर लिया वो कामयाब हो गया। (91 : 9, 87 : 14) नबियों के भेजे जाने का मक़सद भी यही तज़कियाए-नफ़्स बताया। (9 : 103, 62 : 2, 91 : 9) तमाम सरकशों, यहाँ तक कि फ़िरऔन जैसे बड़े सरकश को हिदायत पर लाने के लिये भी यही फ़ॉर्मूला दिया गया कि उन्हें इस बात पर आमादा किया जाए कि वो पहले ख़ुद से लड़ने को तैयार हों, यानी वो अपने तज़किया पर आमादा हों। (79 : 17, 18) अगर वो तज़किया पर आमादा हो जाएँ तो सरकशी से बाज़ आ जाएँगे।

तो आइये अपने-आपसे लड़ना सीखें यानी अपना तज़किया करें।

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

Fighting is ingrained in human nature. To survive, he must constantly struggle. The very fact that we are alive is a sign that we are, at every moment, defeating death in the ongoing battle of life.

ہر نفس عمرِ گزشتہ کی ہے میتِ فانی،
زندگی نام ہے مر مر کے جئے جانے ک
“Har nafas umre-guzishta ki hai mayyat faani.
Zindagi naam hai mar-mar key jiye jaane kaa.
(Every breath we take is the funeral of the moment just passed;
Life is nothing but the art of dying with each breath, and yet living on.)

Fighting is generally regarded as a negative trait. And indeed, if fighting is wrong—as it surely is—then the question arises: What should be done when fighting is part of human nature?
The solution lies in redirecting the battle — a man must be taught to fight himself. He must be trained in the discipline of inner struggle. For if man learns to battle his own self, likely, he will not feel the need to fight others. And thus, he will avoid spreading corruption upon the earth.

Some argue that for the sake of principles and peace in society, fighting others becomes necessary. If that is true—and it certainly is—then the next question is:
Who is truly capable of fighting others for the sake of truth and justice?
The answer is: Only the one who has first fought against himself for the same principles.

In essence, man is in a perpetual state of combat.
If he does not fight himself, he will inevitably fight others. The result? Chaos, conflict, and what the Qur’an terms “Fasād fil-Arḍ” — corruption upon the earth.
But if man becomes accustomed to battling his lower self, the conflict with others may never even arise. And thus, peace and harmony shall prevail.

However, if fighting others becomes necessary for the sake of justice, then such a fight will be temporary and purposeful, aimed solely at establishing fairness — and ultimately, peace.

In every case, it becomes essential that man be trained in self-confrontation — in the refinement of the soul, which the Qur’an refers to as Tazkiyah al-Nafs (purification of the self).
The Qur’an declares:

“He who has purified his soul, has indeed succeeded.” (91:9, 87:14)
And the very purpose of sending the Prophets was to guide mankind toward Tazkiyah. (9:103, 62:2, 91:9)

Even in the case of the most defiant oppressors—such as Pharaoh—the formula offered for his guidance was to first invite him to self-purification. (79:17-18) If he were inclined toward Tazkiyah, he would abandon his tyranny.

So let us begin this inner struggle.
Let us learn to confront our own selves.
Let us embark upon the journey of Tazkiyah.

May Allah be our Guardian and our Support.

 لڑنا انسان کی فطرت میں شامل ہے۔
اپنی بقا کے لئے اُسے ہر دم، ہر لمحہ، جدوجہد کرنی پڑتی ہے۔ ہمارا زندہ وجود اس بات کی علامت ہے کہ ہم زندگی کی جنگ میں ہر لمحہ موت کو شکست دے رہے ہیں۔

“ہر نفس عمرِ گزشتہ کی ہے میتِ فانی،
زندگی نام ہے مر مر کے جئے جانے کا۔”

عام طور پر “لڑنے” کو منفی سمجھا جاتا ہے۔ اور بلاشبہ اگر لڑنا بُرا ہے — جو کہ حقیقت میں ہے — تو سوال یہ پیدا ہوتا ہے کہ جب لڑنا انسان کی فطرت ہے، تو پھر کیا کیا جائے؟
اس کا حل یہ ہے کہ انسان کو سکھایا جائے کہ وہ اپنے آپ سے لڑے۔ اسے خود سے لڑنے کی تربیت دی جائے۔
اگر انسان خود سے لڑنا سیکھ جائے تو ممکن ہے کہ وہ دوسروں سے لڑنے سے بچ جائے، اور یوں معاشرے میں فساد کا دروازہ بند ہو جائے — وہی فساد جسے قرآن “فساد فی الارض” کہتا ہے۔

بعض لوگ کہتے ہیں کہ اصولوں کی خاطر اور معاشرے میں امن و عدل کے قیام کے لئے دوسروں سے لڑنا بھی ضروری ہوتا ہے۔
اگر یہ بات درست ہے — اور یقینا درست ہے — تو سوال یہ ہے کہ کون شخص اصولوں کی خاطر دوسروں سے لڑ سکتا ہے؟
جواب ہے: وہی شخص جو اصولوں کی خاطر پہلے اپنے آپ سے لڑنا جانتا ہو۔

غرض یہ کہ انسان ہر لمحہ حالتِ جنگ میں ہوتا ہے۔
اگر وہ خود سے نہیں لڑے گا تو دوسروں سے ضرور لڑے گا۔ اور اس کا نتیجہ معاشرتی فساد ہوگا۔
لیکن اگر انسان اپنے نفس سے لڑنے کا عادی ہو جائے، تو دوسروں سے لڑنے کی نوبت ہی نہیں آئے گی، اور یوں معاشرے میں امن و سکون قائم رہے گا۔

اور اگر حق و عدل کی خاطر دوسروں سے لڑنا ناگزیر ہو جائے — تو یہ لڑائی عارضی اور مقصود ہوگی، جس کا ہدف صرف عدل کا قیام اور امن کا حصول ہوگا۔

یوں ثابت ہوا کہ ہر انسان کو ہر حال میں اپنے نفس سے لڑنے کی مشق کرنی چاہئے۔
قرآن اسی کو “تزکیۂ نفس” کہتا ہے۔
فرمایا گیا:

“جس نے اپنا تزکیہ کر لیا، وہ کامیاب ہوا۔” (91:9، 87:14)
انبیاء کی بعثت کا مقصد بھی یہی تزکیہ بتایا گیا ہے۔ (9:103، 62:2، 91:9)

حتیٰ کہ فرعون جیسے سرکش کو راہِ ہدایت پر لانے کا طریقہ بھی یہی بتایا گیا کہ پہلے اُسے تزکیہ پر آمادہ کیا جائے۔

“کیا تُو چاہتا ہے کہ پاکیزہ ہو جائے؟” (79:17-18)

اگر وہ آمادہ ہو جائے تو وہ اپنی سرکشی چھوڑ دے گا۔

آئیے! ہم اپنے آپ سے لڑنا سیکھیں — اور اپنے نفس کا تزکیہ کریں۔

اللہ ہمارا حامی و ناصر ہو۔

Hindi

आओ लड़ना सीखें

लड़ना इन्सान की फ़ितरत में शामिल है। अपनी बक़ा (Survival) के लिये उसे हर वक़्त लड़ना ही पड़ता है। हमारा ज़िन्दा जिस्म इस बात की अलामत है कि हम ज़िन्दगी की जंग में हर लम्हा मौत से जीत रहे होते हैं।

हर नफ़स उम्रे-गुज़िश्ता की है मय्यत फ़ानी।
ज़िन्दगी नाम है मर-मर के जिये जाने का।।

आम तौर से लड़ने को बुरा समझा जाता है। अगर लड़ना बुरा है और यक़ीनन बुरा है तो सवाल पैदा होगा कि जब लड़ना इन्सानी फ़ितरत है तो क्या किया जाए? इसका हल ये है कि इन्सान को ख़ुद से लड़ना सिखाया जाए, ख़ुद से लड़ने की प्रैक्टिस कराई जाए। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ना सीख जाए तो मुमकिन है इन्सान दूसरों से लड़ने से बचा रहे और यूँ इन्सान फ़साद-फ़िल-अर्ज़ से बचा रहे।

कुछ लोग कहते हैं कि उसूलों की ख़ातिर और समाज में अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ना भी ज़रूरी है। अगर ये बात दुरुस्त है और सौ फ़ीसद दुरुस्त है तो यहाँ भी सवाल ये पैदा होगा कि उसूलों की ख़ातिर दूसरों से कौन लड़ सकता है? इसका जवाब है कि वही शख़्स उसूलों की ख़ातिर दूसरों से भी लड़ सकता है जो उसूलों की ख़ातिर अपने-आप से लड़ना जानता है।

कुल मिलाकर इस दुनिया में इन्सान हर वक़्त हालते-जंग में है। अगर इन्सान ख़ुद से नहीं लड़ेगा तो लाज़िमन दूसरों से लड़ेगा। नतीजतन समाज में फ़साद बरपा होगा, जिसे क़ुरआन ‘फ़साद-फ़िल-अर्ज़’ कहता है। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ने का ख़ूगर (आदी) होगा तो दूसरों से इस लड़ाई की नौबत ही नहीं आएगी, और इस तरह समाज में अम्नो-अमान क़ायम रहे। अगर अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ने की नौबत आ जाए (और इस नौबत का आ जाना भी हक़-परस्ती का तक़ाज़ा है) तो ये लड़ाई वक़्ती और आरज़ी होगी और अद्लो-इन्साफ़ के क़ियाम के लिये होगी, नतीजा इसका भी समाज में अम्नो-अमान को क़ायम करना और बहाल रखना होगा।

मालूम हुआ बहर-सूरत हर इन्सान को ख़ुद से लड़ने ही की प्रैक्टिस कराई जाए। इस ‘ख़ुद से लड़ने को’ क़ुरआन में “तज़कियाए-नफ़्स” कहा गया है। बताया गया है कि जिसने अपने नफ़्स का तज़किया कर लिया वो कामयाब हो गया। (91 : 9, 87 : 14) नबियों के भेजे जाने का मक़सद भी यही तज़कियाए-नफ़्स बताया। (9 : 103, 62 : 2, 91 : 9) तमाम सरकशों, यहाँ तक कि फ़िरऔन जैसे बड़े सरकश को हिदायत पर लाने के लिये भी यही फ़ॉर्मूला दिया गया कि उन्हें इस बात पर आमादा किया जाए कि वो पहले ख़ुद से लड़ने को तैयार हों, यानी वो अपने तज़किया पर आमादा हों। (79 : 17, 18) अगर वो तज़किया पर आमादा हो जाएँ तो सरकशी से बाज़ आ जाएँगे।

तो आइये अपने-आपसे लड़ना सीखें यानी अपना तज़किया करें।

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

Fighting is ingrained in human nature. To survive, he must constantly struggle. The very fact that we are alive is a sign that we are, at every moment, defeating death in the ongoing battle of life.

ہر نفس عمرِ گزشتہ کی ہے میتِ فانی،
زندگی نام ہے مر مر کے جئے جانے ک
“Har nafas umre-guzishta ki hai mayyat faani.
Zindagi naam hai mar-mar key jiye jaane kaa.
(Every breath we take is the funeral of the moment just passed;
Life is nothing but the art of dying with each breath, and yet living on.)

Fighting is generally regarded as a negative trait. And indeed, if fighting is wrong—as it surely is—then the question arises: What should be done when fighting is part of human nature?
The solution lies in redirecting the battle — a man must be taught to fight himself. He must be trained in the discipline of inner struggle. For if man learns to battle his own self, likely, he will not feel the need to fight others. And thus, he will avoid spreading corruption upon the earth.

Some argue that for the sake of principles and peace in society, fighting others becomes necessary. If that is true—and it certainly is—then the next question is:
Who is truly capable of fighting others for the sake of truth and justice?
The answer is: Only the one who has first fought against himself for the same principles.

In essence, man is in a perpetual state of combat.
If he does not fight himself, he will inevitably fight others. The result? Chaos, conflict, and what the Qur’an terms “Fasād fil-Arḍ” — corruption upon the earth.
But if man becomes accustomed to battling his lower self, the conflict with others may never even arise. And thus, peace and harmony shall prevail.

However, if fighting others becomes necessary for the sake of justice, then such a fight will be temporary and purposeful, aimed solely at establishing fairness — and ultimately, peace.

In every case, it becomes essential that man be trained in self-confrontation — in the refinement of the soul, which the Qur’an refers to as Tazkiyah al-Nafs (purification of the self).
The Qur’an declares:

“He who has purified his soul, has indeed succeeded.” (91:9, 87:14)
And the very purpose of sending the Prophets was to guide mankind toward Tazkiyah. (9:103, 62:2, 91:9)

Even in the case of the most defiant oppressors—such as Pharaoh—the formula offered for his guidance was to first invite him to self-purification. (79:17-18) If he were inclined toward Tazkiyah, he would abandon his tyranny.

So let us begin this inner struggle.
Let us learn to confront our own selves.
Let us embark upon the journey of Tazkiyah.

May Allah be our Guardian and our Support.

 لڑنا انسان کی فطرت میں شامل ہے۔
اپنی بقا کے لئے اُسے ہر دم، ہر لمحہ، جدوجہد کرنی پڑتی ہے۔ ہمارا زندہ وجود اس بات کی علامت ہے کہ ہم زندگی کی جنگ میں ہر لمحہ موت کو شکست دے رہے ہیں۔

“ہر نفس عمرِ گزشتہ کی ہے میتِ فانی،
زندگی نام ہے مر مر کے جئے جانے کا۔”

عام طور پر “لڑنے” کو منفی سمجھا جاتا ہے۔ اور بلاشبہ اگر لڑنا بُرا ہے — جو کہ حقیقت میں ہے — تو سوال یہ پیدا ہوتا ہے کہ جب لڑنا انسان کی فطرت ہے، تو پھر کیا کیا جائے؟
اس کا حل یہ ہے کہ انسان کو سکھایا جائے کہ وہ اپنے آپ سے لڑے۔ اسے خود سے لڑنے کی تربیت دی جائے۔
اگر انسان خود سے لڑنا سیکھ جائے تو ممکن ہے کہ وہ دوسروں سے لڑنے سے بچ جائے، اور یوں معاشرے میں فساد کا دروازہ بند ہو جائے — وہی فساد جسے قرآن “فساد فی الارض” کہتا ہے۔

بعض لوگ کہتے ہیں کہ اصولوں کی خاطر اور معاشرے میں امن و عدل کے قیام کے لئے دوسروں سے لڑنا بھی ضروری ہوتا ہے۔
اگر یہ بات درست ہے — اور یقینا درست ہے — تو سوال یہ ہے کہ کون شخص اصولوں کی خاطر دوسروں سے لڑ سکتا ہے؟
جواب ہے: وہی شخص جو اصولوں کی خاطر پہلے اپنے آپ سے لڑنا جانتا ہو۔

غرض یہ کہ انسان ہر لمحہ حالتِ جنگ میں ہوتا ہے۔
اگر وہ خود سے نہیں لڑے گا تو دوسروں سے ضرور لڑے گا۔ اور اس کا نتیجہ معاشرتی فساد ہوگا۔
لیکن اگر انسان اپنے نفس سے لڑنے کا عادی ہو جائے، تو دوسروں سے لڑنے کی نوبت ہی نہیں آئے گی، اور یوں معاشرے میں امن و سکون قائم رہے گا۔

اور اگر حق و عدل کی خاطر دوسروں سے لڑنا ناگزیر ہو جائے — تو یہ لڑائی عارضی اور مقصود ہوگی، جس کا ہدف صرف عدل کا قیام اور امن کا حصول ہوگا۔

یوں ثابت ہوا کہ ہر انسان کو ہر حال میں اپنے نفس سے لڑنے کی مشق کرنی چاہئے۔
قرآن اسی کو “تزکیۂ نفس” کہتا ہے۔
فرمایا گیا:

“جس نے اپنا تزکیہ کر لیا، وہ کامیاب ہوا۔” (91:9، 87:14)
انبیاء کی بعثت کا مقصد بھی یہی تزکیہ بتایا گیا ہے۔ (9:103، 62:2، 91:9)

حتیٰ کہ فرعون جیسے سرکش کو راہِ ہدایت پر لانے کا طریقہ بھی یہی بتایا گیا کہ پہلے اُسے تزکیہ پر آمادہ کیا جائے۔

“کیا تُو چاہتا ہے کہ پاکیزہ ہو جائے؟” (79:17-18)

اگر وہ آمادہ ہو جائے تو وہ اپنی سرکشی چھوڑ دے گا۔

آئیے! ہم اپنے آپ سے لڑنا سیکھیں — اور اپنے نفس کا تزکیہ کریں۔

اللہ ہمارا حامی و ناصر ہو۔

आओ लड़ना सीखें

लड़ना इन्सान की फ़ितरत में शामिल है। अपनी बक़ा (Survival) के लिये उसे हर वक़्त लड़ना ही पड़ता है। हमारा ज़िन्दा जिस्म इस बात की अलामत है कि हम ज़िन्दगी की जंग में हर लम्हा मौत से जीत रहे होते हैं।

हर नफ़स उम्रे-गुज़िश्ता की है मय्यत फ़ानी।
ज़िन्दगी नाम है मर-मर के जिये जाने का।।

आम तौर से लड़ने को बुरा समझा जाता है। अगर लड़ना बुरा है और यक़ीनन बुरा है तो सवाल पैदा होगा कि जब लड़ना इन्सानी फ़ितरत है तो क्या किया जाए? इसका हल ये है कि इन्सान को ख़ुद से लड़ना सिखाया जाए, ख़ुद से लड़ने की प्रैक्टिस कराई जाए। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ना सीख जाए तो मुमकिन है इन्सान दूसरों से लड़ने से बचा रहे और यूँ इन्सान फ़साद-फ़िल-अर्ज़ से बचा रहे।

कुछ लोग कहते हैं कि उसूलों की ख़ातिर और समाज में अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ना भी ज़रूरी है। अगर ये बात दुरुस्त है और सौ फ़ीसद दुरुस्त है तो यहाँ भी सवाल ये पैदा होगा कि उसूलों की ख़ातिर दूसरों से कौन लड़ सकता है? इसका जवाब है कि वही शख़्स उसूलों की ख़ातिर दूसरों से भी लड़ सकता है जो उसूलों की ख़ातिर अपने-आप से लड़ना जानता है।

कुल मिलाकर इस दुनिया में इन्सान हर वक़्त हालते-जंग में है। अगर इन्सान ख़ुद से नहीं लड़ेगा तो लाज़िमन दूसरों से लड़ेगा। नतीजतन समाज में फ़साद बरपा होगा, जिसे क़ुरआन ‘फ़साद-फ़िल-अर्ज़’ कहता है। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ने का ख़ूगर (आदी) होगा तो दूसरों से इस लड़ाई की नौबत ही नहीं आएगी, और इस तरह समाज में अम्नो-अमान क़ायम रहे। अगर अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ने की नौबत आ जाए (और इस नौबत का आ जाना भी हक़-परस्ती का तक़ाज़ा है) तो ये लड़ाई वक़्ती और आरज़ी होगी और अद्लो-इन्साफ़ के क़ियाम के लिये होगी, नतीजा इसका भी समाज में अम्नो-अमान को क़ायम करना और बहाल रखना होगा।

मालूम हुआ बहर-सूरत हर इन्सान को ख़ुद से लड़ने ही की प्रैक्टिस कराई जाए। इस ‘ख़ुद से लड़ने को’ क़ुरआन में “तज़कियाए-नफ़्स” कहा गया है। बताया गया है कि जिसने अपने नफ़्स का तज़किया कर लिया वो कामयाब हो गया। (91 : 9, 87 : 14) नबियों के भेजे जाने का मक़सद भी यही तज़कियाए-नफ़्स बताया। (9 : 103, 62 : 2, 91 : 9) तमाम सरकशों, यहाँ तक कि फ़िरऔन जैसे बड़े सरकश को हिदायत पर लाने के लिये भी यही फ़ॉर्मूला दिया गया कि उन्हें इस बात पर आमादा किया जाए कि वो पहले ख़ुद से लड़ने को तैयार हों, यानी वो अपने तज़किया पर आमादा हों। (79 : 17, 18) अगर वो तज़किया पर आमादा हो जाएँ तो सरकशी से बाज़ आ जाएँगे।

तो आइये अपने-आपसे लड़ना सीखें यानी अपना तज़किया करें।

अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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