क्या वाक़ई मदारिस इस्लाम के क़िले हैं?
जुमे के ख़ुत्बे में मौलाना तक़रीर फ़रमा रहे थे कि “मदारिस इस्लाम के क़िले हैं” ये सुनकर एक साहब ने कहा कि “मदारिस मज़बूत क़िले
जुमे के ख़ुत्बे में मौलाना तक़रीर फ़रमा रहे थे कि “मदारिस इस्लाम के क़िले हैं” ये सुनकर एक साहब ने कहा कि “मदारिस मज़बूत क़िले
लीडर वो होता है जिसमें सही रहनुमाई करने की अहलियत और सलाहियत होती है। हम इस बात को इस तरह भी कह सकते हैं कि
अगर हम ये मानते हैं कि समाज से अख़लाक़ का दिवालिया निकल गया है, अगर हम ये मानते हैं कि मुल्क ज़ुल्म, जब्र व इस्तिब्दाद
सोच बदलेंगे तो अक़ीदा बदलेगा। अक़ीदा बदलेगा तो मिज़ाज बदलेगा। मिज़ाज बदलेगा तो किरदार बदलेगा। किरदार बदलेगा तो समाज में वो इन्क़िलाब बरपा होगा जिसकी
उलमा दो क़िस्म के होते हैं, उलमाए-हक़ और उलमाए-सू। जिस शख़्स का ख़ुद का ताल्लुक़ क़ुरआन से मज़बूत हो और उसपर अमल करता हो और
“(ऐ नबी) कह दीजिए कि ऐ अहले-किताब आओ एक ऐसी बात की तरफ़ जो हमारे और तुम्हारे दरमियान कॉमन है…..।” (क़ुरआन 3:64) मुसलमानों में जितने
मज़हब एक ऐसी अफ़ीम है जो डायरेक्ट दिमाग़ पर असर करती है और दिलों में दूसरों के लिये नफ़रत पैदा कर देती है, जिससे पूरा
दो या दो से ज़्यादा समझदार लोगों का एक साथ रहते हुए रायों में इख़्तिलाफ़ होना उतना ही फ़ितरी है जितना की अल्लाह की इस
तक़वा क़ुरआन मजीद के Key Words में से है बल्कि ये क़ुरआन मजीद की उन अहम इस्तिलाहात (Terminologies) में से है जिनकी तरफ़ अल्लाह ने
उम्मत के लिये ये बात किसी अलमिये (दर्दनाक वाक़िए) से कम नहीं है कि जो मसलक फ़ुरुई (जुज़्वी और मामूली) मामलों में रहनुमाई के लिये