*माहौलियाती बोहरान और इस्लाम*
अल्लाह तआला ने इस पूरी कायनात को हिकमत और ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया है। ये कायनात एक बाग़ की तरह है और अल्लाह इस बाग़ का माली है। इस बाग़ में हर चीज़ तरतीब, सलीक़े और एतिदाल (संतुलन) के साथ रखी गई है। आप क़ुरआन पर नज़र डालें तो साफ़ तौर पर अल्लाह फ़रमाता है:
“उस (अल्लाह) ने जो कुछ भी पैदा किया, बहुत ही ख़ूबसूरती के साथ पैदा किया” (सूरह अस-सजदा: 7)। एक और जगह फ़रमाया :
“फिर बार-बार निगाह दौड़ाओ, क्या तुम्हें कोई दरार नज़र आती है? निगाह थककर नामुराद लौट आएगी।” (सूरह अल-मुल्क: 3–4)।
यानी अल्लाह के इस बाग़ में कोई झोल नहीं, कोई कमी नहीं, सब कुछ नज़ाकत और पूरे एहतिमाम के साथ बनाया गया है।
इस कायनात का एक छोटा-सा हिस्सा ये दुनिया है, जिसे इंसान के रहने और इम्तिहान के लिये बनाया गया है। अल्लाह ने इंसान को इस दुनिया में अपना ख़लीफ़ा मुक़र्रर किया है।
“मैं ज़मीन में एक ख़लीफ़ा बनाने वाला हूँ” (सूरह अल-बक़रा: 30)।
इंसान को अक़्ल, सूझ-बूझ और तमीज़ दी गई ताकि वो इस बाग़ की हिफ़ाज़त करे, इसकी ख़ूबसूरती को बरक़रार रखे, और इसकी हर नेमत का सही इस्तेमाल करे। मगर इसी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करके इंसान इस बाग़ में बिगाड़ भी पैदा कर सकता है।
अगर इंसान अक़्ल और शुऊर का सही इस्तेमाल करे तो इससे दो फ़ायदे होते हैं —
पहला ये कि ये दुनिया एक ख़ूबसूरत, सलीक़ेदार और रहने लायक जगह बनी रहती है जिससे इंसानों को राहत, अमन और सुकून हासिल होता है।
दूसरा ये कि इस बाग़ का माली यानी अल्लाह उससे ख़ुश होता है, और उसकी इस ज़िम्मेदारी और समझदारी के इनाम के तौर पर उसे उससे भी बेहतर एक और दुनिया (बाग़) अता करेगा जहाँ वो हमेशा रहेगा।
लेकिन अगर इंसान अपनी अक़्ल का ग़लत इस्तेमाल करे और इस बाग़ में फ़साद फैलाए, इसे गंदा करे, नेमतों की नाक़द्री करे और ताबाही मचाए, तो इसके भी दो नुक़सान होंगे —
एक ये कि ख़ुद उसे भी और उस जैसे दूसरे लोगों को भी इस दुनिया में रहने और बसने में परेशानियाँ और मुश्किलात पेश आएँगी, और
दूसरा ये कि इस बाग़ का माली, अल्लाह तआला, उस इंसान से नाराज़ होगा और उसे उस बाग़ का हिस्सा नहीं बनाएगा जो उसने नेक बन्दों के लिए तैयार किया है। बल्कि चूँकि उस इंसान ने बग़ावत का रवैया इख़्तियार करके इस बाग़ की नाक़द्री की, इसलिए उसे भी नाक़द्र बना दिया जाएगा और कबाड़ख़ाने (जहन्नम) में औंधे मुँह फेंक दिया जाएगा।
इसीलिए क़ुरआन इंसान को बार-बार इस बाग़ (ज़मीन में) फ़साद से रोकता है और इस्लाह की हिदायत करता है।
“ज़मीन की इस्लाह के बाद उसमें फ़साद मत फैलाओ” (सूरह अल-आराफ़: 56)।
एक और जगह फ़रमाया :
“ख़ुश्की (ज़मीन) में और पानी (समंदर) में फ़साद फैला उन कामों की वजह से जो लोगों के हाथों ने किए…” (सूरह रोम: 41)।
यानी जब माहौलियाती आलूदगी (Environmental Crises) पैदा करे यानी पेड़ काटे, पानी गंदा करे, हवा में ज़हर घोले, ज़मीन को बंजर बनाए और जानवरों की नस्लें ख़त्म करे तो इससे ज़मीन में फ़साद बरपा होता है — और यह सीधे तौर पर अल्लाह की बनाई हुई दुनिया से बग़ावत है।
इसलिए नबी करीम ﷺ ने हमें बार-बार तालीम दी कि इस कायनात को सँवारो, इसे संजोकर रखो। आप (सल्ल०) ने फरमाया:
“अगर क़यामत क़रीब हो और तुम्हारे हाथ में पौधा हो, और तुम उसे लगा सकते हो तो उसे ज़रूर लगा दो।” (मुसनद अहमद: 12933)
आपने ये भी फरमाया: “कोई मुसलमान ऐसा दरख़्त लगाता है जिससे इंसान, परिन्दा या जानवर फायदा उठाएँ तो वह उसके लिए सदक़ा होता है” (बुख़ारी: 6012)।
एक हदीस में है कि हज़रत सलमान फ़ारसी ने अपने मालिक से अपनी ग़ुलामी की रिहाई के लिये 300 खजूर के पौधे लगाना तय कर लिया तो रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने वे तमाम पौधे अपने हाथों से लगाए। (देखें हदीस मुसनद अहमद : 24138)
एक और हदीस में रसूलुल्लाह (सल्ल) ने पेड़ लगाने को सदक़ए-जारिया क़रार दिया और फ़रमाया पेड़ लगानेवाले को उस वक़्त तक अजर मिलता रहेगा जब तक लोग उससे फ़ायदा उठाते रहेंगे। (हदीस मजमउल-ज़वाइद : 4739)
एक और हदीस में है कि जब कोई बन्दा कोई पेड़ लगाता है तो उसे उतना ही अज्र मिलता है जितना उसमें फल निकलता है। (मजमउल-ज़वाइद : 6266)
ख़ुद क़ुरआन में अल्लाह ने और हदीसों में रसूलुल्लाह (सल्ल०) ने फ़ुज़ूल-ख़र्ची से दूर रहने की तलक़ीन की ताकि अल्लाह की नेमतों का सही इस्तेमाल हो सके। चुनांचे वुज़ू करते वक़्त भी आपने पानी फ़ुज़ूल बहाने से मना किया, चाहे आदमी दरिया के किनारे ही क्यों न हो (इब्ने माजा: 425)। क़ुरआन ने भी साफ़ तौर पर फ़रमाया: “बेशक फ़ुज़ूलख़र्च लोग शैतान के भाई हैं” (सूरह बनी इस्राईल: 27)। यानी जब इंसान पानी, खाना, हवा, लकड़ी, ऊर्जा जैसी क़ुदरती नेमतों में फ़ुज़ूल-ख़र्ची करता या बरबाद करता है तो वो शैतानी अमल करता है, और यही माहौलियाती बोहरान की जड़ है।
साफ-सफ़ाई को आधा ईमान क़रार दिया (सहीह मुस्लिम: 223) ताकि खाने और पीने की चीज़ों को साफ़ सुथरा रखा जा सके जिससे माहौलियाती आलूदगी से पूरी तरह बचा जा सके।
हरियाली को क़ायम रखने, पेड़ लगाने और ज़मीन को महकाने की ताकीद की और इसे इबादत का हिस्सा क़रार दिया। ऊपर की एक हदीस से ये बात वाज़ेह हो गई कि अगर कोई शख़्स पेड़ लगाए और उससे कोई परिन्दा खाए तो ये भी एक सदक़ा है।
इसलिये हमारी ये ज़िम्मेदारी है कि इस बाग़ को बर्बाद करने की बजाय इसे सँवारेँ। इसमें पेड़ लगाएँ, पानी साफ़ रखें, ज़मीन को महकाएँ, जानवरों का हक़ अदा करें और खाने-पीने व दूसरी नेमतों को बरबाद न करें। यही अल्लाह की रज़ा का रास्ता है, और यही हमारी दुनिया और आख़िरत दोनों की ख़ूबसूरती का राज़ है।
तो आइये हम सब मिलकर माहौलियाती आलूदगी को दूर करें, अल्लाह के इस चमन को पेड़ों से महकाएँ ताकि ये दुनिया भी ख़ूबसूरत बनी रहे और हमारा रब भी हमसे राज़ी हो जाए ताकि इस बाग़ (दुनिया) से बेहतर बाग़ (जन्नत) के हम हक़दार क़रार पाएँ।