Zawal ki shikar qomein
ज़वाल की शिकार क़ौमें — — — हक़ीक़त ये है कि किसी नज़रिये और फ़िक्र पर वुजूद में आनेवाली क़ौमें अपने शुरूआती ज़माने में हिम्मत,
ज़वाल की शिकार क़ौमें — — — हक़ीक़त ये है कि किसी नज़रिये और फ़िक्र पर वुजूद में आनेवाली क़ौमें अपने शुरूआती ज़माने में हिम्मत,
मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल — — — क्या इन्कारे-हदीस का ढोल पीटते रहने से और दूसरी जमाअतों और शख़्सियतों को ग़लत
अमन की दावत कब तक — — — लोगों को भलाई की तरफ़ बुलाने और बुराई से रोकने का काम उस वक़्त तक जारी रहना
किरदार की ख़ुशबू को फैलने से रोका नहीं जा सकता — — — रसूलुल्लाह (सल्ल०) का उसवा (नमूनाए-ज़िन्दगी) हमें ये बताता है कि लोग शिर्क
मुसलमान क्या हैं और क्या नहीं हैं — — — मुसलमान महज़ एक मज़हबी गरोह नहीं हैं कि वो इस्लाम के साथ कुछ आस्थाओं और
हुक्मरानी का मॉडल — — — हज़रत उमर (रज़ि.) इस्लामी तारीख़ की अज़ीम शख़्सियत थे। उनको यह हरगिज़ गवारा न होता था कि खाने-पीने और
क्या क़ुरआन आज की प्लुरल सोसाइटी के लिये भी किताबे-हिदायत है? — — — कुछ लोग मानते हैं कि क़ुरआन नबी के मिशन की रुदाद
मोहब्बत की हक़ीक़त असल में मोहब्बत आज़ादी का नहीं बल्कि बंधन (ग़ुलामी) का नाम है। लेकिन इस बंधन में ऐसा आनंद होता है जो इंसान
नफ़्स और रूह — — — हम आम तौर पर दो शब्दों का इस्तेमाल करते हैं — रूह और नफ़्स। क्या ये दोनों एक ही
मुसलमानों का कारनामा — — — मुसलमानों का एक ज़बरदस्त कारनामा ये है कि इन्होंने क़ुरआन के अलफ़ाज़ को इस तरह याद रखा है कि