Masjid sey Bazar tak Part-2 : Bazar sey Rab tak

Masjid sey Bazar tak Part-2 : Bazar sey Rab tak

*मस्जिद से बाज़ार तक — पार्ट-2 : बाज़ार से रब तक* ज़ैद की ज़िन्दगी अब एक नई राह पर थी। अब वो पहले जैसा नहीं रहा था। वो जान चुका था कि अल्लाह को सिर्फ़ सज्दों की ज़रूरत नहीं है, वह देखना चाहता है कि उसके बन्दे इस दुनिया में रहते हुए अपनी ज़िम्मेदारियों को किस तरह निभाते हैं! — उसे मालूम हो गया था कि ज़मीन पर इंसान का अपने रब के हुक्म के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारना ही असल इबादत है। अब ज़ैद का कारोबार भी चल पड़ा था। दुकान पर ग्राहकों की भीड़ रहने लगी थी। उसकी मेहनत और ईमानदारी ने मोहल्ले में उसे एक भरोसेमंद ताजिर बना दिया था। अब बीवी भी ख़ुश थी और बच्चे भी, घर का ख़र्च भी अच्छे से चल रहा था और बच्चों की बेहतरीन तालीम भी हो रही थी। फ़र्ज़ इबादात तो वह करता ही करता, इसके साथ-साथ उसे जब भी वक़्त मिलता, नफ़्ल इबादत में भी डूब जाता। लेकिन फ़र्क़ ये था कि अब ये इबादत उसे उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल नहीं कर पाती थी। मगर एक तड़प अब भी थी जो दिल के किसी कोने में बाक़ी थी — वो ख़्वाब, वो रौशनी, वो सुकून… जिसे उसने बस एक लम्हे के लिए महसूस किया था, उसकी रूह उसी ख़्वाब में कहीं अटकी रह गई थी। अब उसकी दुआओं में एक नई तड़प थी: “ऐ मेरे रब! उस रात तूने मुझे पुकारा, मुझे समझाया, मुझे रास्ता दिखाया… अब बस एक आरज़ू है — तेरे दीदार की आरज़ू। ऐ रब! तेरी रौशनी तो देखी, क्या तेरा दीदार भी हो सकता है?” वह बार-बार सजदे में यही दुआ माँगता। फिर एक रात — जब उसका जिस्म थका हुआ मगर दिल जागा हुआ था, उसने वही दुआ की और दुआ करते करते उसकी आँखें बंद हो गईं — और एक बार फिर ख़्वाब आया। ज़ैद एक मैदान में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था और सन्नाटा पसरा हुआ था। कानों में सन्नाटे की सीटी गूँज रही थी। वह उस ख़ामोशी की आवाज़ को महसूस कर रहा था। फिर सामने से हल्की सी रौशनी उसकी तरफ़ चलती हुई नज़र आई। और धीरे-धीरे क़रीब होती चली गई। वह पहचान गया कि ये वही रौशनी है जो उसे पहले मिली थी। इस बार वो रौशनी उसके इर्द-गिर्द चल रही थी। ज़ैद की आँखों में चमक आ गई। दिल ही दिल में कहा: “आज शायद मेरे रब से मेरी मुलाक़ात होगी!” इससे पहले कि वो कुछ कहता, एक आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! तू मुझे देखने की ताक़त नहीं रखता। तुझे वो आँखें दी ही नहीं गईं जो मुझे देख सकें। लेकिन अगर तू मुझ से मिलना चाहता है — तो मिल सकता है। मैं तो तेरे क़रीब ही रहता हूँ। बल्कि मैं तो बहुत बार तेरे पास आया मगर तू मुझसे मिला ही नहीं।” ज़ैद ने काँपते हुए कहा: “मेरे रब! ये कैसे हो सकता है! मैं तो बहुत दिनों से ये तमन्ना लिए घूम रहा हूँ। ये कैसे और कब हुआ कि तू आया और मैं नहीं मिला।” आवाज़ आई : “ऐ इब्ने-आदम! मैं बीमार था, तूने मेरी आयादत नहीं की!” ज़ैद हैरान: “ऐ रब! तू बीमार कैसे हो सकता है, तू तो सबका शिफ़ा देने वाला है!” आवाज़ आई: “क्या तुझे याद नहीं, तेरे मोहल्ले का वो बूढ़ा जो कई दिनों से बुख़ार में मुबतला था, अगर तू उसकी आयादत करता, तो तू मुझे उसके पास पाता।” ज़ैद की रूह काँप गई, उसकी साँसें जैसे थम सी गईं, जैसे किसी ने उसके सीने में शर्म का सैलाब भर दिया हो। फिर आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! मैंने तुझसे खाना माँगा, तूने मुझे खिलाया नहीं!” ज़ैद ने फिर हैरान होकर कहा: “मेरे अल्लाह! तुझे भूख कैसी? तू तो सबको रिज़्क़ देने वाला है!” आवाज़ आई : “क्या तुझे वो औरत याद नहीं जो तेरे ही दोस्त की बेवा है। वह अक्सर अपने बच्चे के साथ भूखी रहती है, अगर तू उसको खाना खिला देता, तो वो खाना मेरे पास आ जाता।” ज़ैद की आँखें फट गईं। मन ही मन अपने आप पर कुढ़ने लगा, ‘क्या हासिल है इस इबादत का और इस पैसे को कमाने का कि जब मुझे अपने ही क़रीबी लोगों का ख़याल नहीं आता।’ आवाज़ आई : “ऐ इब्ने आदम मैं इल्म हासिल नहीं कर पाया, मैं तेरे पास आया लेकिन तूने इल्म हासिल करने में कोई मदद नहीं की।” ज़ैद ने हैरत से कहा : “ऐ मेरे रब तू तो ग़ैब और मौजूद का इल्म रखनेवाला है, तू तो इल्म का सरचश्मा है तुझे भला इल्म की क्या ज़रूरत है?” आवाज़ आई : “क्या तुझे वो बच्चा याद नहीं जो तेरी रिश्तेदारी का ही है, पैसे न होने की वजह से इल्म हासिल नहीं कर सका और तेरी दुकान पर मज़दूरी करने पर मजबूर हो गया है, अगर तू उसकी तालीम व तरबियत का इन्तिज़ाम कर देता तो तू मुझे उसके पास पाता।” ज़ैद सकते में था, मानो वह शर्म के मारे ज़मीन में गढ़ा जा रहा था। उसकी आँखें नम हो गईं, दिल बैठ गया। ज़ैद की हालत ये थी जैसे कलेजा मुँह को आ रहा हो और ज़बान पर ताला लग गया हो। दिल तकलीफ़ से भर गया, हलक़ सूख गया था। ज़ैद अब काँप रहा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, दिल पछतावे से भरा था। वह सिसक रहा था। उतने ही में वह रौशनी फिर से उसके दिल में समा गई। और एक बार फिर, अँधेरा छा गया… मगर इस बार — ज़ैद शर्म के मारे पसीना-पसीना हो रहा था, उस पर अफ़सोस तारी था, लेकिन अब उसे समझ आ चुका था कि मैं रब को देखने की कैसी बचकाना सी ख़ाहिशें अपने दिल में रखता था। ख़ुदा तो हमारे क़रीब ही मिल सकता है, अगर किसी भूखे को खाना खिला दिया जाए तो रब से मुलाक़ात हो जाए। किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत पूरी कर दी गई तो मानो तुम्हारी तुम्हारे रब से मुलाक़ात हो गई। अब ज़ैद की ज़िन्दगी एक मुकम्मल ज़िन्दगी थी, वह इबादात में भी अपने रब से मुलाक़ात करता और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतों को पूरा करके भी। अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करके भी रब को राज़ी रखने की कोशिश करता और समाज को बेहतर बनाने में अपना रोल अदा करके भी ख़ुदा को ख़ुश करने की कामयाब कोशिश करता।
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*मस्जिद से बाज़ार तक — पार्ट-2 : बाज़ार से रब तक* ज़ैद की ज़िन्दगी अब एक नई राह पर थी। अब वो पहले जैसा नहीं रहा था। वो जान चुका था कि अल्लाह को सिर्फ़ सज्दों की ज़रूरत नहीं है, वह देखना चाहता है कि उसके बन्दे इस दुनिया में रहते हुए अपनी ज़िम्मेदारियों को किस तरह निभाते हैं! — उसे मालूम हो गया था कि ज़मीन पर इंसान का अपने रब के हुक्म के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारना ही असल इबादत है। अब ज़ैद का कारोबार भी चल पड़ा था। दुकान पर ग्राहकों की भीड़ रहने लगी थी। उसकी मेहनत और ईमानदारी ने मोहल्ले में उसे एक भरोसेमंद ताजिर बना दिया था। अब बीवी भी ख़ुश थी और बच्चे भी, घर का ख़र्च भी अच्छे से चल रहा था और बच्चों की बेहतरीन तालीम भी हो रही थी। फ़र्ज़ इबादात तो वह करता ही करता, इसके साथ-साथ उसे जब भी वक़्त मिलता, नफ़्ल इबादत में भी डूब जाता। लेकिन फ़र्क़ ये था कि अब ये इबादत उसे उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल नहीं कर पाती थी। मगर एक तड़प अब भी थी जो दिल के किसी कोने में बाक़ी थी — वो ख़्वाब, वो रौशनी, वो सुकून… जिसे उसने बस एक लम्हे के लिए महसूस किया था, उसकी रूह उसी ख़्वाब में कहीं अटकी रह गई थी। अब उसकी दुआओं में एक नई तड़प थी: “ऐ मेरे रब! उस रात तूने मुझे पुकारा, मुझे समझाया, मुझे रास्ता दिखाया… अब बस एक आरज़ू है — तेरे दीदार की आरज़ू। ऐ रब! तेरी रौशनी तो देखी, क्या तेरा दीदार भी हो सकता है?” वह बार-बार सजदे में यही दुआ माँगता। फिर एक रात — जब उसका जिस्म थका हुआ मगर दिल जागा हुआ था, उसने वही दुआ की और दुआ करते करते उसकी आँखें बंद हो गईं — और एक बार फिर ख़्वाब आया। ज़ैद एक मैदान में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था और सन्नाटा पसरा हुआ था। कानों में सन्नाटे की सीटी गूँज रही थी। वह उस ख़ामोशी की आवाज़ को महसूस कर रहा था। फिर सामने से हल्की सी रौशनी उसकी तरफ़ चलती हुई नज़र आई। और धीरे-धीरे क़रीब होती चली गई। वह पहचान गया कि ये वही रौशनी है जो उसे पहले मिली थी। इस बार वो रौशनी उसके इर्द-गिर्द चल रही थी। ज़ैद की आँखों में चमक आ गई। दिल ही दिल में कहा: “आज शायद मेरे रब से मेरी मुलाक़ात होगी!” इससे पहले कि वो कुछ कहता, एक आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! तू मुझे देखने की ताक़त नहीं रखता। तुझे वो आँखें दी ही नहीं गईं जो मुझे देख सकें। लेकिन अगर तू मुझ से मिलना चाहता है — तो मिल सकता है। मैं तो तेरे क़रीब ही रहता हूँ। बल्कि मैं तो बहुत बार तेरे पास आया मगर तू मुझसे मिला ही नहीं।” ज़ैद ने काँपते हुए कहा: “मेरे रब! ये कैसे हो सकता है! मैं तो बहुत दिनों से ये तमन्ना लिए घूम रहा हूँ। ये कैसे और कब हुआ कि तू आया और मैं नहीं मिला।” आवाज़ आई : “ऐ इब्ने-आदम! मैं बीमार था, तूने मेरी आयादत नहीं की!” ज़ैद हैरान: “ऐ रब! तू बीमार कैसे हो सकता है, तू तो सबका शिफ़ा देने वाला है!” आवाज़ आई: “क्या तुझे याद नहीं, तेरे मोहल्ले का वो बूढ़ा जो कई दिनों से बुख़ार में मुबतला था, अगर तू उसकी आयादत करता, तो तू मुझे उसके पास पाता।” ज़ैद की रूह काँप गई, उसकी साँसें जैसे थम सी गईं, जैसे किसी ने उसके सीने में शर्म का सैलाब भर दिया हो। फिर आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! मैंने तुझसे खाना माँगा, तूने मुझे खिलाया नहीं!” ज़ैद ने फिर हैरान होकर कहा: “मेरे अल्लाह! तुझे भूख कैसी? तू तो सबको रिज़्क़ देने वाला है!” आवाज़ आई : “क्या तुझे वो औरत याद नहीं जो तेरे ही दोस्त की बेवा है। वह अक्सर अपने बच्चे के साथ भूखी रहती है, अगर तू उसको खाना खिला देता, तो वो खाना मेरे पास आ जाता।” ज़ैद की आँखें फट गईं। मन ही मन अपने आप पर कुढ़ने लगा, ‘क्या हासिल है इस इबादत का और इस पैसे को कमाने का कि जब मुझे अपने ही क़रीबी लोगों का ख़याल नहीं आता।’ आवाज़ आई : “ऐ इब्ने आदम मैं इल्म हासिल नहीं कर पाया, मैं तेरे पास आया लेकिन तूने इल्म हासिल करने में कोई मदद नहीं की।” ज़ैद ने हैरत से कहा : “ऐ मेरे रब तू तो ग़ैब और मौजूद का इल्म रखनेवाला है, तू तो इल्म का सरचश्मा है तुझे भला इल्म की क्या ज़रूरत है?” आवाज़ आई : “क्या तुझे वो बच्चा याद नहीं जो तेरी रिश्तेदारी का ही है, पैसे न होने की वजह से इल्म हासिल नहीं कर सका और तेरी दुकान पर मज़दूरी करने पर मजबूर हो गया है, अगर तू उसकी तालीम व तरबियत का इन्तिज़ाम कर देता तो तू मुझे उसके पास पाता।” ज़ैद सकते में था, मानो वह शर्म के मारे ज़मीन में गढ़ा जा रहा था। उसकी आँखें नम हो गईं, दिल बैठ गया। ज़ैद की हालत ये थी जैसे कलेजा मुँह को आ रहा हो और ज़बान पर ताला लग गया हो। दिल तकलीफ़ से भर गया, हलक़ सूख गया था। ज़ैद अब काँप रहा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, दिल पछतावे से भरा था। वह सिसक रहा था। उतने ही में वह रौशनी फिर से उसके दिल में समा गई। और एक बार फिर, अँधेरा छा गया… मगर इस बार — ज़ैद शर्म के मारे पसीना-पसीना हो रहा था, उस पर अफ़सोस तारी था, लेकिन अब उसे समझ आ चुका था कि मैं रब को देखने की कैसी बचकाना सी ख़ाहिशें अपने दिल में रखता था। ख़ुदा तो हमारे क़रीब ही मिल सकता है, अगर किसी भूखे को खाना खिला दिया जाए तो रब से मुलाक़ात हो जाए। किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत पूरी कर दी गई तो मानो तुम्हारी तुम्हारे रब से मुलाक़ात हो गई। अब ज़ैद की ज़िन्दगी एक मुकम्मल ज़िन्दगी थी, वह इबादात में भी अपने रब से मुलाक़ात करता और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतों को पूरा करके भी। अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करके भी रब को राज़ी रखने की कोशिश करता और समाज को बेहतर बनाने में अपना रोल अदा करके भी ख़ुदा को ख़ुश करने की कामयाब कोशिश करता।

*मस्जिद से बाज़ार तक — पार्ट-2 : बाज़ार से रब तक*

ज़ैद की ज़िन्दगी अब एक नई राह पर थी। अब वो पहले जैसा नहीं रहा था। वो जान चुका था कि अल्लाह को सिर्फ़ सज्दों की ज़रूरत नहीं है, वह देखना चाहता है कि उसके बन्दे इस दुनिया में रहते हुए अपनी ज़िम्मेदारियों को किस तरह निभाते हैं! — उसे मालूम हो गया था कि ज़मीन पर इंसान का अपने रब के हुक्म के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारना ही असल इबादत है।

अब ज़ैद का कारोबार भी चल पड़ा था। दुकान पर ग्राहकों की भीड़ रहने लगी थी। उसकी मेहनत और ईमानदारी ने मोहल्ले में उसे एक भरोसेमंद ताजिर बना दिया था। अब बीवी भी ख़ुश थी और बच्चे भी, घर का ख़र्च भी अच्छे से चल रहा था और बच्चों की बेहतरीन तालीम भी हो रही थी।

फ़र्ज़ इबादात तो वह करता ही करता, इसके साथ-साथ उसे जब भी वक़्त मिलता, नफ़्ल इबादत में भी डूब जाता। लेकिन फ़र्क़ ये था कि अब ये इबादत उसे उसकी ज़िम्मेदारियों से ग़ाफ़िल नहीं कर पाती थी।

मगर एक तड़प अब भी थी जो दिल के किसी कोने में बाक़ी थी — वो ख़्वाब, वो रौशनी, वो सुकून… जिसे उसने बस एक लम्हे के लिए महसूस किया था, उसकी रूह उसी ख़्वाब में कहीं अटकी रह गई थी।

अब उसकी दुआओं में एक नई तड़प थी: “ऐ मेरे रब! उस रात तूने मुझे पुकारा, मुझे समझाया, मुझे रास्ता दिखाया… अब बस एक आरज़ू है — तेरे दीदार की आरज़ू। ऐ रब! तेरी रौशनी तो देखी, क्या तेरा दीदार भी हो सकता है?”
वह बार-बार सजदे में यही दुआ माँगता।

फिर एक रात — जब उसका जिस्म थका हुआ मगर दिल जागा हुआ था, उसने वही दुआ की और दुआ करते करते उसकी आँखें बंद हो गईं — और एक बार फिर ख़्वाब आया।

ज़ैद एक मैदान में खड़ा था। चारों तरफ़ घुप अँधेरा था और सन्नाटा पसरा हुआ था। कानों में सन्नाटे की सीटी गूँज रही थी। वह उस ख़ामोशी की आवाज़ को महसूस कर रहा था। फिर सामने से हल्की सी रौशनी उसकी तरफ़ चलती हुई नज़र आई। और धीरे-धीरे क़रीब होती चली गई।
वह पहचान गया कि ये वही रौशनी है जो उसे पहले मिली थी। इस बार वो रौशनी उसके इर्द-गिर्द चल रही थी।
ज़ैद की आँखों में चमक आ गई।
दिल ही दिल में कहा: “आज शायद मेरे रब से मेरी मुलाक़ात होगी!”

इससे पहले कि वो कुछ कहता, एक आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! तू मुझे देखने की ताक़त नहीं रखता। तुझे वो आँखें दी ही नहीं गईं जो मुझे देख सकें। लेकिन अगर तू मुझ से मिलना चाहता है — तो मिल सकता है। मैं तो तेरे क़रीब ही रहता हूँ। बल्कि मैं तो बहुत बार तेरे पास आया मगर तू मुझसे मिला ही नहीं।”

ज़ैद ने काँपते हुए कहा: “मेरे रब! ये कैसे हो सकता है! मैं तो बहुत दिनों से ये तमन्ना लिए घूम रहा हूँ। ये कैसे और कब हुआ कि तू आया और मैं नहीं मिला।”

आवाज़ आई : “ऐ इब्ने-आदम! मैं बीमार था, तूने मेरी आयादत नहीं की!”

ज़ैद हैरान: “ऐ रब! तू बीमार कैसे हो सकता है, तू तो सबका शिफ़ा देने वाला है!”

आवाज़ आई: “क्या तुझे याद नहीं, तेरे मोहल्ले का वो बूढ़ा जो कई दिनों से बुख़ार में मुबतला था, अगर तू उसकी आयादत करता, तो तू मुझे उसके पास पाता।”

ज़ैद की रूह काँप गई, उसकी साँसें जैसे थम सी गईं, जैसे किसी ने उसके सीने में शर्म का सैलाब भर दिया हो।

फिर आवाज़ आई: “ऐ इब्ने-आदम! मैंने तुझसे खाना माँगा, तूने मुझे खिलाया नहीं!”

ज़ैद ने फिर हैरान होकर कहा: “मेरे अल्लाह! तुझे भूख कैसी? तू तो सबको रिज़्क़ देने वाला है!”

आवाज़ आई : “क्या तुझे वो औरत याद नहीं जो तेरे ही दोस्त की बेवा है। वह अक्सर अपने बच्चे के साथ भूखी रहती है, अगर तू उसको खाना खिला देता, तो वो खाना मेरे पास आ जाता।”

ज़ैद की आँखें फट गईं। मन ही मन अपने आप पर कुढ़ने लगा, ‘क्या हासिल है इस इबादत का और इस पैसे को कमाने का कि जब मुझे अपने ही क़रीबी लोगों का ख़याल नहीं आता।’

आवाज़ आई : “ऐ इब्ने आदम मैं इल्म हासिल नहीं कर पाया, मैं तेरे पास आया लेकिन तूने इल्म हासिल करने में कोई मदद नहीं की।”

ज़ैद ने हैरत से कहा : “ऐ मेरे रब तू तो ग़ैब और मौजूद का इल्म रखनेवाला है, तू तो इल्म का सरचश्मा है तुझे भला इल्म की क्या ज़रूरत है?”

आवाज़ आई : “क्या तुझे वो बच्चा याद नहीं जो तेरी रिश्तेदारी का ही है, पैसे न होने की वजह से इल्म हासिल नहीं कर सका और तेरी दुकान पर मज़दूरी करने पर मजबूर हो गया है, अगर तू उसकी तालीम व तरबियत का इन्तिज़ाम कर देता तो तू मुझे उसके पास पाता।”

ज़ैद सकते में था, मानो वह शर्म के मारे ज़मीन में गढ़ा जा रहा था। उसकी आँखें नम हो गईं, दिल बैठ गया।

ज़ैद की हालत ये थी जैसे कलेजा मुँह को आ रहा हो और ज़बान पर ताला लग गया हो। दिल तकलीफ़ से भर गया, हलक़ सूख गया था।
ज़ैद अब काँप रहा था। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, दिल पछतावे से भरा था। वह सिसक रहा था। उतने ही में वह रौशनी फिर से उसके दिल में समा गई।
और एक बार फिर, अँधेरा छा गया…

मगर इस बार — ज़ैद शर्म के मारे पसीना-पसीना हो रहा था, उस पर अफ़सोस तारी था, लेकिन अब उसे समझ आ चुका था कि मैं रब को देखने की कैसी बचकाना सी ख़ाहिशें अपने दिल में रखता था।
ख़ुदा तो हमारे क़रीब ही मिल सकता है, अगर किसी भूखे को खाना खिला दिया जाए तो रब से मुलाक़ात हो जाए।
किसी ज़रूरतमंद की ज़रूरत पूरी कर दी गई तो मानो तुम्हारी तुम्हारे रब से मुलाक़ात हो गई।

अब ज़ैद की ज़िन्दगी एक मुकम्मल ज़िन्दगी थी, वह इबादात में भी अपने रब से मुलाक़ात करता और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतों को पूरा करके भी।
अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करके भी रब को राज़ी रखने की कोशिश करता और समाज को बेहतर बनाने में अपना रोल अदा करके भी ख़ुदा को ख़ुश करने की कामयाब कोशिश करता।

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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।

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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।

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