*मस्जिद से बाज़ार तक — पार्ट-2 : बाज़ार से रब तक*
ज़ैद की ज़िन्दगी अब एक नई राह पर थी। अब वो पहले जैसा नहीं रहा था। वो जान चुका था कि अल्लाह को सिर्फ़ सज्दों की ज़रूरत नहीं है, वह देखना चाहता है कि उसके बन्दे इस दुनिया में रहते हुए अपनी ज़िम्मेदारियों को किस तरह निभाते हैं! — उसे मालूम हो गया था कि ज़मीन पर इंसान का अपने रब के हुक्म के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारना ही असल इबादत है।
अब ज़ैद का कारोबार भी चल पड़ा था। दुकान पर ग्राहकों की भीड़ रहने लगी थी। उसकी मेहनत और ईमानदारी ने मोहल्ले में उसे एक भरोसेमंद ताजिर बना दिया था। अब बीवी भी ख़ुश थी और बच्चे भी, घर का ख़र्च भी अच्छे से चल रहा था और बच्चों की बेहतरीन तालीम भी हो रही थी।
फ़र्ज़ इबादात तो वह करता ही करता, इसके साथ-साथ उसे जब भी वक़्त मिलता, नफ़्ल इबादत में भी डूब जाता। लेकिन फ़र्क़ ये था कि अब ये इबादत उसे उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल नहीं कर पाती थी।
मगर एक तड़प अब भी थी जो दिल के किसी कोने में बाक़ी थी — वो ख़्वाब, वो रौशनी, वो सुकून… जिसे उसने बस एक लम्हे के लिए महसूस किया था, उसकी रूह उसी ख़्वाब में कहीं अटकी रह गई थी।
अब उसकी दुआओं में एक नई तड़प थी: “ऐ मेरे रब! उस रात तूने मुझे पुकारा, मुझे समझाया, मुझे रास्ता दिखाया… अब बस एक आरज़ू है — तेरे दीदार की आरज़ू। ऐ रब! तेरी रौशनी तो देखी, क्या तेरा दीदार भी हो सकता है?”
वह बार-बार सजदे में यही दुआ माँगता।
फिर एक रात — जब उसका जिस्म थका हुआ मगर दिल जागा हुआ था, उसने वही दुआ की और दुआ करते करते उसकी आँखें बंद हो गईं — और एक बार फिर ख़्वाब आया।
ज़ैद एक मैदान में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था और सन्नाटा पसरा हुआ था। कानों में सन्नाटे की सीटी गूँज रही थी। वह उस ख़ामोशी की आवाज़ को महसूस कर रहा था। फिर सामने से हल्की सी रौशनी उसकी तरफ़ चलती हुई नज़र आई। और धीरे-धीरे क़रीब होती चली गई।
वह पहचान गया कि ये वही रौशनी है जो उसे पहले मिली थी। इस बार वो रौशनी उसके इर्द-गिर्द चल रही थी।
ज़ैद की आँखों में चमक आ गई।
दिल ही दिल में कहा: “आज शायद मेरे रब से मेरी मुलाक़ात होगी!”
इससे पहले कि वो कुछ कहता, एक आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! तू मुझे देखने की ताक़त नहीं रखता। तुझे वो आँखें दी ही नहीं गईं जो मुझे देख सकें। लेकिन अगर तू मुझ से मिलना चाहता है — तो मिल सकता है। मैं तो तेरे क़रीब ही रहता हूँ। बल्कि मैं तो बहुत बार तेरे पास आया मगर तू मुझसे मिला ही नहीं।”
ज़ैद ने काँपते हुए कहा: “मेरे रब! ये कैसे हो सकता है! मैं तो बहुत दिनों से ये तमन्ना लिए घूम रहा हूँ। ये कैसे और कब हुआ कि तू आया और मैं नहीं मिला।”
आवाज़ आई : “ऐ इब्ने-आदम! मैं बीमार था, तूने मेरी आयादत नहीं की!”
ज़ैद हैरान: “ऐ रब! तू बीमार कैसे हो सकता है, तू तो सबका शिफ़ा देने वाला है!”
आवाज़ आई: “क्या तुझे याद नहीं, तेरे मोहल्ले का वो बूढ़ा जो कई दिनों से बुख़ार में मुबतला था, अगर तू उसकी आयादत करता, तो तू मुझे उसके पास पाता।”
ज़ैद की रूह काँप गई, उसकी साँसें जैसे थम सी गईं, जैसे किसी ने उसके सीने में शर्म का सैलाब भर दिया हो।
फिर आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! मैंने तुझसे खाना माँगा, तूने मुझे खिलाया नहीं!”
ज़ैद ने फिर हैरान होकर कहा: “मेरे अल्लाह! तुझे भूख कैसी? तू तो सबको रिज़्क़ देने वाला है!”
आवाज़ आई : “क्या तुझे वो औरत याद नहीं जो तेरे ही दोस्त की बेवा है। वह अक्सर अपने बच्चे के साथ भूखी रहती है, अगर तू उसको खाना खिला देता, तो वो खाना मेरे पास आ जाता।”
ज़ैद की आँखें फट गईं। मन ही मन अपने आप पर कुढ़ने लगा, ‘क्या हासिल है इस इबादत का और इस पैसे को कमाने का कि जब मुझे अपने ही क़रीबी लोगों का ख़याल नहीं आता।’
आवाज़ आई : “ऐ इब्ने आदम मैं इल्म हासिल नहीं कर पाया, मैं तेरे पास आया लेकिन तूने इल्म हासिल करने में कोई मदद नहीं की।”
ज़ैद ने हैरत से कहा : “ऐ मेरे रब तू तो ग़ैब और मौजूद का इल्म रखनेवाला है, तू तो इल्म का सरचश्मा है तुझे भला इल्म की क्या ज़रूरत है?”
आवाज़ आई : “क्या तुझे वो बच्चा याद नहीं जो तेरी रिश्तेदारी का ही है, पैसे न होने की वजह से इल्म हासिल नहीं कर सका और तेरी दुकान पर मज़दूरी करने पर मजबूर हो गया है, अगर तू उसकी तालीम व तरबियत का इन्तिज़ाम कर देता तो तू मुझे उसके पास पाता।”
ज़ैद सकते में था, मानो वह शर्म के मारे ज़मीन में गढ़ा जा रहा था। उसकी आँखें नम हो गईं, दिल बैठ गया।
ज़ैद की हालत ये थी जैसे कलेजा मुँह को आ रहा हो और ज़बान पर ताला लग गया हो। दिल तकलीफ़ से भर गया, हलक़ सूख गया था।
ज़ैद अब काँप रहा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, दिल पछतावे से भरा था। वह सिसक रहा था। उतने ही में वह रौशनी फिर से उसके दिल में समा गई।
और एक बार फिर, अँधेरा छा गया…
मगर इस बार — ज़ैद शर्म के मारे पसीना-पसीना हो रहा था, उस पर अफ़सोस तारी था, लेकिन अब उसे समझ आ चुका था कि मैं रब को देखने की कैसी बचकाना सी ख़ाहिशें अपने दिल में रखता था।
ख़ुदा तो हमारे क़रीब ही मिल सकता है, अगर किसी भूखे को खाना खिला दिया जाए तो रब से मुलाक़ात हो जाए।
किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत पूरी कर दी गई तो मानो तुम्हारी तुम्हारे रब से मुलाक़ात हो गई।
अब ज़ैद की ज़िन्दगी एक मुकम्मल ज़िन्दगी थी, वह इबादात में भी अपने रब से मुलाक़ात करता और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतों को पूरा करके भी।
अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करके भी रब को राज़ी रखने की कोशिश करता और समाज को बेहतर बनाने में अपना रोल अदा करके भी ख़ुदा को ख़ुश करने की कामयाब कोशिश करता।