अपनी ख़िदमत और दीगर कामों को कराने के लिए ग़ुलाम रखने को इस्लाम ने कभी हराम क़रार नहीं दिया. लेकिन ग़ुलामों के साथ अच्छा सुलूक करने, उनकी ख़बरगीरी करने और अपने जैसा खिलाने-पिलाने, यहाँ तक कि ग़ुलामों को आज़ाद करने पर अज्रो-सवाब का मुसतहिक़ हो जाने पर इतना ज़ोर दिया गया कि ग़ुलामी सिरे से ख़त्म ही हो गई और उसका नाम-निशान तक बाक़ी न रहा.
एक ही महफ़िल में तीन तलाक़ देना इन्तिहाई ग़ैर मुनासिब, अल्लाह और रसूल को नापसन्दीदा, ग़ैर अख़लाक़ी और ग़ैर क़ुरआनी हरकत है, जिसके लिए इस्लाम ने सज़ा भी तजवीज़ की है. इससे इस्लाम के मिज़ाज का पता लगाया जा सकता है कि इस्लाम इसे जायज़ रखते हुए जड़ से ख़त्म करना चाहता है, लेकिन मुसलमानों के क़ुरआन से दूर रहने और इस्लाम के मिज़ाज को न समझने की वजह से ये मकरूह अमल आज भी जारी है और नौबत यहाँ तक आ पहुँची है कि इस्लाम दुश्मनों ने इसे ढाल बनाकर न सिर्फ़ इस्लाम को बदनाम करने की कोशिश की है बल्कि यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड को नाफ़िज़ करने की मुहीम भी तेज़ कर दी है और इसके लिए चन्द नाम-निहाद दीन-बेज़ार मुसलमान मर्द-ख़वातीन को आगे कर दिया है, गोया लोहे को लोहे से ही काट डालने की पूरी कोशिश की जा रही है.
अगर मुसलमान इस्लाम और क़ुरआन के मिज़ाज को अपनी आँखों से पढ़ते और समझते तो इस करीह तरीन अमल को जायज़ रखते हुए भी ख़त्म कर सकते थे. मगर अफ़सोस! ऐसा न हो सका.