
Khaire Ummat
मुसलमानों की सबसे बड़ी ख़ूबी उनका एक बा-मक़सद ‘उम्मत’ और ‘ख़ैरे-उम्मत’ होना है, न कि दूसरी क़ौमों की तरह महज़ एक क़ौम होना। जब तक

मुसलमानों की सबसे बड़ी ख़ूबी उनका एक बा-मक़सद ‘उम्मत’ और ‘ख़ैरे-उम्मत’ होना है, न कि दूसरी क़ौमों की तरह महज़ एक क़ौम होना। जब तक
नौजवानों और उलमा के बीच हम-आहंगी — — — मुसलमानों की बदतर सूरते-हाल के लिये जो बातें ज़िम्मेदार हैं उनमें से एक ये भी है
मिल्लत में इत्तिहाद की कम से कम शक्ल — — — क्या इन्कारे-हदीस का ढोल पीटते रहने से और दूसरी जमाअतों और शख़्सियतों को ग़लत
किरदार की ख़ुशबू को फैलने से रोका नहीं जा सकता — — — रसूलुल्लाह (सल्ल०) का उसवा (नमूनाए-ज़िन्दगी) हमें ये बताता है कि लोग शिर्क
मुसलमान क्या हैं और क्या नहीं हैं — — — मुसलमान महज़ एक मज़हबी गरोह नहीं हैं कि वो इस्लाम के साथ कुछ आस्थाओं और
उम्मत का बुख़ार पिछले क़रीब 4 दिन लगातार बुख़ार की हालत से गुज़रा। बुख़ार की शुरुआत बहुत तेज़ सर्दी के साथ होती। बॉडी के अन्दर
हदीस में आता है कि रमज़ान सब्र का महीना है। (नसाई : 2410) और सब्र का बदला जन्नत है। सब्र वो ख़ूबी है जिसके बग़ैर
क़ुरआन के मुताले से ये बात मालूम होती है कि ईमान के बग़ैर कोई शख़्स जन्नत में नहीं जा सकता। ईमान के बग़ैर अगर कोई
क़ुरआन में जहाँ रोज़े का मक़सद तक़वा हासिल करना बताया है वहीँ इस माह में जो हिदायत-नाम (क़ुरआन) नाज़िल किया गया उसकी हिकमत बताते हुए
अगर किसी शख़्स ने अपने पेड़ की जड़ों को ख़ुद ही काट डाला हो तो क्या वो- -उस पेड़ की ठण्डी छाँव से फ़ायदा उठा