पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल०) ने फ़रमाया: बन्दा ख़ुदा के सबसे ज़्यादा क़रीब उस वक़्त होता है जब वो (नमाज़ की हालत में) सजदे में होता है. इस हदीस से मालूम होता है कि नमाज़ ख़ुदा से क़रीब होने और उस तक अपनी बात पहुँचाने का बेहतरीन ज़रिआ है. लेकिन बहुत-से लोग...
महब्बत का उसूल
महब्बत का उसूल है कि जिस किसी से जितनी ज़्यादा मुहब्बत होगी उससे उतना ही ज़्यादा ख़ौफ़ और डर भी होगा, इसीलिए अल्लाह ने ईमान लानेवालों से जहाँ एक तरफ़ ये कहा कि “मोमिन तो असल में वे हैं जो अल्लाह से शदीद मुहब्बत करते हैं.” (क़ुरआन 2:165) वहीँ दूसरी...
let us play our role in the establishment of peace in society.
पूरी कायनात में शान्ति और अम्न क़ायम है। कारण यह है कि हर चीज़ अपनी ड्यूटी को ज़िम्मेदारी के साथ अंजाम दे रही है और हर चीज़ किसी दूसरे से कुछ लेने की अपेक्षा रखने के बजाए कुछ दे रही है। मानव समाज में भी अम्न और शान्ति की स्थापना...
इस्लाम और ग़ैर-इस्लाम
दोस्तो, यूँ तो तमाम मज़ाहिब में अच्छी-अच्छी बातें ही हैं, लेकिन किसी भी मज़हब की असल पहचान उसका अक़ीदा और उसमें पाए जाने इबादत के तौर-तरीक़ों से ही होती है। इस्लाम का अक़ीदा ये है कि इस कायनात को पैदा करने वाला, चलाने वाला और एक दिन इसे ख़त्म कर...
हज़रत लुक़मान की बेटे को नसीहत
बेटे! इल्म इसलिये हासिल न करो कि उसके ज़रिए आलिमों पर फ़ख़्र करो और जाहिलों और बेवक़ूफ़ों से झगड़ते फिरो और महफ़िलों में अपने आप को नुमायाँ करने लगो। हज़रत लुक़मान की बेटे को नसीहत (Musnad Ahmad 15651)
प्यारे नबी की अज़मत का पहलू
प्यारे नबी मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत का एक पहलू तो ये है कि आपने 23 साल की छोटी-सी मुद्दत में अरब के उजड्ड और बद्दू क़िस्म के लोगों को जाहिलियत के घटा टोप अँधेरे से निकाल कर हक़ की रौशनी में ला खड़ा किया और उनके ज़रिये दुनिया में एक...
रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत
रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत को तस्लीम करते हुए उसके इज़हार का एक पहलू तो ये है कि हम उनके जन्म-दिन पर जुलूस निकालें, उनकी तारीफ़ में नअतें पढ़ें और नारे लगाएँ और फ़िज़ाओं को एहसास दिला दें कि हम आशिक़े-रसूल हैं। रसूलुल्लाह (सल्ल०) की अज़मत के इज़हार का दूसरा और...
अज़मते-रसूल (सल्ल०)
तक़रीबन तमाम ही नबियों के साथ ये हादिसा पेश आया है कि उनके बारे में लोग दो तरह की गुमराही में मुब्तिला हुए हैं. पहली गुमराही तो यह कि लोगों ने उनको ये कहकर मानने से इनकार कर दिया कि “तुम कुछ नहीं हो मगर वैसे ही इन्सान जैसे हम...
रसूलुल्लाह की अज़मत
रसूलुल्लाह की अज़मत कुछ इस वजह से नहीं है कि आप (सल्ल०) ने किसी बालाई ताक़त के बल पर कुछ ख़ास क़िस्म के मोजिज़े कर दिखाए हों बल्कि आप (सल्ल०) की अज़मत अस्ल में इस बुनियाद पर है कि आप (सल्ल०) ने अल्लाह की मदद से अल्लाह के बन्दों के...
अज़मते-रसूल (सल्ल०)
हज़रत मुहम्मद (सल्ल०) की अज़मत के हवाले से बहुत-से लोगों को दूसरी बड़ी ग़लतफ़हमी ये हुई है कि आप (सल्ल०) को महज़ एक समाज-सुधारक मान लिया गया है। जबकि एक समाज-सुधारक और एक नबी या रसूल में बहुत बड़ा फ़र्क़ होता है। एक समाज-सुधारक समाज-सुधार के लिये ख़ुद से खड़ा...