समाज का अख़लाक़ी दिवालिया
अगर हम ये मानते हैं कि समाज से अख़लाक़ का दिवालिया निकल गया है, अगर हम ये मानते हैं कि मुल्क ज़ुल्म, जब्र व इस्तिब्दाद
अगर हम ये मानते हैं कि समाज से अख़लाक़ का दिवालिया निकल गया है, अगर हम ये मानते हैं कि मुल्क ज़ुल्म, जब्र व इस्तिब्दाद
सोच बदलेंगे तो अक़ीदा बदलेगा। अक़ीदा बदलेगा तो मिज़ाज बदलेगा। मिज़ाज बदलेगा तो किरदार बदलेगा। किरदार बदलेगा तो समाज में वो इन्क़िलाब बरपा होगा जिसकी
उलमा दो क़िस्म के होते हैं, उलमाए-हक़ और उलमाए-सू। जिस शख़्स का ख़ुद का ताल्लुक़ क़ुरआन से मज़बूत हो और उसपर अमल करता हो और
मेरा फ़ेवरेट स्कॉलर वही है जो… * क़ुरआन पर अमल करता हो और लोगों में क़ुरआन की समझ पैदा करने में मदद करता हो, लेकिन
“(ऐ नबी) कह दीजिए कि ऐ अहले-किताब आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान कॉमन है…..।” (क़ुरआन 3:64) मुसलमानों में जितने
मज़हब एक ऐसी अफ़ीम है जो डायरेक्ट दिमाग़ पर असर करती है और दिलों में दूसरों के लिये नफ़रत पैदा कर देती है, जिससे पूरा
क़ुरआन से दूरी का ही नतीजा है कि आज हिन्दुस्तानी मुसलमानों की बड़ी अक्सरियत ये समझती है कि मर्द के पास औरत को तलाक़ देने
तलाक़ का क़ुरआनी तरीक़ा इस्लाम अपनी फ़ितरत और स्वभाव में रहमत का दीन है. इन्साफ़, मसावात (बराबरी) और मवासात (ग़मख़ारी) का दीन है. इस्लाम की
अपनी ख़िदमत और दीगर कामों को कराने के लिए ग़ुलाम रखने को इस्लाम ने कभी हराम क़रार नहीं दिया. लेकिन ग़ुलामों के साथ अच्छा सुलूक
मुल्क की जो मौजूदा सूरते-हाल हमारे सामने है उसमें वाक़ई हमें एकजुट होकर हक़ और इंसाफ़ के लिए आवाज़ उठाने की ज़रूरत है। हमें यक़ीनन