इन्सान की ज़िन्दगी में रौशनी और आँख का ताल्लुक़ इतना गहरा और आपस में एक दुसरे से इतना जुड़ा हुआ है कि एक के बग़ैर दूसरी चीज़ का वुजूद बेमाना (meaningless) होकर रह जाता है।
अगर रौशनी न हो तो इंसान आँखें रखने के बावजूद भी दुनिया की चीज़ों और उनकी हक़ीक़तों को देख नहीं सकता, इसी तरह
रौशनी तो मौजूद हो मगर इन्सान अपनी आँखें न खोले तब भी वो दुनिया की चीज़ों और उनकी हक़ीक़तों को नहीं देख सकता है।
इस मिसाल को सामने रखते हुए देखा जाए तो ये भी एक हक़ीक़त है कि इन्सानी अक़्ल वो आँख है जिसे दुनिया की हक़ीक़त को देखने के लिये रौशनी (क़ुरआन) की ज़रूरत है। लिहाज़ा अगर इस रौशनी (क़ुरआन) के होते हुए हमने अक़्ल (की आँख) को बन्द रखा तो हम न तो कभी रास्ता पा सकते हैं और न ही दुनिया और उसकी चीज़ों की हक़ीक़त को पा सकते हैं। और इसके बरअक्स रौशनी (क़ुरआन) पर पर्दा डालकर महज़ अपनी अक़्ल से (आँखें फाड़-फाड़ कर) दुनिया को देखने की कोशिशें कीं तो भी हमें दुनिया की उस हक़ीक़त को समझ नहीं पाएँगे जैसे की वो है।
इन्सान की बदक़िस्मती ये है कि वो कभी एक इन्तिहा का शिकार होता है तो कभी दूसरी इन्तिहा पर विराजमान हो जाता है।
# एक इन्तिहा तो ये होती है कि वो अल्लाह की हिदायत (रौशनी) पर पर्दा डालकर महज़ अपनी अक़्ल का ग़ुलाम बन जाता है और वो या तो नफ़्स-परस्ती की अथाह गहराइयों में ऐसा गिरता है जहाँ उसे अपने अलावा किसी की आवाज़ सुनाई नहीं देती है और नफ़्स-परस्ती की मस्ती में वो जितना-जितना अपने आपको बुलन्दी पर पाता है अख़लाक़ी ऐतिबार से वो उतना ही पस्ती की गहराई में गिरता चला जाता है। या फिर वो अपने ही जैसे दूसरे इन्सानों की अक़्ल का ऐसा ग़ुलाम बन जाता है कि जहाँ उसे ख़ुद अपनी भी आवाज़ नहीं आती।
# दूसरी इन्तिहा ये होती है कि ख़ुद अपनी अक़्ल पर पर्दा डाल लेता है और अल्लाह की हिदायत (रौशनी) के होते हुए उसे कुछ दिखाई नहीं देता, हिदायत देने और रास्ता दिखाने के लिये बताई गई बातों को तक़द्दुस का जामा पहना देता है और वाक़िआत को देव-मालाई क़िस्से समझ बैठता है जिसके नतीजे में दीन मज़हब बनकर रह जाता है, जिसमें न कोई हरकतो-अमल होती है और न तरक़्क़ी व तामीर।
देखा जाए तो दोनों रवैये ही इन्सानी पस्ती और सामाजिक बिगाड़ को जन्म देते हैं। लिहाज़ा सही एप्रोच यही है कि रब्बानी हिदायत की रौशनी में अक़्ल और शुऊर का इस्तेमाल करते हुए इन्सानी समाज की तामीर व तरक़्क़ी की मंज़िलें तय की जाएँ ताकि समाज में अम्नो-सलामती भी क़ायम हो और इन्सानी नफ़्स को सुकून व इत्मीनान भी।