आओ लड़ना सीखें
लड़ना इन्सान की फ़ितरत में शामिल है। अपनी बक़ा (Survival) के लिये उसे हर वक़्त लड़ना ही पड़ता है। हमारा ज़िन्दा जिस्म इस बात की अलामत है कि हम ज़िन्दगी की जंग में हर लम्हा मौत से जीत रहे होते हैं।
हर नफ़स उम्रे-गुज़िश्ता की है मय्यत फ़ानी।
ज़िन्दगी नाम है मर-मर के जिये जाने का।।
आम तौर से लड़ने को बुरा समझा जाता है। अगर लड़ना बुरा है और यक़ीनन बुरा है तो सवाल पैदा होगा कि जब लड़ना इन्सानी फ़ितरत है तो क्या किया जाए? इसका हल ये है कि इन्सान को ख़ुद से लड़ना सिखाया जाए, ख़ुद से लड़ने की प्रैक्टिस कराई जाए। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ना सीख जाए तो मुमकिन है इन्सान दूसरों से लड़ने से बचा रहे और यूँ इन्सान फ़साद-फ़िल-अर्ज़ से बचा रहे।
कुछ लोग कहते हैं कि उसूलों की ख़ातिर और समाज में अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ना भी ज़रूरी है। अगर ये बात दुरुस्त है और सौ फ़ीसद दुरुस्त है तो यहाँ भी सवाल ये पैदा होगा कि उसूलों की ख़ातिर दूसरों से कौन लड़ सकता है? इसका जवाब है कि वही शख़्स उसूलों की ख़ातिर दूसरों से भी लड़ सकता है जो उसूलों की ख़ातिर अपने-आप से लड़ना जानता है।
कुल मिलाकर इस दुनिया में इन्सान हर वक़्त हालते-जंग में है। अगर इन्सान ख़ुद से नहीं लड़ेगा तो लाज़िमन दूसरों से लड़ेगा। नतीजतन समाज में फ़साद बरपा होगा, जिसे क़ुरआन ‘फ़साद-फ़िल-अर्ज़’ कहता है। अगर इन्सान ख़ुद से लड़ने का ख़ूगर (आदी) होगा तो दूसरों से इस लड़ाई की नौबत ही नहीं आएगी, और इस तरह समाज में अम्नो-अमान क़ायम रहे। अगर अम्नो-अमान की ख़ातिर दूसरों से लड़ने की नौबत आ जाए (और इस नौबत का आ जाना भी हक़-परस्ती का तक़ाज़ा है) तो ये लड़ाई वक़्ती और आरज़ी होगी और अद्लो-इन्साफ़ के क़ियाम के लिये होगी, नतीजा इसका भी समाज में अम्नो-अमान को क़ायम करना और बहाल रखना होगा।
मालूम हुआ बहर-सूरत हर इन्सान को ख़ुद से लड़ने ही की प्रैक्टिस कराई जाए। इस ‘ख़ुद से लड़ने को’ क़ुरआन में “तज़कियाए-नफ़्स” कहा गया है। बताया गया है कि जिसने अपने नफ़्स का तज़किया कर लिया वो कामयाब हो गया। (91 : 9, 87 : 14) नबियों के भेजे जाने का मक़सद भी यही तज़कियाए-नफ़्स बताया। (9 : 103, 62 : 2, 91 : 9) तमाम सरकशों, यहाँ तक कि फ़िरऔन जैसे बड़े सरकश को हिदायत पर लाने के लिये भी यही फ़ॉर्मूला दिया गया कि उन्हें इस बात पर आमादा किया जाए कि वो पहले ख़ुद से लड़ने को तैयार हों, यानी वो अपने तज़किया पर आमादा हों। (79 : 17, 18) अगर वो तज़किया पर आमादा हो जाएँ तो सरकशी से बाज़ आ जाएँगे।
तो आइये अपने-आपसे लड़ना सीखें यानी अपना तज़किया करें।
अल्लाह हमारा हामी व नासिर हो।