Safein Kaj, Dil Pareshan, Sajdey be-zoq
इक़बाल : सफ़ें कज, दिल परीशाँ सजदा बे-ज़ौक़ — — — सफ़ें कज, दिल परीशाँ सजदा बे-ज़ौक़।के जज़्बे-अन्दरूँ बाक़ी नहीं है।। दूसरे मिसरे के बारे
इक़बाल : सफ़ें कज, दिल परीशाँ सजदा बे-ज़ौक़ — — — सफ़ें कज, दिल परीशाँ सजदा बे-ज़ौक़।के जज़्बे-अन्दरूँ बाक़ी नहीं है।। दूसरे मिसरे के बारे
अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर।हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।। मेरे नौजवान साथियो! शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी
रहना नहिं देस बिराना है। यह संसार कागद की पुड़िया, बूँद पड़े घुल जाना है। यह संसार काँट की बाड़ी, उलझ-पुलझ मरि जाना है। यह
साहिबे – क़ुरआँ व बे-ज़ौक़े – तलब ! अल-अजब, सुम्मल-अजब, सुम्मल-अजब ! तशरीह : कितने हैरत की बात है कि कोई शख़्स या कोई क़ौम
प्रेम प्रेम सब कहै, प्रेम ना चिन्है कोई। आठ पहर भीना रहै, प्रेम कहाबै सोई।।* किसी के प्रति मात्र सामयिक रूप से आकर्षित हो जाने
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल। जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है? ————————– मतलब इन्सान के जिस्म की
बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल कहते हैं जिस को इश्क़ ख़लल है दिमाग़ का ——- मुश्किल अलफ़ाज़ ख़ंदा-हा-ए-गुल = तमाम फूलों की हँसी ख़लल
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन। दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।। ——– ग़ालिब कहते हैं कि जन्नत के
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा। लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।। ——- मतलब अच्छी मगर दलील से भरी बातचीत
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता ——– मतलब