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रोज़े और क़ियामुल्लैल से क्या वाक़ई गुनाह माफ़ हो जाते हैं?

مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ، وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ .

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जिस तरह

जिस तरह कोई पेड़ जब फूल, फल और साया देना बन्द कर देता है तो हम उसे मुर्दा क़रार देते हैं, जिस तरह कोई नदी

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जिस तरह

जिस तरह सूरज के ग़ुरूब होने की सूरत में अँधेरा छा जाता है और फिर उस अँधेरे को दूर करने के लिये हमें चाँद की

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जिस तरह

जिस तरह अमानत के तौर पर रखे हुए माल में ख़ियानत करने से इन्सान के ऊपर से भरोसा उठ जाता है जिससे इन्सानी समाज में

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जिस तरह

जिस तरह दीमक लकड़ी को खाकर मिट्टी में तब्दील कर देती है; उसी तरह दिल में बुग़्ज़ और हसद वो दीमक है जो इन्सान की

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जिस तरह

जिस तरह आग लकड़ी को जलाकर राख में तब्दील कर देती है; उसी तरह ग़ुस्सा इन्सान की शख़्सियत को जलाकर राख बना देता है। लिहाज़ा

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जिस तरह

जिस तरह पेट में खाना हज़म न होने की सूरत में बहुत-सी बीमारियाँ पैदा होती हैं। उसी तरह तारीफ़ के हज़म न होने की सूरत

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ज़ाकिर नाइक को जवाब

ज़ाकिर भाई के ज़िक्र ने वाजिद भाई को पाने के बजाय खो दिया कितना अच्छा होता कि वाजिद भाई को ये कह कर ज़लील न

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अक़्ल और हिदायत

इन्सान की ज़िन्दगी में रौशनी और आँख का ताल्लुक़ इतना गहरा और आपस में एक दुसरे से इतना जुड़ा हुआ है कि एक के बग़ैर

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