जो देता है, वही जीता है
एक समय की बात है, एक हरे-भरे जंगल में एक बड़ा और ख़ूबसूरत सा आम का पेड़ था, जिसका नाम “असख़िया” था। उसकी घनी शाख़ाएँ बादलों को छूती मालूम होती थीं, और उसकी चौड़ी, सायादार टहनियाँ मानो किसी को भी अपनी आग़ोश में लेने के लिए तैयार रहती थीं। असख़िया अपने मीठे और रसीले फलों के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। जब हवा चलती, तो उसकी पत्तियाँ सरसराती हुई ऐसे लगतीं जैसे कोई मधुर गीत गा रही हों।
असख़िया की शाख़ाओं पर बुलबुल अपना घोंसला बनाकर अपने नन्हे बच्चों को चहचहाना सिखाती, तो कोयल अपनी सुरीली आवाज़ में गीत गाकर पूरे जंगल को मंत्रमुग्ध कर देती। उसकी टहनियों पर नन्ही चिड़ियाँ झूला झूलतीं, गिलहरियाँ उछल-कूद करतीं, और मोर अपनी रंगीन पूँछ फैलाकर नाचते। उसकी जड़ों के पास हिरन और ख़रगोश आराम करते, तो बन्दर उसकी डालियों पर उधम मचाते। गर्मी के मौसम में मुसाफ़िर उसकी घनी छाँव में बैठकर राहत पाते, और बच्चे उसके नीचे बैठकर कहानियाँ सुनते।
सुबह की पहली किरण के साथ ही ओस की बूँदें उसकी पत्तियों पर मोतियों की तरह चमक उठतीं, और जैसे ही सूरज ऊपर चढ़ता, उसकी छाँव में ठंडी हवा बहने लगती, जिससे हर कोई राहत महसूस करता। उसकी डालियों से टपकने वाली मीठी आमरस की बूँदों पर तितलियाँ मँडरातीं, और कभी-कभी एक नटखट तोता आकर उसका मीठा आम चोंच में दबाकर उड़ जाता।
असख़िया के पास जो भी आता, वह उसे अपनी छाँव, अपने फल और अपनी ठंडी हवा का तोहफ़ा दिए बिना जाने न देता। वह दूसरों की मदद करके बेहद ख़ुश रहता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी का यही मक़सद था—सबको ख़ुशी और सुकून देना। असख़िया को इस बात पर बहुत इत्मीनान होता था कि वह दूसरों की ज़रूरतें पूरी कर पा रहा है।
एक दिन, जंगल में कपट नाम का एक कौआ आया। कपट ने असख़िया को देखा और सोचा, “यह पेड़ जितना बड़ा और फलदार है उससे कहीं ज़्यादा फ़ैयाज़ और सख़ी है। अगर मैं इसे अपने जाल में फँसा लूँ, तो इसका सारा फल मैं अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता हूँ।”
कपट ने मुस्कुराते हुए असख़िया से कहा, “असख़िया, यार तुम बहुत फ़ैयाज़ और दानी हो, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह जंगल तुम्हारी फ़ैयाज़ी और सख़ावत का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा है? बहुत जल्द तुम्हारे फल ख़त्म हो जाएँगे, और तुम्हें कोई याद भी नहीं करेगा। तुमसे से पहले भी यहाँ एक ‘जव्वाद’ नाम का बहुत ही सख़ी (उदार) पेड़ हुआ करता था। वह भी तुम्हारी तरह अपने फल सबको लुटाता रहता था, मगर जब वह बूढ़ा हो गया तो एक दिन बेरहम इन्सानों ने उसे काट दिया। अगर तुम समझदार हो, तो अपने फल सिर्फ़ उन्हीं को दो जो इसके लायक़ हैं। जो तुम्हारा एहसान मानें, तुम्हारी तारीफ़ें करें। बाक़ी सबको मना कर दो।”
यह कहकर कपट ने असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिये। असख़िया को अपनी तारीफ़ें सुनकर शुरू में तो थोड़ी झिझक सी महसूस हुई, लेकिन धीरे-धीरे उसे मज़ा आने लगा। अब तो असख़िया कपट का हो गया और उसने जानवरों और परिन्दों को फल देना बन्द कर दिये। वह सिर्फ़ उन्हीं को फल देता जो उसकी तारीफ़ें किया करते थे।
एक दिन हिरन का एक होनहार सा बच्चा असख़िया के पास आया। उसका नाम चंचल था। उसने देखा कि असख़िया के पास चापलूस क़िस्म के परिन्दे बैठे असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँध रहे हैं, और असख़िया बदले में उन्हें एक-एक फल दे देता है।
चंचल यह देखकर थोड़ा ठिठका, लेकिन वह असख़िया के पास जाकर बोला, “असख़िया अंकल मेरी दादी बीमार हैं अम्मा ने उनके लिये एक फल मँगाया है। आप मुझे उनके वास्ते एक मीठा सा आम दे दीजिये।”
“तुम्हें क्या लगता है यहाँ पर आम फ़्री बँटते हैं, चलो जाओ यहाँ से, यहाँ कोई आम-वाम नहीं मिल रहे हैं।” असख़िया ने तड़ककर जवाब दिया।
चंचल इस जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था, वह हैरान हो कर बोला, “अंकल आप तो बिलकुल बदल गए हैं, आप तो पहले ऐसे नहीं थे। आप तो बड़े फ़ैयाज़ और दाता थे।”
असख़िया ने कहा, “हाँ, अब मुझे समझ में आ गया है, मैं अपने फल यूँ ही बेकार में बाँट दिया करता था, मेरे फल बेकार थोड़े हैं कि यूँ ही बाँट दूँ। मेरी मेहनत और क़ाबिलियत इनमें लगी है।”
चंचल ने बहुत नरमी और मासूमियत के साथ बोला, “क्या कहा अंकल! क्या ये आम सिर्फ़ आपकी मेहनत और क़ाबिलियत का फल हैं?”
असख़िया ने अकड़कर जवाब दिया, “हाँ, हाँ! बिल्कुल, ये सब आम मेरी क़ाबिलियत का ही तो फल हैं।”
चंचल मुस्कुराया और बोला, “नहीं असख़िया अंकल, ये आपकी बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। ज़रा सोचिए, अगर सूरज अपनी रोशनी और गर्मी न देता, तो क्या आपकी शाख़ों पर फल लग पाते? सूरज की रोशनी से ही तो आपके पत्तों में फ़ोटोसिंथेसिस होता है, जिससे आपको खाना मिलता है। अगर ये प्रोसेस ही रुक जाए, तो आपकी शाख़ें सूखने लगेंगी और आपकी ज़िन्दगी मुश्किल हो जाएगी।”
असख़िया थोड़ा झेंप सा गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
चंचल ने आगे कहा, “अंकल ज़रा सोचिये अगर चाँद और सितारे रात को अपनी ठंडक न देते, तो ज़मीन की नमी कैसे बनी रहती? पौधों को सिर्फ़ धूप ही नहीं, बल्कि ठंडक और रात की नमी भी चाहिए ताकि गर्मी और ठण्डक का बैलेंस बना रहे। और अगर बारिश न होती, तो आपकी जड़ें कैसे पानी पीतीं? आपको पता है कि ज़मीन से पानी चूसकर ऊपर तक पहुँचाने के लिए आपकी जड़ों में कैपिलरी एक्शन और ट्रांसपिरेशन पुल काम करता है? अगर ये प्रोसेस न होता तो आप कभी भी फल नहीं दे पाते।”
अब असख़िया गहरी सोच में पड़ गया।
“आपको मालूम है ज़मीन ने आपको मज़बूती दी, आपकी जड़ों को सहारा दिया, और आपको Nutrients (पोषक तत्व) दिए। मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस, और पोटैशियम जैसे मिनरल्स आपको बढ़ने में मदद करते हैं। हवा ने आपकी पत्तियों को ताज़गी दी, ताकि आपकी शाख़ों स्टोमाटा (छिद्र) से गैसें आ-जा सकें। मधुमक्खियों और तितलियों ने आपके फूलों में पॉलिनेशन किया, जिससे आपके फल बन सके। अगर ये सब न होते, तो क्या आप अकेले ही इतने मीठे और रसीले आम दे पाते?”
असख़िया को जैसे किसी ने अथाह गहराइयों में गिरने से थाम लिया हो। उसने अपनी शाख़ों को देखा, फिर आसमान की तरफ़ और फिर ज़मीन की तरफ़। पहली बार उसे अहसास हुआ कि सच में, ये सब कुछ अकेले उसकी मेहनत का नतीजा नहीं था। उसे सूरज, चाँद, ज़मीन, बारिश, हवा और न जाने कितनी और चीज़ों का सहारा मिला था। वह गहरी सोच में पड़ गया कि आख़िर उसे किस बात का ग़ुरूर हो गया था।
चंचल मुस्कुराया और बोला, “देखा असख़िया अंकल, असल ख़ुशी देने में है, न कि एहसान जताने में। जिस तरह ये सारी चीज़ें आपको बिना किसी शर्त के देती हैं, वैसे ही आपको भी देना चाहिए।”
“और हाँ अंकल! हमने आप जैसे ही बुज़ुर्गों से सुना है कि देता वही है जो ज़िन्दा होता है, जो मर जाता है वो देना भी भूल जाता है। और जो इसलिये देता है कि लोग उसकी तारीफ़ें करें तो इस पूरे जंगल का मालिक उसे औंधें मुँह भड़कती आग में झुलसा देगा।”
असख़िया की आँखें नम हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने उसे ज़िन्दगी लौटा दी हो। उसने धीरे से अपनी शाख़ झुकाई और बहुत प्यार से सबसे मीठा आम चंचल को पेश कर दिया। उसने उसी वक़्त फ़ैसला किया कि वह फिर से पहले की तरह खुले दिल से अपने फलों को बाँटेगा।
उस दिन के बाद, असख़िया फिर से पहले की तरह दरियादिल हो गया। उसके आम खाने वाले परिन्दे और जानवर लौट आए, और जंगल फिर से ख़ुशहाल हो गया।
jo deta hai wahi jeeta hai
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जो देता है, वही जीता है
एक समय की बात है, एक हरे-भरे जंगल में एक बड़ा और ख़ूबसूरत सा आम का पेड़ था, जिसका नाम “असख़िया” था। उसकी घनी शाख़ाएँ बादलों को छूती मालूम होती थीं, और उसकी चौड़ी, सायादार टहनियाँ मानो किसी को भी अपनी आग़ोश में लेने के लिए तैयार रहती थीं। असख़िया अपने मीठे और रसीले फलों के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। जब हवा चलती, तो उसकी पत्तियाँ सरसराती हुई ऐसे लगतीं जैसे कोई मधुर गीत गा रही हों।
असख़िया की शाख़ाओं पर बुलबुल अपना घोंसला बनाकर अपने नन्हे बच्चों को चहचहाना सिखाती, तो कोयल अपनी सुरीली आवाज़ में गीत गाकर पूरे जंगल को मंत्रमुग्ध कर देती। उसकी टहनियों पर नन्ही चिड़ियाँ झूला झूलतीं, गिलहरियाँ उछल-कूद करतीं, और मोर अपनी रंगीन पूँछ फैलाकर नाचते। उसकी जड़ों के पास हिरन और ख़रगोश आराम करते, तो बन्दर उसकी डालियों पर उधम मचाते। गर्मी के मौसम में मुसाफ़िर उसकी घनी छाँव में बैठकर राहत पाते, और बच्चे उसके नीचे बैठकर कहानियाँ सुनते।
सुबह की पहली किरण के साथ ही ओस की बूँदें उसकी पत्तियों पर मोतियों की तरह चमक उठतीं, और जैसे ही सूरज ऊपर चढ़ता, उसकी छाँव में ठंडी हवा बहने लगती, जिससे हर कोई राहत महसूस करता। उसकी डालियों से टपकने वाली मीठी आमरस की बूँदों पर तितलियाँ मँडरातीं, और कभी-कभी एक नटखट तोता आकर उसका मीठा आम चोंच में दबाकर उड़ जाता।
असख़िया के पास जो भी आता, वह उसे अपनी छाँव, अपने फल और अपनी ठंडी हवा का तोहफ़ा दिए बिना जाने न देता। वह दूसरों की मदद करके बेहद ख़ुश रहता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी का यही मक़सद था—सबको ख़ुशी और सुकून देना। असख़िया को इस बात पर बहुत इत्मीनान होता था कि वह दूसरों की ज़रूरतें पूरी कर पा रहा है।
एक दिन, जंगल में कपट नाम का एक कौआ आया। कपट ने असख़िया को देखा और सोचा, “यह पेड़ जितना बड़ा और फलदार है उससे कहीं ज़्यादा फ़ैयाज़ और सख़ी है। अगर मैं इसे अपने जाल में फँसा लूँ, तो इसका सारा फल मैं अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता हूँ।”
कपट ने मुस्कुराते हुए असख़िया से कहा, “असख़िया, यार तुम बहुत फ़ैयाज़ और दानी हो, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह जंगल तुम्हारी फ़ैयाज़ी और सख़ावत का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा है? बहुत जल्द तुम्हारे फल ख़त्म हो जाएँगे, और तुम्हें कोई याद भी नहीं करेगा। तुमसे से पहले भी यहाँ एक ‘जव्वाद’ नाम का बहुत ही सख़ी (उदार) पेड़ हुआ करता था। वह भी तुम्हारी तरह अपने फल सबको लुटाता रहता था, मगर जब वह बूढ़ा हो गया तो एक दिन बेरहम इन्सानों ने उसे काट दिया। अगर तुम समझदार हो, तो अपने फल सिर्फ़ उन्हीं को दो जो इसके लायक़ हैं। जो तुम्हारा एहसान मानें, तुम्हारी तारीफ़ें करें। बाक़ी सबको मना कर दो।”
यह कहकर कपट ने असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिये। असख़िया को अपनी तारीफ़ें सुनकर शुरू में तो थोड़ी झिझक सी महसूस हुई, लेकिन धीरे-धीरे उसे मज़ा आने लगा। अब तो असख़िया कपट का हो गया और उसने जानवरों और परिन्दों को फल देना बन्द कर दिये। वह सिर्फ़ उन्हीं को फल देता जो उसकी तारीफ़ें किया करते थे।
एक दिन हिरन का एक होनहार सा बच्चा असख़िया के पास आया। उसका नाम चंचल था। उसने देखा कि असख़िया के पास चापलूस क़िस्म के परिन्दे बैठे असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँध रहे हैं, और असख़िया बदले में उन्हें एक-एक फल दे देता है।
चंचल यह देखकर थोड़ा ठिठका, लेकिन वह असख़िया के पास जाकर बोला, “असख़िया अंकल मेरी दादी बीमार हैं अम्मा ने उनके लिये एक फल मँगाया है। आप मुझे उनके वास्ते एक मीठा सा आम दे दीजिये।”
“तुम्हें क्या लगता है यहाँ पर आम फ़्री बँटते हैं, चलो जाओ यहाँ से, यहाँ कोई आम-वाम नहीं मिल रहे हैं।” असख़िया ने तड़ककर जवाब दिया।
चंचल इस जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था, वह हैरान हो कर बोला, “अंकल आप तो बिलकुल बदल गए हैं, आप तो पहले ऐसे नहीं थे। आप तो बड़े फ़ैयाज़ और दाता थे।”
असख़िया ने कहा, “हाँ, अब मुझे समझ में आ गया है, मैं अपने फल यूँ ही बेकार में बाँट दिया करता था, मेरे फल बेकार थोड़े हैं कि यूँ ही बाँट दूँ। मेरी मेहनत और क़ाबिलियत इनमें लगी है।”
चंचल ने बहुत नरमी और मासूमियत के साथ बोला, “क्या कहा अंकल! क्या ये आम सिर्फ़ आपकी मेहनत और क़ाबिलियत का फल हैं?”
असख़िया ने अकड़कर जवाब दिया, “हाँ, हाँ! बिल्कुल, ये सब आम मेरी क़ाबिलियत का ही तो फल हैं।”
चंचल मुस्कुराया और बोला, “नहीं असख़िया अंकल, ये आपकी बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। ज़रा सोचिए, अगर सूरज अपनी रोशनी और गर्मी न देता, तो क्या आपकी शाख़ों पर फल लग पाते? सूरज की रोशनी से ही तो आपके पत्तों में फ़ोटोसिंथेसिस होता है, जिससे आपको खाना मिलता है। अगर ये प्रोसेस ही रुक जाए, तो आपकी शाख़ें सूखने लगेंगी और आपकी ज़िन्दगी मुश्किल हो जाएगी।”
असख़िया थोड़ा झेंप सा गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
चंचल ने आगे कहा, “अंकल ज़रा सोचिये अगर चाँद और सितारे रात को अपनी ठंडक न देते, तो ज़मीन की नमी कैसे बनी रहती? पौधों को सिर्फ़ धूप ही नहीं, बल्कि ठंडक और रात की नमी भी चाहिए ताकि गर्मी और ठण्डक का बैलेंस बना रहे। और अगर बारिश न होती, तो आपकी जड़ें कैसे पानी पीतीं? आपको पता है कि ज़मीन से पानी चूसकर ऊपर तक पहुँचाने के लिए आपकी जड़ों में कैपिलरी एक्शन और ट्रांसपिरेशन पुल काम करता है? अगर ये प्रोसेस न होता तो आप कभी भी फल नहीं दे पाते।”
अब असख़िया गहरी सोच में पड़ गया।
“आपको मालूम है ज़मीन ने आपको मज़बूती दी, आपकी जड़ों को सहारा दिया, और आपको Nutrients (पोषक तत्व) दिए। मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस, और पोटैशियम जैसे मिनरल्स आपको बढ़ने में मदद करते हैं। हवा ने आपकी पत्तियों को ताज़गी दी, ताकि आपकी शाख़ों स्टोमाटा (छिद्र) से गैसें आ-जा सकें। मधुमक्खियों और तितलियों ने आपके फूलों में पॉलिनेशन किया, जिससे आपके फल बन सके। अगर ये सब न होते, तो क्या आप अकेले ही इतने मीठे और रसीले आम दे पाते?”
असख़िया को जैसे किसी ने अथाह गहराइयों में गिरने से थाम लिया हो। उसने अपनी शाख़ों को देखा, फिर आसमान की तरफ़ और फिर ज़मीन की तरफ़। पहली बार उसे अहसास हुआ कि सच में, ये सब कुछ अकेले उसकी मेहनत का नतीजा नहीं था। उसे सूरज, चाँद, ज़मीन, बारिश, हवा और न जाने कितनी और चीज़ों का सहारा मिला था। वह गहरी सोच में पड़ गया कि आख़िर उसे किस बात का ग़ुरूर हो गया था।
चंचल मुस्कुराया और बोला, “देखा असख़िया अंकल, असल ख़ुशी देने में है, न कि एहसान जताने में। जिस तरह ये सारी चीज़ें आपको बिना किसी शर्त के देती हैं, वैसे ही आपको भी देना चाहिए।”
“और हाँ अंकल! हमने आप जैसे ही बुज़ुर्गों से सुना है कि देता वही है जो ज़िन्दा होता है, जो मर जाता है वो देना भी भूल जाता है। और जो इसलिये देता है कि लोग उसकी तारीफ़ें करें तो इस पूरे जंगल का मालिक उसे औंधें मुँह भड़कती आग में झुलसा देगा।”
असख़िया की आँखें नम हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने उसे ज़िन्दगी लौटा दी हो। उसने धीरे से अपनी शाख़ झुकाई और बहुत प्यार से सबसे मीठा आम चंचल को पेश कर दिया। उसने उसी वक़्त फ़ैसला किया कि वह फिर से पहले की तरह खुले दिल से अपने फलों को बाँटेगा।
उस दिन के बाद, असख़िया फिर से पहले की तरह दरियादिल हो गया। उसके आम खाने वाले परिन्दे और जानवर लौट आए, और जंगल फिर से ख़ुशहाल हो गया।
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जो देता है, वही जीता है
एक समय की बात है, एक हरे-भरे जंगल में एक बड़ा और ख़ूबसूरत सा आम का पेड़ था, जिसका नाम “असख़िया” था। उसकी घनी शाख़ाएँ बादलों को छूती मालूम होती थीं, और उसकी चौड़ी, सायादार टहनियाँ मानो किसी को भी अपनी आग़ोश में लेने के लिए तैयार रहती थीं। असख़िया अपने मीठे और रसीले फलों के लिए दूर-दूर तक मशहूर था। जब हवा चलती, तो उसकी पत्तियाँ सरसराती हुई ऐसे लगतीं जैसे कोई मधुर गीत गा रही हों।
असख़िया की शाख़ाओं पर बुलबुल अपना घोंसला बनाकर अपने नन्हे बच्चों को चहचहाना सिखाती, तो कोयल अपनी सुरीली आवाज़ में गीत गाकर पूरे जंगल को मंत्रमुग्ध कर देती। उसकी टहनियों पर नन्ही चिड़ियाँ झूला झूलतीं, गिलहरियाँ उछल-कूद करतीं, और मोर अपनी रंगीन पूँछ फैलाकर नाचते। उसकी जड़ों के पास हिरन और ख़रगोश आराम करते, तो बन्दर उसकी डालियों पर उधम मचाते। गर्मी के मौसम में मुसाफ़िर उसकी घनी छाँव में बैठकर राहत पाते, और बच्चे उसके नीचे बैठकर कहानियाँ सुनते।
सुबह की पहली किरण के साथ ही ओस की बूँदें उसकी पत्तियों पर मोतियों की तरह चमक उठतीं, और जैसे ही सूरज ऊपर चढ़ता, उसकी छाँव में ठंडी हवा बहने लगती, जिससे हर कोई राहत महसूस करता। उसकी डालियों से टपकने वाली मीठी आमरस की बूँदों पर तितलियाँ मँडरातीं, और कभी-कभी एक नटखट तोता आकर उसका मीठा आम चोंच में दबाकर उड़ जाता।
असख़िया के पास जो भी आता, वह उसे अपनी छाँव, अपने फल और अपनी ठंडी हवा का तोहफ़ा दिए बिना जाने न देता। वह दूसरों की मदद करके बेहद ख़ुश रहता, क्योंकि उसकी ज़िंदगी का यही मक़सद था—सबको ख़ुशी और सुकून देना। असख़िया को इस बात पर बहुत इत्मीनान होता था कि वह दूसरों की ज़रूरतें पूरी कर पा रहा है।
एक दिन, जंगल में कपट नाम का एक कौआ आया। कपट ने असख़िया को देखा और सोचा, “यह पेड़ जितना बड़ा और फलदार है उससे कहीं ज़्यादा फ़ैयाज़ और सख़ी है। अगर मैं इसे अपने जाल में फँसा लूँ, तो इसका सारा फल मैं अपने हिसाब से इस्तेमाल कर सकता हूँ।”
कपट ने मुस्कुराते हुए असख़िया से कहा, “असख़िया, यार तुम बहुत फ़ैयाज़ और दानी हो, लेकिन क्या तुम्हें पता है कि यह जंगल तुम्हारी फ़ैयाज़ी और सख़ावत का नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा है? बहुत जल्द तुम्हारे फल ख़त्म हो जाएँगे, और तुम्हें कोई याद भी नहीं करेगा। तुमसे से पहले भी यहाँ एक ‘जव्वाद’ नाम का बहुत ही सख़ी (उदार) पेड़ हुआ करता था। वह भी तुम्हारी तरह अपने फल सबको लुटाता रहता था, मगर जब वह बूढ़ा हो गया तो एक दिन बेरहम इन्सानों ने उसे काट दिया। अगर तुम समझदार हो, तो अपने फल सिर्फ़ उन्हीं को दो जो इसके लायक़ हैं। जो तुम्हारा एहसान मानें, तुम्हारी तारीफ़ें करें। बाक़ी सबको मना कर दो।”
यह कहकर कपट ने असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँधने शुरू कर दिये। असख़िया को अपनी तारीफ़ें सुनकर शुरू में तो थोड़ी झिझक सी महसूस हुई, लेकिन धीरे-धीरे उसे मज़ा आने लगा। अब तो असख़िया कपट का हो गया और उसने जानवरों और परिन्दों को फल देना बन्द कर दिये। वह सिर्फ़ उन्हीं को फल देता जो उसकी तारीफ़ें किया करते थे।
एक दिन हिरन का एक होनहार सा बच्चा असख़िया के पास आया। उसका नाम चंचल था। उसने देखा कि असख़िया के पास चापलूस क़िस्म के परिन्दे बैठे असख़िया की तारीफ़ों के पुल बाँध रहे हैं, और असख़िया बदले में उन्हें एक-एक फल दे देता है।
चंचल यह देखकर थोड़ा ठिठका, लेकिन वह असख़िया के पास जाकर बोला, “असख़िया अंकल मेरी दादी बीमार हैं अम्मा ने उनके लिये एक फल मँगाया है। आप मुझे उनके वास्ते एक मीठा सा आम दे दीजिये।”
“तुम्हें क्या लगता है यहाँ पर आम फ़्री बँटते हैं, चलो जाओ यहाँ से, यहाँ कोई आम-वाम नहीं मिल रहे हैं।” असख़िया ने तड़ककर जवाब दिया।
चंचल इस जवाब की उम्मीद नहीं कर रहा था, वह हैरान हो कर बोला, “अंकल आप तो बिलकुल बदल गए हैं, आप तो पहले ऐसे नहीं थे। आप तो बड़े फ़ैयाज़ और दाता थे।”
असख़िया ने कहा, “हाँ, अब मुझे समझ में आ गया है, मैं अपने फल यूँ ही बेकार में बाँट दिया करता था, मेरे फल बेकार थोड़े हैं कि यूँ ही बाँट दूँ। मेरी मेहनत और क़ाबिलियत इनमें लगी है।”
चंचल ने बहुत नरमी और मासूमियत के साथ बोला, “क्या कहा अंकल! क्या ये आम सिर्फ़ आपकी मेहनत और क़ाबिलियत का फल हैं?”
असख़िया ने अकड़कर जवाब दिया, “हाँ, हाँ! बिल्कुल, ये सब आम मेरी क़ाबिलियत का ही तो फल हैं।”
चंचल मुस्कुराया और बोला, “नहीं असख़िया अंकल, ये आपकी बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी है। ज़रा सोचिए, अगर सूरज अपनी रोशनी और गर्मी न देता, तो क्या आपकी शाख़ों पर फल लग पाते? सूरज की रोशनी से ही तो आपके पत्तों में फ़ोटोसिंथेसिस होता है, जिससे आपको खाना मिलता है। अगर ये प्रोसेस ही रुक जाए, तो आपकी शाख़ें सूखने लगेंगी और आपकी ज़िन्दगी मुश्किल हो जाएगी।”
असख़िया थोड़ा झेंप सा गया, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
चंचल ने आगे कहा, “अंकल ज़रा सोचिये अगर चाँद और सितारे रात को अपनी ठंडक न देते, तो ज़मीन की नमी कैसे बनी रहती? पौधों को सिर्फ़ धूप ही नहीं, बल्कि ठंडक और रात की नमी भी चाहिए ताकि गर्मी और ठण्डक का बैलेंस बना रहे। और अगर बारिश न होती, तो आपकी जड़ें कैसे पानी पीतीं? आपको पता है कि ज़मीन से पानी चूसकर ऊपर तक पहुँचाने के लिए आपकी जड़ों में कैपिलरी एक्शन और ट्रांसपिरेशन पुल काम करता है? अगर ये प्रोसेस न होता तो आप कभी भी फल नहीं दे पाते।”
अब असख़िया गहरी सोच में पड़ गया।
“आपको मालूम है ज़मीन ने आपको मज़बूती दी, आपकी जड़ों को सहारा दिया, और आपको Nutrients (पोषक तत्व) दिए। मिट्टी में मौजूद नाइट्रोजन, फ़ॉस्फ़ोरस, और पोटैशियम जैसे मिनरल्स आपको बढ़ने में मदद करते हैं। हवा ने आपकी पत्तियों को ताज़गी दी, ताकि आपकी शाख़ों स्टोमाटा (छिद्र) से गैसें आ-जा सकें। मधुमक्खियों और तितलियों ने आपके फूलों में पॉलिनेशन किया, जिससे आपके फल बन सके। अगर ये सब न होते, तो क्या आप अकेले ही इतने मीठे और रसीले आम दे पाते?”
असख़िया को जैसे किसी ने अथाह गहराइयों में गिरने से थाम लिया हो। उसने अपनी शाख़ों को देखा, फिर आसमान की तरफ़ और फिर ज़मीन की तरफ़। पहली बार उसे अहसास हुआ कि सच में, ये सब कुछ अकेले उसकी मेहनत का नतीजा नहीं था। उसे सूरज, चाँद, ज़मीन, बारिश, हवा और न जाने कितनी और चीज़ों का सहारा मिला था। वह गहरी सोच में पड़ गया कि आख़िर उसे किस बात का ग़ुरूर हो गया था।
चंचल मुस्कुराया और बोला, “देखा असख़िया अंकल, असल ख़ुशी देने में है, न कि एहसान जताने में। जिस तरह ये सारी चीज़ें आपको बिना किसी शर्त के देती हैं, वैसे ही आपको भी देना चाहिए।”
“और हाँ अंकल! हमने आप जैसे ही बुज़ुर्गों से सुना है कि देता वही है जो ज़िन्दा होता है, जो मर जाता है वो देना भी भूल जाता है। और जो इसलिये देता है कि लोग उसकी तारीफ़ें करें तो इस पूरे जंगल का मालिक उसे औंधें मुँह भड़कती आग में झुलसा देगा।”
असख़िया की आँखें नम हो गईं। उसे लगा जैसे किसी ने उसे ज़िन्दगी लौटा दी हो। उसने धीरे से अपनी शाख़ झुकाई और बहुत प्यार से सबसे मीठा आम चंचल को पेश कर दिया। उसने उसी वक़्त फ़ैसला किया कि वह फिर से पहले की तरह खुले दिल से अपने फलों को बाँटेगा।
उस दिन के बाद, असख़िया फिर से पहले की तरह दरियादिल हो गया। उसके आम खाने वाले परिन्दे और जानवर लौट आए, और जंगल फिर से ख़ुशहाल हो गया।
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*दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना* आम तौर से इस मौज़ू पर सवाल करना और उस पर (ख़ास तौर पर किसी मर्द का) जवाब देना हया के ख़िलाफ़ समझा जाता है। लेकिन अदब के साथ और महदूद अलफ़ाज़ का इस्तेमाल करते हुए इन मौज़ूआत पर बात करनी चाहिये, बल्कि कभी-कभी बात करना ज़रूरी हो जाता है। मुझे महसूस होता है कि इस मौज़ू पर हमारी बहनों और बेटियों के दरम्यान दुरुस्त बात का लाया जाना वक़्त की ख़ास ज़रूरत है। लिहाज़ा मैं आप बहनों का शुक्रगुज़ार हूँ कि आपने इस मौज़ू पर सवाल किया। ख़वातीन के लिये हैज़ के दिनों में क़ुरआन मजीद पढ़ने के सिलसिले में उलमा के दरम्यान दो मुख़्तलिफ़ रायें पाई जाती हैं। एक राय ये है कि हैज़ वाली औरतें क़ुरआन को न सिर्फ़ छू नहीं सकतीं बल्कि किसी सूरत पढ़ भी नहीं सकतीं। इस राय को क़बूले-आम हासिल हो गया है, शायद इसलिये कि हमारी ख़वातीन को वैसे भी दीन और उसके मुताले से दूर ही रखा गया और ख़ुद ख़वातीन ने भी कभी इस मौज़ू पर न सोचा और न सवाल उठाया। हालाँकि इस मसले पर एक दूसरी राय भी मौजूद है और वो ये है कि हैज़ वाली औरतों के क़ुरआन मजीद पढ़ने-पढ़ाने में कोई हरज नहीं है। दोनों तरफ़ की रायों का मुतालिआ करने से ये बात वाज़ेह होती है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन न पढ़ने के दलायल मज़बूत नहीं हैं, बल्कि सिरे से ऐसी कोई दलील ही नहीं मिलती जिससे ये साबित होता है कि हाइज़ा या निफ़ास वाली औरत को क़ुरआन नहीं पढ़ना चाहिये। इस सिलसिले में जो हदीस पेश की जाती है कि لا تقرأُ الحائضُ والا الجنُبُ شَیْئاً مِنَ الْقُرآنِ हैज़ वाली औरतें और जुंबी क़ुरआन से कुछ न पढ़ें। (इब्ने-माजा 595) ये हदीस पहली बात तो इन्तिहा दर्जे की ज़ईफ़ है, दूसरे इस हदीस की तरदीद सुनन तिर्मिज़ी की उस ज़ईफ़ हदीस (146) से ही हो जाती है जिसमें इमाम तिर्मिज़ी कहते हैं कि क़ुरआन हर हाल में पढ़ा जा सकता है सिवाय हालते-जनाबत के। (मतलब ये हुआ कि हालते-जनाबत के अलावा हर हालत में क़ुरआन पढ़ा जा सकता है) और ज़ाहिर बात है हालते-जनाबत को हालते-हैज़ के बराबर क़रार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पहली बात तो जनाबत इख़्तियारी है और हैज़ और निफ़ास ग़ैर-इख़्तियारी, दूसरे जनाबत वक़्ती और मुख़्तसर मुद्दती है जबकि हैज़ मुस्तक़िल और तवीलुल-मुद्दती प्रोसेस है। सोचने और ग़ौर करने का मक़ाम है कि जब अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने अक़्ल व शुऊर के ऐतिबार से मर्द और औरत के दरम्यान फ़र्क़ नहीं किया तो ये कैसे मुमकिन है कि क़ुरआन, जो इल्म का मख़ज़न है उससे इस्तिफ़ादा करने से एक औरत को महज़ इस वजह से रोक दे कि उसको फ़ितरी तौर पर ख़ून आता है। और हर माह 6-6, 7-7 दिन तक मुसलसल आता रहता है और निफ़ास की हालत में ये मुद्दत महीनों पर मुहीत होती है। ज़ाहिर है इतने दिनों तक अगर कोई शख़्स क़ुरआन से दूर रहेगा तो न सिर्फ़ ये कि ये उसके लिये अल्लाह के कलाम से महरूमी है बल्कि भूलने का ख़तरा भी क़वी हो जाता है। फिर ये कैसी मज़हका-ख़ेज़ बात है कि क़ुरआन के अलफ़ाज़ को तोड़कर तो पढ़ा जा सकता है मगर मिलाकर जुमले की शक्ल में नहीं पढ़ा जा सकता, गोया (नाउज़ु-बिल्लाह) अल्लाह की एक मख़लूक़ इतनी नजिस हो गई कि वो क़ुरआन के अलफ़ाज़ और उसके मफ़हूम से भी महरूम कर दी गई। ये कितनी मज़हका ख़ेज़ बात है कि हैज़ की हालत में एक-एक लफ़्ज़ पढ़ने से तो गन्दगी नहीं लगती अलबत्ता जैसे ही इन अलफ़ाज़ को मिलाकर जुमला बनाने की कोशिश की तो गन्दगी चिपक जाएगी। गोया ये अलफ़ाज़ से नहीं, मफ़हूम से रोकने की कोशिश है। इस सिलसिले में ये भी अर्ज़ करना मुनासिब होगा कि इमाम मालिक का मसलक यही है कि दौराने-हैज़ क़ुरआन पढ़ना जायज़ है। अल्लामा इमाम इब्ने-तैमिया फ़रमाते हैं कि हाइज़ा औरत को तिलावत करने में रुकावट की कोई वाज़ेह बुनियाद और दलील नहीं मिलती है। अल्लाह के रसूल (सल्ल०) ने फ़रमाया कि अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त को अपना कलाम ज़मीन व आसमान के दरमियान हर चीज़ से ज़्यादा महबूब है। जगह-जगह क़ुरआन की तिलावत पर अज्रे-अज़ीम का वादा फ़रमाया है तो ज़रा सोचिये कि इन्सानों की आधी आबादी को इस क़ुरआन की तिलावत से कैसे महरूम किया जा सकता है। जहाँ तक बात है क़ुरआन मजीद की उस आयत की जिसमें कहा गया है कि لَّا یَمَسُّہٗۤ اِلَّا الۡمُطَہَّرُوۡنَ जिसे मुतह्हरीन (इन्तिहाई पाक) के सिवा कोई छू नहीं सकता। (वाक़िआ : 79) तो इस आयत के सियाक़ (Contaxt) से मालूम होता है कि यहाँ तो अल्लाह रब्बुल-इज़्ज़त ने इनकारियों के उस इलज़ाम की तरदीद की है जिसमें वो कहा करते थे कि ये कलाम उन पर जिन्न और शयातीन लेकर आते हैं। अल्लाह ने जवाब में कहा कि इस कलाम को जिन्न और शयातीन जैसी नजिस मख़लूक़ तो छू भी नहीं सकती इसे तो इन्तिहाई पाक (फ़रिश्ते) लेकर उतरते हैं। यहाँ पर किसी इन्सान के क़ुरआन को नापाकी की हालत में छूने का ज़िक्र हरगिज़ नहीं है। जहाँ तक सूरा बक़रा की आयत 222 का ताल्लुक़ है जिसमें फ़रमाया गया है कि "पूछते हैं : हैज़ के बारे में क्या हुक्म है? कहो कि वो एक اَذًی (यानी एक तरह की गन्दगी और तन्दुरुस्ती की बनिस्बत बीमारी) की हालत है।" तो इस आयत का मतलब ये हरगिज़ नहीं है कि हैज़ की हालत में औरत इतनी नजिस हो गई है कि इस हालत में अगर कोई उसको हाथ लगाए तो वो नजिस हो जाए या औरत किसी चीज़ को हाथ लगाए तो वो चीज़ नापाक हो जाए। (अगर ये बात होती तो फिर औरत का बनाया हुआ खाना भी नजिस क़रार पाएगा और उसका छुआ हुआ कपड़ा भी) बल्कि यहाँ मंशा सिर्फ़ ये है कि इस हालत में मर्द को चाहिये कि वो उससे ज़ौजियत का ताल्लुक़ न बनाए जब तक कि वो इस हालत से बाहर न आ जाए, क्योंकि इस हालत में एक औरत तन्दुरुस्ती के मुक़ाबले बीमारी के ज़्यादा क़रीब होती है। इस आयत का मंशा ये हरगिज़ नहीं है कि इस हालत में औरत को इतना नजिस बना दिया जाए कि क़ुरआन पढ़ने और उस पर तदब्बुर करने से भी महरूम कर दिया जाए। हाँ ये बात ज़रूर है कि उसकी इस (बीमारी और कमज़ोरी की) कैफ़ियत को देखते हुए नमाज़ से मुकम्मल और रोज़े से वक़्ती रुख़सत दे दी गई है। आज के इस एडवांस दौर में जबकि ज़माना इतना आगे बढ़ चुका है और सुहूलियात इस क़द्र मौजूद हैं कि हैज़ जैसी चीज़ लड़कियों के लिये ज़िन्दगी के मअमूल में शामिल हो गई हैं, हमारी ख़वातीन को चाहिये कि पुराने ख़यालात से बाहर निकलें। जब इस हालत की वजह से हमारा कोई दुनियावी काम नहीं रुकता है तो आख़िर क़ुरआन पर तदब्बुर क्यों रोका जाए? लिहाज़ा क़ुरआन को कसरत से पढ़ें और उस पर ख़ूब तदब्बुर करें, क्योंकि न तो ख़ुद अल्लाह रब्बुल-आलमीन ने क़ुरआन में कहीं आपको इस काम से रोका है और न ही प्यारे नबी (सल्ल०) की कोई सही और वाज़ेह हदीस मिलती है जो आपको इस काम से रोकती हो।
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हज़रत अबू-क़तादा (रज़ि०) से रिवायत है कि एक मर्तबा नबी ﷺ के पास से एक जनाज़ा गुज़रा तो फ़रमाया ये शख़्स आराम पाने वाला है या दूसरों को उस से आराम मिल गया। लोगों ने पूछा या रसूलुल्लाह! इस का क्या मतलब? नबी ﷺ ने फ़रमाया, बन्दाए-मोमिन दुनिया की तकलीफ़ों और परेशानियों से नजात हासिल कर के अल्लाह की रहमत में आराम पाता है और फ़ाजिर (बदकार) आदमी से लोग शहर, पेड़ और दरिन्दे तक राहत हासिल करते हैं। (Musnad Ahmad : 22903, 22963) रसूलुल्लाह (ﷺ) ने इन्सानों को दो गिरोहों में तक़सीम फ़रमाया है — मोमिन और फ़ाजिर। मोमिन वो होते हैं जिनका वजूद इस धरती पर रहमत बनकर उतरता है। उनकी ज़ात से इंसानियत को फ़ायदा पहुँचता है, उनकी बातों में सुकून होता है, और उनके हाथों से दूसरों को राहत मिलती है। वो जहाँ रहते हैं वहाँ के माहौल में अमन और करम की फ़िज़ा फैल जाती है। मोहल्ले वाले, रिश्तेदार, साथी और अजनबी — सब उनसे मुतमइन रहते हैं। जब ऐसे लोग दुनिया से रुख़्सत होते हैं तो दुनिया उन्हें दुआओं और आँसुओं के साथ रवाना करती है, और परवरदिगार उन्हें अपनी रहमत में जगह अता करता है। उन्होंने दुनिया में जो तकलीफ़ें दूसरों की राहत के लिये बर्दाश्त की थीं, अल्लाह उन्हें उसका ऐसा बदला देता है जो दिल का सुकून बन जाता है। फ़ाजिर इसके बरअक्स, वो होते हैं जिनकी मौजूदगी लोगों के लिये अज़ाब बन जाती है। उनकी ज़बान से तल्ख़ी टपकती है, उनके किरदार से तकलीफ़ें जन्म लेती हैं। वो जहाँ जाते हैं, वहाँ की फ़िज़ा मुकद्दर हो जाती है, रिश्तों में खिंचाव रहता है और लोग चैन की सांस नहीं ले पाते। पड़ोसी, साथी, यहाँ तक कि जानवर और पेड़-पौधे तक भी उनकी ज़ालिमाना हरकतों से महरूम नहीं रहते। वो पेड़ों को बिला ज़रूरत काटते हैं, बेज़बान जानवरों पर ज़ुल्म करते हैं, और हर नेमत को सिर्फ़ अपने नफ़्सी मफ़ाद (स्वार्थ) के लिये इस्तेमाल करते हैं। ऐसे लोग जब किसी बस्ती में रहते हैं, तो वहाँ के लोग अल्लाह से दुआ करते हैं कि इनसे निजात मिले।
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