हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन। दिल के ख़ुश रखने को ग़ालिब ये ख़याल अच्छा है।। -------- ग़ालिब कहते हैं कि जन्नत के बारे में ये ख़याल आम है कि जन्नत कुछ मज़हबी रस्में अदा करने या कुछ पूजा-पाठ कर लेने से हासिल हो जाएगी। और जन्नत में...
ग़ालिब : इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा।
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा। लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं।। ------- मतलब अच्छी मगर दलील से भरी बातचीत में वो ताक़त होती है कि जिसके ज़रिए हाथ में तलवार लिये बग़ैर इन्सानों के अन्दर की बहुत-सी बुराइयों से लड़कर उनको हराया जा सकता...
ग़ालिब : न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता -------- मतलब इस शेर में ग़ालिब ने ख़ुदा की हस्ती के बारे में बताया कि उस हस्ती का वुजूद हमेशा से है। इस हमेशगी का इन्सान सिर्फ़...
ग़ालिब : बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना -------- मतलब अगर किसी काम को सलीक़े से किया जाए तो उसमें वक़्त भी लगता है और मुश्किलें भी आती हैं। आदमी के बारे में अगर सिर्फ़ इतना ख़याल किया जाए कि आदम की औलाद...
ईदे-क़ुर्बां की पुर-ख़ुलूस मुबारकबाद!
आपको और आपके तमाम अहबाब को ईदे-क़ुर्बां की पुर-ख़ुलूस मुबारकबाद! आइये इस मौक़े पर दुआ करें कि अल्लाह हमें हज़रत इब्राहीम (अलैहि०) की तरह अपनी राह में दुनिया बनाने वाली अपनी हर महबूब से महबूब चीज़ को क़ुर्बान करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए ताकि आख़िरत में वो हम से राज़ी...
कबीर : करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात ।
करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिन रात। कूकर सम भूकत फिरे, सुनी सुनाई बात ॥ अर्थ: कबीर दास कहते हैं कि अज्ञानी लोग रात-दिन वो बातें कहते फिरते हैं जिन पर वो ख़ुद अमल नहीं करते। यानी वो काम कम और बातें अधिक करते हैं। और जो कुछ वो बोलते...
ग़ालिब :हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले ------- मतलब अगर ये कहा जाए तो बेजा बात न होगी कि इन्सान ख़्वाहिशों का पुतला है। इन्सान के अन्दर ख़्वाहिशात इतनी हैं कि एक पूरी होने नहीं पाती, दूसरी पैदा हो...
इस्लाम की राह में रुकावट
इस्लाम के लिए रुकावट की एक वजह हमारी कट्टर और बेरूह धार्मिकता है, जिसे आजकल इस्लाम समझा जा रहा है। इस बेरूह दीन का पहला बुनियादी नुक़्स यह है कि इसमें इस्लाम के अक़ीदे सिर्फ़ एक धार्मिक अनुष्ठान बनाकर रख दिए गए हैं, हालांकि यह अक़ीदे एक संपूर्ण सामुदायिक और...
ग़ालिब : बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे ------- मतलब शाइर कहता है कि मेरी निगाह में इस दुनिया की हैसियत ऐसी है जैसे बच्चों के लिये खेल का मैदान। यहाँ जो रात-दिन हादिसे और घटनाएँ होती रहती हैं वो मेरी नज़र में खेल तमाशे से ज़्यादा...
इक़बाल : चे मुल्लाई, चे दरवेशी, चे सुल्तानी, चे दरबानी।
चे मुल्लाई, चे दरवेशी, चे सुल्तानी, चे दरबानी। फ़रोग़े-कार मी जोयद ब-सालूसी व ज़र्राक़ी।। अल्लामा इक़बाल (रह०) ------ मतलब मुल्ला (आलिमे-दीन) हो चाहे दरवेश, सुल्तान (बादशाह) हो या दरबारी (ब्यूरोक्रेट्स)! सब (अक्सर व बेशतर) ने अपनी-अपनी दुकानें खोल रखी हैं और अपने-अपने कारोबार को बढ़ाने में लगे हुए हैं। और...