पूरी कायनात में शान्ति और अम्न क़ायम है। कारण यह है कि हर चीज़ अपनी ड्यूटी को ज़िम्मेदारी के साथ अंजाम दे रही है और हर चीज़ किसी दूसरे से कुछ लेने की अपेक्षा रखने के बजाए कुछ दे रही है।
मानव समाज में भी अम्न और शान्ति की स्थापना हर इंसान की फ़ितरी ज़रूरत है। इसके लिए भी ज़रूरी है कि हम में से हर व्यक्ति अपनी ड्यूटी को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ अदा करे और किसी से कुछ लेने की अपेक्षा रखने के मुक़ाबले कुछ देने की अभिलाषा रखे।
So, let us play our role in the establishment of peace in society.
जब तक किसी समाज में अम्न और शान्ति क़ायम न हो तब तक किसी विकसित समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
और किसी भी समाज में अम्न उस वक़्त तक क़ायम नहीं हो सकता जब तक वहाँ इन्साफ़ क़ायम न हो।
So, establish peace to save humanity.
किसी समाज से यदि न्याय और आपसी भाईचारे का दिवाला निकल जाए, लोगों को अपने दायित्व तो याद न रहें अपितु केवल अपने अधिकारों को प्राप्त करने की चेष्टा में लगे रहें। फ़ैशन के नाम पर अश्लीलता को बढ़ावा दिया जाने लगे, तो उस समाज में भौतिक विकास चाहे कितना ही हो जाए किन्तु शान्ति की स्थापना कदापि नहीं हो सकती। ऐसे समाज में ग़रीबी, असुरक्षा, असमानता, अत्याचार और अराजकता का ही बोल-बाला होगा।
इस्लाम चूँकि समाज में पूर्ण शान्ति की स्थापना का अभिलाषी है इसलिए
न्याय और एहसान करने तथा रिश्तों को जोड़ने का आदेश देता है और बुराई, अश्लीलता और ज़ुल्म व ज़्यादती से मना करता है(क़ुरआन 16:90)। इस्लाम अपने मानने वालों का यह दायित्व ठहराता है कि लोगों को भलाइयों का आदेश दें और बुराइयों से रोकें, (3:110) ताकि समाज में पूर्ण शान्ति की स्थापना का सपना साकार हो सके।