मुल्क की जो मौजूदा सूरते-हाल हमारे सामने है उसमें वाक़ई हमें एकजुट होकर हक़ और इंसाफ़ के लिए आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। हमें यक़ीनन मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहफ़्फ़ुज़ के लिए आगे आना चाहिए, बिला शुबह JNU के नजीब की भी फ़िक्र होनी चाहिए और मिन्हाज अंसारी के लिए भी इन्साफ़ की आवाज़ उठानी चाहिए। लेकिन एक और काम है जो नहीं हो पा रहा है, जिसकी सख़्त ज़रूरत है और जिसके हुए बग़ैर इन मज़ालिम का सिलसिला रुकनेवाला नहीं है। क्योंकि हर ज़ुल्म का सिरा किसी न किसी शक्ल में उसी से जा मिलता है। और वो है अल्लाह के बन्दों को अल्लाह से जोड़ने का काम। इंसानों को इंसानों की ग़ुलामी से निकालकर एक अल्लाह की ग़ुलामी में ला खड़ा करने का काम।
इस काम के लिए ज़रूरी है कि अल्लाह के बन्दों को अल्लाह का पैग़ाम बेलाग तरीक़े से पहुँचाया जाए। ख़ास तौर से नौजवान नस्ल को अल्लाह की किताब से रूशनास कराया जाए, उनके किरदार को इस किताब के मुताबिक़ ढालने की इस तरह कोशिश की जाए कि वो मुनज़्ज़म होकर अपने अख़लाक़ व किरदार के हथियार से हर ज़ुल्म व नाइंसाफ़ी का मुक़ाबला करने के लिए तैयार हों। जब तक यह काम नहीं होगा इसी तरह नित नए मसाएल से हम दो-चार होते रहेंगे और इसी तरह अख़लाक़, रोहित और मिन्हाज ज़ुल्म का शिकार होकर मारे जाते रहेंगे और इसी तरह नजीब ग़ायब होते रहेंगे.
अफ़सोस होता है कि जो लोग और जो जमाअतें इसी ख़ास काम के लिए खड़ी हुई थीं उन्होंने भी अपनी कामयाबी को क़रीब न देखकर और मुस्तक़बिल के मौहूम ख़तरात से घबराकर सिपर डाल दी और वे भी उसी भीड़ में शामिल हो गए जिसमें मज़हबी और सियासी रहनुमा नुमायाँ होकर अपनी रोटियाँ सेंकने में लगे हुए थे।
ज़रूरत इस बात की है कि वक़्ती तौर पर उठनेवाले तमाम मुद्दों को एकजुट होकर एड्रेस करने के साथ-साथ करने के असल काम पर भी फ़ोकस किया जाए। ज़ालिमों से नफ़रत करने और उन्हें बुरा-भला कहने के बजाय एक डॉक्टर के जैसी ख़ैरख़ाही के साथ उनके इलाज की भी फ़िक्र की जाए। गालियों और पत्थरों के जवाब में भलाई की दुआ की जाए, ज़ुल्म और तकलीफ़ पहुँचने पर सब्र करने की मश्क़ की जाए, ज़ाती झगड़ों और तबक़ाती कशमकश में न उलझकर इंसानों की तामीर व तरक़्क़ी और समाजी अम्न व सलामती की बात की जाए, बेकार और बेहूदा बातों को नज़र-अन्दाज़ करके लोगों को आख़िरत के अज़ाब से डराया जाए और अल्लाह को पहचानकर उसका रास्ता इख़्तियार करने पर जन्नत की ख़ुशख़बरी सुनाई जाए। हक़ से बेपरवाह लोगों के पीछे पड़ने के बजाय उन लोगों की तरफ़ ध्यान दिया जाए जिनके अन्दर हक़ की तलब पाई जाती हो चाहे वे दुनियावी एतिबार से ज़रा भी ध्यान देने लायक़ न समझे जाते हों। अपनी इस तमाम जिद्दो-जुहद में दिखावे और नुमाइश से बचने की पूरी कोशिश की जाए, अपने कारनामों को गिनाकर फ़ख़्र जताने और लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने की ज़र्रा-बराबर कोशिश न की जाए, बल्कि जो कुछ किया जाए ख़ामोशी के साथ सिर्फ़ ख़ुदा के लिए किया जाए।
ये बात भी ध्यान रखने की है कि काम का यह तरीक़ा ग़ैर-मामूली सब्र, बर्दाश्त और लगातार मेहनत चाहता है। इसमें एक लम्बी मुद्दत तक लगातार काम करने के बाद भी शानदार नतीजों की वह हरी-भरी फ़सल लहलहाती नज़र नहीं आती। इससे दिलबर्दाश्ता होकर न बैठ जाएँ, बस अपने करने का काम जुनूनी कैफ़ियत के साथ करते चले जाएँ। हम देखेंगे कि एक दिन अल्लाह की मदद ज़रूर आएगी, मुल्क-मिल्लत के हालात बदलेंगे और अमन व सुकून का बोलबाला होकर रहेगा। अगर यह काम न किया गया तो समझ लीजिए मुस्तक़बिल के जिन मौहूम ख़तरात का हमें अन्देशा है वो हमारा पीछा नहीं छोड़ेंगे। हम अगर किसी तरह बच भी गए तो हमारी आनेवाली नस्लें पर्सनल लॉ तो बहुत दूर की बात है न अपनी जानों का तहफ़्फ़ुज़ कर पाएँगी न अपने ईमान का।
अल्लाह हम सबको अपनी अमान में रखे।
मुहम्मद अली शाह शुएब