कबीरा खड़ा बज़ार में माँगे सबकी ख़ैर। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।। कबीर दास जी के इस दोहे का दूसरा पद बहुत ही मशहूर है, जिसका मतलब आम तौर से इस तरह समझा जाता है कि हम तो न्यूट्रल (तटस्थ) हैं। मामला चाहे हक़ व बातिल में...
मुसलमानों में इत्तिहाद
मुसलमानों में इत्तिहाद की जितनी कोशिशें की गई हैं इन्तिशार उतना ही बढ़ा है और इस तरह की कोशिशें मुस्तक़बिल में इस इन्तिशार को और बढ़ाएँगी। करने का असल और उसूली काम ये है कि सबसे पहले हम ये देखें कि कौन-सी बात क़ुरआन और उसकी फ़िक्र से ज़्यादा क़रीब...
तीन क़ुव्वतें ऐसी हैं जो मुस्लिम-दुनिया पर हावी हैं
तीन क़ुव्वतें ऐसी हैं जो मुस्लिम-दुनिया पर हावी हैं और जिनका ख़ात्मा इस्लाम और मुसलमानों की तरक़्क़ी के लिये ज़रूरी है। अव्वल 'पापाइयत' या दूसरी इस्तिलाह में कहें तो 'मुल्लाइयत' जिसने इज्तिहाद का दरवाज़ा बन्द कर रखा है, जिससे मुसलमानों की सोचने-समझने की ताक़त मुरझा कर रह गई है। दूसरे...
इस्लाम दीन है या मज़हब?
दीन कहते हैं एक ऐसे निज़ामे-ज़िन्दगी को जिसमें ज़मामे-इक़्तिदार के तहत नज़्म-व-नस्क़ हो, जज़ा और सज़ा हो, फ़ैसले और उनका निफ़ाज़ हो। दीन कहते हैं ज़िन्दगी के उस ज़ाब्ते और क़ानून को जिसमें इताअत-गुज़री और फ़रमाँबरदारी हो, पूछ-गछ और हिसाब-किताब का इन्तिज़ाम हो। अगर लुग़वी ऐतिबार से देखा जाए तो...
Historic Figure
Prophet Muhammad (saw) is a historic figure of great importance who didn't kill the criminals but cleansed their heart and within a very short period of time succeed to convert them into pious and God fearing people. It is our duty to clear the misconceptions about such a great personality...
इस्लाम में ख़वातीन की शिरकत
ख़वातीन को जब तक मआशरे की इस्लाह और तामीर में शरीक न किया जाएगा तब तक कोई भी समाज तरक़्क़ी नहीं कर सकता। जाहिलीयत के समाज में पल कर जवान होने वाली मुस्लिम ख़वातीन को इस्लाम की तालीमात और निजी घरेलू ज़िन्दगी के इस्लामी अहकामात से आगाह करना लाज़िमी है...
इक़बाल : अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर।
अफ़राद के हाथों में है अक़वाम की तक़दीर। हर फ़र्द है मिल्लत के मुक़द्दर का सितारा।। मेरे नौजवान साथियो! शायद तुम्हें मालूम नहीं है कि तुम्हारी क़ौम किस क़दर पस्ती का शिकार हो रही है। इस क़ौम को अगर कोई पस्ती से निकाल सकता है तो वो तुम हो। तुम...
इशूज़ पर आवाज़ उठाना
क्या ये कोई सोची-समझी साज़िश है कि मुसलमानों को दिफ़ा (डिफ़ेंस) के कामों में ही लगाए रखो। कोई न कोई इशू ताज़ा रखो ताकि इस क़ौम का कुछ सोचने-समझने वाला तबक़ा मुसलमानों के हुक़ूक़ और तहफ़्फ़ुज़ की आवाज़ उठाने ही में लगा रहे और करने के असल काम से ग़ाफ़िल...
मसायल का हल निज़ामे-तालीम
ये बात एक मुसल्लेमा हक़ीक़त की हैसियत रखती है कि हमारे मसायल का हल तालीम में नहीं बल्कि निज़ामे-तालीम की दुरुस्ती में है। और निज़ामे-तालीम अपने-आप में कोई मक़सद नहीं रखता बल्कि वो किसी न किसी मक़सद के ताबेअ (अधीन) होता है। मतलब ये कि कोई क़ौम या समाज जिस...
करने के काम
अगर मुसलमानों ने अपने अख़लाक़ को दुरुस्त नहीं किया और मुआशरे में अपने करने के कामों पर फ़ोकस नहीं किया तो ये दुआएँ कुछ काम नहीं देंगी, चाहे ये दुआएँ रातों को ख़ाना-काबा के ग़िलाफ़ों से लिपट कर ही क्यों न माँगी जाएँ। मुसलमानों के पास अभी भी वक़्त है...