ग़ालिब : रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल। जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है? ————————– मतलब इन्सान के जिस्म की
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल। जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है? ————————– मतलब इन्सान के जिस्म की
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का ——- मुश्किल अलफ़ाज़ ख़ंदा-हा-ए-गुल = तमाम फूलों की हँसी ख़लल
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन। दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।। ——– ग़ालिब कहते हैं कि जन्नत के
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा। लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।। ——- मतलब अच्छी मगर दलील से भरी बातचीत
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता ——– मतलब
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना ——– मतलब अगर किसी काम को सलीक़े से किया जाए
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ——- मतलब अगर ये कहा जाए तो
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे ——- मतलब शाइर कहता है कि मेरी निगाह में इस दुनिया की हैसियत ऐसी
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का ——- मुश्किल अलफ़ाज़ ख़ंदा-हा-ए-गुल = तमाम फूलों की हँसी ख़लल
तेरे सिवा कोई शाइस्ताए-वफ़ा भी तो हो। मैं तेरे दर से जो उठूँ तो किस के दर जाऊँ।। तू ही तो हमारा सरपरस्त व कारसाज़