कबीर : रहना नहिं देस बिराना है।
रहना नहिं देस बिराना है। यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है। यह संसार काँट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है। यह
रहना नहिं देस बिराना है। यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है। यह संसार काँट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है। यह
प्रेम प्रेम सब कहै, प्रेम ना चिन्है कोई। आठ पहर भीना रहै, प्रेम कहाबै सोई।।* किसी के प्रति मात्र सामयिक रूप से आकर्षित हो जाने
करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात। कूकर सम भूकत फिरे, सुनी सुनाई बात ॥ अर्थ: कबीर दास कहते हैं कि अज्ञानी लोग रात-दिन वो
कबीरा खड़ा बज़ार में माँगे सबकी ख़ैर। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।। कबीर दास जी के इस दोहे का दूसरा पद बहुत