
फ़ितनाए-दज्जाल और सूरा कहफ़ Part-1
क़ुरआन मजीद एक ऐसी किताब है कि अगर मुसलमान इसका हक़ अदा करें तो ये उन्हें तरक़्क़ी के बुलन्द मक़ाम पर पहुँचा सकती है, हक़

क़ुरआन मजीद एक ऐसी किताब है कि अगर मुसलमान इसका हक़ अदा करें तो ये उन्हें तरक़्क़ी के बुलन्द मक़ाम पर पहुँचा सकती है, हक़
इन्सान की सबसे निचली सतह ये है कि वो सिर्फ़ अपने ऐश व आराम या अपने घर-ख़ानदान की बेजा मुहब्बत में पड़ जाए; हक़ की

‘ईमान’ की सादा सी डेफ़िनिशन तो ये है कि “ग़ैबी हक़ीक़तों के बारे में नबियों ने जो ख़बर दी है उनको ज़बान से इक़रार करना
كُلُّ أُمَّتِي يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَयानी “मेरी उम्मत का एक-एक फ़र्द जन्नत में जाएगा।” (हदीस) इस जुमले ने मुसलमानों में इतनी शोहरत पाई है कि यक़ीन के
‘ईमान’ की सादा सी डेफ़िनिशन तो ये है कि “ग़ैबी हक़ीक़तों के बारे में नबियों ने जो ख़बर दी है उनको ज़बान से इक़रार करना
दीने-इस्लाम में ‘ईमान’ और ‘आमाले-सालेहा’ (नेक आमाल, अच्छे अख़लाक़) दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जिनसे ख़ुशहाली के दरवाज़े खुलते हैं और नेकियाँ फैलती हैं। अगर ये
तक़रीबन तमाम ही नबियों के साथ ये हादिसा पेश आया है कि उनके बारे में लोग दो तरह की गुमराही में मुब्तिला हुए हैं. पहली
हमारे मसायल का हल तालीम में नहीं बल्कि निज़ामे-तालीम की दुरुस्ती में है। हमारी बदक़िस्मती ये है कि हमारा दानिशवर तबक़ा जो कुछ सोचता है
अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर। हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।। शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी क़ौम किस
हज़रत मुहम्मद (सल्ल) ने फ़रमाया “……..जिनसे तुम इल्म हासिल करो (यानि Teachers) उनके साथ ख़ाकसाराना (यानि नर्मी का) बर्ताव करो।” (हदीस बहवाला तबरानी)