ग़ालिब : बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना ——– मतलब अगर किसी काम को सलीक़े से किया जाए
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना ——– मतलब अगर किसी काम को सलीक़े से किया जाए
करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात। कूकर सम भूकत फिरे, सुनी सुनाई बात ॥ अर्थ: कबीर दास कहते हैं कि अज्ञानी लोग रात-दिन वो
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ——- मतलब अगर ये कहा जाए तो
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे ——- मतलब शाइर कहता है कि मेरी निगाह में इस दुनिया की हैसियत ऐसी
चे मुल्लाई, चे दरवेशी, चे सुल्तानी, चे दरबानी। फ़रोग़े-कार मी जोयद ब-सालूसी व ज़र्राक़ी।। अल्लामा इक़बाल (रह०) —— मतलब मुल्ला (आलिमे-दीन) हो चाहे दरवेश, सुल्तान
कबीरा खड़ा बज़ार में माँगे सबकी ख़ैर। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।। कबीर दास जी के इस दोहे का दूसरा पद बहुत
अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर। हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।। मेरे नौजवान साथियो! शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि
ब-जलाले-तू कि दर दिले-दिगर आरज़ू नदारम। ब-जुज़ ईं दुआ कि बख़्शी ब-कबूतराँ उक़ाबे।। तर्जमा : (ऐ मेरे रब) तेरे जलाल की क़सम मेरे दिल में
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का ——- मुश्किल अलफ़ाज़ ख़ंदा-हा-ए-गुल = तमाम फूलों की हँसी ख़लल
तेरे सिवा कोई शाइस्ताए-वफ़ा भी तो हो। मैं तेरे दर से जो उठूँ तो किस के दर जाऊँ।। तू ही तो हमारा सरपरस्त व कारसाज़