मसायल का हल निज़ामे-तालीम
ये बात एक मुसल्लेमा हक़ीक़त की हैसियत रखती है कि हमारे मसायल का हल तालीम में नहीं बल्कि निज़ामे-तालीम की दुरुस्ती में है। और निज़ामे-तालीम
ये बात एक मुसल्लेमा हक़ीक़त की हैसियत रखती है कि हमारे मसायल का हल तालीम में नहीं बल्कि निज़ामे-तालीम की दुरुस्ती में है। और निज़ामे-तालीम
हमें हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के आग में डाले जाने और फिर आग के गुलज़ार बन जाने का क़िस्सा तो ख़ूब सुनाया जाता है मगर ये
हमारे मुआशरे में कुछ शख़्सियात और कुछ चीज़ें ऐसी हैं कि जिनका अदब व एहतिराम, पास व लिहाज़ बहुत ज़रूरी है, लेकिन ये भी देखा
अलहम्दुलिल्लाह रमज़ान का मुबारक महीना हमारे ऊपर साया-फ़िगन हो चुका है। आइये अहद करते हैं कि हम इस महीने के आख़िर तक अपने अन्दर कुछ
“खाना खाकर अल्लाह का शुक्र अदा करनेवाला सब्र करनेवाले रोज़ेदार के बराबर है।” (तिरमिज़ी : 2486) *तशरीह* : रोज़ेदार शख़्स रोज़े की हालत में ख़ुदा
इस बात में कोई शक नहीं है कि उलमाए-किराम ज़मीन के चराग़ ओर अंबिया के क़ायम मक़ाम हैं। [العلماء مصابیح الارض وخلفاء الانبیاء] हम सब
मुसलमानों की बदतर सूरते-हाल के लिये जो बातें ज़िम्मेदार हैं उनमें से एक ये भी है कि मुस्लिम नौजवानों और उलमा व दानिशवरों के दरम्यान
सलाहियत और सालेहियत ये दो ऐसी ख़ूबियाँ हैं जो इन्सानी शख़्सियत को परवान चढ़ाने में बड़ा ही अहम रोल अदा करती हैं। दुनिया में जितनी
किसी भी मुल्क या समाज को बुरे अंजाम से अगर कोई चीज़ बचा सकती है तो वो ये है कि कोई गरोह ऐसा निज़ामे-फ़िक्र-व-अमल लेकर
“मैं हूँ” मैं हूँ का यक़ीन इन्सान के अन्दर अपने होने का वो पॉज़िटिव सेन्स डेवेलप करता है, जिससे इन्सान न सिर्फ़ अपने-आपको बना, सँवार