क़ुरआन को किताबी शक्ल में नहीं अमली शक्ल में पेश करने का वक़्त है
क़ुरआन मजीद को लोगों के हाथों में पहुँचा देना या उनके सामने पढ़कर सुना देना ही असल काम नहीं है, बल्कि इससे भी आगे बढ़कर असलन जो काम करने का है वो ये है कि मुसलमान अपने अख़लाक़ और किरदार से इस किताब के गवाह बनें। इस किताब के मुताबिक़ अपने किरदार बनाकर इसकी तालीमात को अमलन पेश करें।
अगर किसी महफ़िल या तक़रीब में क़ुरआन की इन्सानियत और मसावात (बराबरी) का दर्स देनेवाली आयात पढ़कर सुनाई जा रही हों तो यक़ीनन ये क़ाबिले-तारीफ़ काम है क्योंकि ये काम इस ज़माने में पूरी हिम्मत और जुरअत के साथ किया गया जबकि ख़ुदा का नाम लेने पर थाने में रपट लिखवा दी जाती है।
लेकिन अगर इसी के साथ-साथ आलीशान बिल्डिंगें बनाते वक़्त मज़दूरों पर ज़ुल्म तोड़ा गया हो, उनसे कम तनख़्वाह पर ज़्यादा काम लिया गया हो तो मसावात का दर्स देने वाली उन आयात की तिलावत इसी फ़िज़ा में क़ियामत तक बे-असर भटकती रहेगी और रोज़े-क़ियामत गरेबान थामकर पूछेगी कि तुम वो बात क्यों दुनिया को सुनाते फिरते थे जिस पर ख़ुद अमल नहीं करते थे।
अगर एक तरफ़ हम-जिंस-परस्ती पर रोक लगाकर दुनिया को ये बताने की कोशिश की जा रही हो कि हम इस्लाम-पसन्द हैं तो ये एक क़ाबिले-अज्र अमल है कि फ़हाशी की तमाम हदें फलाँगने वाले तालाब में कोई तो है जो हिम्मत करके कह सके कि हम इस तालाब में उतरेंगे ज़रूर मगर अपनी शर्तों के साथ।
लेकिन दूसरी तरफ़ अगर तअय्युशात (ऐश-व-इशरत) के तमाम सामान फ़राहम किये जा रहे हों, इस फ़ानी दुनिया को हर तरफ़ से चकाचौंध से भर देने पर पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा हो तो काँधों पर बैठे फ़रिश्ते नामाए-आमाल में नीयत का अज्र ज़रूर लिखेंगे लेकिन अमलन जो ऐश-परस्ती हो रही है उसे भी नोट कर रहे होंगे और फ़ैसले के दिन दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा कि दुनिया को क्या दिखा रहे थे और कर क्या रहे थे?
अगर दुनिया भर से आलिमों और स्कॉलर्स को बुला-बुलाकर इस्लाम की दावत और इशाअत का काम कराया जा रहा है तो ये क़ाबिले-तहसीन काम है कि जब लोग तफ़रीह के लिये निकले हुए हों तो कुछ लोग तो हों जो उन्हें उनके हक़ीक़ी मालिक का तआरुफ़ करा रहे हों और बता रहे हों कि ये दुनिया महज़ तफ़रीह और मौज-मस्ती के लिये नहीं बल्कि इम्तिहान की जगह है।
लेकिन दूसरी तरफ़ अगर सैंकड़ों हज़ार डॉलर महज़ तफ़रीह पर फ़ुज़ूल ख़र्च किये जा रहे हों तो कल का मुअर्रिख़ ये ज़रूर लिखेगा कि जिस वक़्त क़ौम को तालीम व तरबियत की ज़रूरत थी, क़ौम को साइंस और मॉडर्न टेक्नोलॉजी से आरास्ता करने के लिये इस्लामी तर्ज़ के स्कूल, कॉलेजेज़ और युनिवर्सिटियाँ खोलने की ज़रूरत थी ताकि नौजवान नस्ल के अक़ीदे भी दुरुस्त हों और वो दुनिया के लिये मुफ़ीद और कारामद भी साबित हों तो उस वक़्त ये दौलतमन्द लोग अपनी दौलत महज़ तफ़रीह के कामों में फ़ुज़ूल ख़र्च करने पर लगे हुए थे।
अगर एक तरफ़ तमाम मस्जिदों से मुअज़्ज़न इस लिये बदल दिये गए हों कि लोग अज़ान के बोल बेहतरीन और शीरीं आवाज़ में सुन सकें तो ये काम क़ाबिले-तारीफ़ है कि जब चारों तरफ़ इस्लाम की तस्वीर को बिगाड़ने की हर-मुमकिन कोशिश की जा रही थी ऐसे में एक मुल्क था जो कम-अज़-कम इतना शुऊर तो रखता था कि लोगों को ये पैग़ाम ज़रूर दिया जाए कि जिस दीन के एक छोटे से रुक्न (पार्ट) में इतनी शीरनी है तो वो दीन कितना शीरीं और पुर-लुत्फ़ होगा।
लेकिन अगर ये अमल इस एहसास से ख़ाली है कि “इस दुनिया में हमें अम्न-व-इन्साफ़ का अलम्बरदार बनाया गया है, लिहाज़ा जहाँ झूट का बोलबाला है और बातिल के डंके बज रहे हैं वहाँ हमें कलिमाए-हक़ बुलन्द करना है और ज़ुल्म को मिटाने के लिये अपना सब कुछ लगा देना है।” तो यक़ीन जानिये अल्लाह क़ियामत के दिन इस बात का हिसाब ज़रूर लेगा कि जिस दौर में मज़लूम की आवाज़ दबाई जा रही थी उस ज़माने में तुम अपनी सलाहियतें और सरमाया अज़ान को मीठी और सुरीली आवाज़ में सुनाने के इन्तिज़ाम में लगे हुए थे।
हक़ीक़त में आज क़ुरआन को लोगों के हाथों में पहुँचाने की जितनी ज़रूरत है उससे कहीं ज़्यादा ज़रूरत इस बात की है कि अपना सरमाया और अपनी तमाम तर सलाहियतें इस काम पर लगा दी जाएँ कि इस किताब के मुताबिक़ सिस्टम चलाकर दुनिया को दिखाया जाए और क़ुरआन के अफ़ज़ल और बेहतर होने को साबित कर दिया जाए और बता दिया जाए कि क़ुरआन एक वर्ल्ड-आर्डर है और जो निज़ाम ये पेश करता है उसमें अद्ल-व-इन्साफ़ भी है और तकरीमे-इन्सानियत भी। मवासात (ग़म-ख़्वारी) व मसावात (बराबरी) भी है और अमीरों का तहफ़्फ़ुज़ व ग़रीबों की इज़्ज़त और वक़ार भी। मज़लूम की दादरसी भी है और ज़ालिम की सरकूबी भी।
इस काम को अंजाम देने के लिये अगर कोई मुसलमान मुल्क या मुसलमानों का कोई गरोह आगे आता है तो हक़ीक़त में वही क़ुरआन का हक़ीक़ी ख़ादिम और जन्नत का असल वारिस है।