रोज़े और क़ियामुल्लैल से क्या वाक़ई गुनाह माफ़ हो जाते हैं?
مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ، وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ .
مَنْ صَامَ رَمَضَانَ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ ، وَمَنْ قَامَ لَيْلَةَ الْقَدْرِ إِيمَانًا وَاحْتِسَابًا غُفِرَ لَهُ مَا تَقَدَّمَ مِنْ ذَنْبِهِ .
“मैं हूँ” मैं हूँ का यक़ीन इन्सान के अन्दर अपने होने का वो पॉज़िटिव सेन्स डेवेलप करता है, जिससे इन्सान न सिर्फ़ अपने-आपको बना, सँवार
ज़ाकिर भाई के ज़िक्र ने वाजिद भाई को पाने के बजाय खो दिया कितना अच्छा होता कि वाजिद भाई को ये कह कर ज़लील न
इन्सान की ज़िन्दगी में रौशनी और आँख का ताल्लुक़ इतना गहरा और आपस में एक दुसरे से इतना जुड़ा हुआ है कि एक के बग़ैर